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रसरत्नसमुच्चय (सुरत्नोज्ज्वला हिन्दी व्याख्या सहित)

Rasaratna Samuchchaya Hindi

रस-वाग्भटाचार्य (टीकाकार: पं. अम्बिकादत्त शास्त्री) द्वारा

स्रोत: Rasaratna Samuchchaya with Suratnojjvala Hindi Commentary by Pt. Ambika Datta Shastri (1939) (उद्गम)

DevanagariHindipublished362 पृष्ठ

पञ्चमोऽध्यायः । १९१

पञ्चमोऽध्यायः । १९१

चाहिए। एक प्रहर के बाद भस्म को निकाल कर, उसमें बराबर शुद्धमनः शिला मिला- कर केजम्बीररस या काञ्जी से घोटकर सम्पुट में बन्दकर के फूंक दें। एक प्रहर के पश्चात् स्वाङ्गशीत होने पर पुट से निकालकर फिर बीसवें भाग की मात्रा में मनः- शिला मिला कर किसी अम्ल से घोटकर सम्पुट कर के एक प्रहर तक पकाना चाहिए। इस तरह प्रत्येक पुट में बीसवां भाग मनःशिला मिला कर ६० पुट देने से नाग की अत्यन्त गुणकर निरुत्थ भस्म हो जाती है ॥ १८०-१८२ ॥

अथ मतान्तरम्— शिलया रविदुग्धेन नागपत्राणि लेपयेत् । मारयेत्पुटयोगेन निरुत्थं जायते तथा ॥ १८३ ॥ अथवा शुद्धनाग के पत्रों पर मदार के दुग्ध में घोटी हुई मनःशिला की पिट्ठी का लेप कर पुटकी विधि से १० या १५ पुट देने से नाग की निरुत्थ भस्म हो जाती है ॥ १८३ ॥

अथ नागरसायनम्— एवं नागोद्भवं भस्म ताप्यभस्माधभागिकम् । पादं पादं क्षिपेद्भस्म शुल्वस्य विमलस्य च ॥ १८४ ॥ कान्ताभ्रसत्त्वयोश्चापि स्फटिकस्य पृथक् पृथक् । सर्वमेकत्र सञ्चूर्ण्य पुटेत्त्रिफलवारिणा ॥ १८५ ॥ त्रिंशद्वनगिरिण्डैश्च त्रिंशद्वारं विचूर्ण्य तत् । व्योषवेल्लकरचूर्णैश्च समांशैः सह मेलयेत् ॥ १८६ ॥ मध्वाज्यसहितं हन्ति प्रलीढं वल्लमात्रया । अशीतिवातजान्रोगान्धनुर्वातं विशेषतः ॥ १८७ ॥ कफरोगानशेषांश्च मूत्ररोगांश्च सर्वशः । श्वासं कासं क्षयं पाण्डुंश्वयथुं शीतकज्वरम् ॥ १८८ ॥ ग्रहणीमामदोषं च वह्निमान्द्यं सुदुर्ज्जरम् । सर्वानुदकदोषंश्च तत्तद्रोगानुपानतः ॥ १८९ ॥

उपर्युक्तविधि से बनाई हुई सीसे की भस्म एक भाग तथा सुवर्णमाक्षिकभस्म अर्द्धभाग तथा ताम्रभस्म, विमलभस्म कान्तलौहभस्म, अभ्रकसत्व, स्फटिकभस्म, ये प्रत्येक सीस भस्म से चतुर्थांश लेना चाहिए इन सबको खरल में एकत्र कर

१९२ || रसरत्नसमुच्चये—

त्रिफला के काथ से घोटकर तीस जंगली उपलों के अन्दर पुट देना चाहिए, फिर स्वाङ्गशीत होने के बाद निकालकर खरल में त्रिफलाक्वाथ से घोटकर पुट देवे। इस तरह तीस वार पुट देकर भस्म बनाले, फिर इसभस्म की एक वल्ल ( दो रत्ती ) की मात्रा में समानभाग त्रिकटुचूर्ण और वायविडङ्गचूर्ण मिलाकर शहद और मक्खन के साथ सेवन करने से अस्सी प्रकार के वातरोग, विशेष कर धनुर्वात, सम्पूर्ण कफ के रोग, मूत्र के रोग, श्वास, कास, क्षय, पाण्डु, शोथ, शोत-ज्वर, ग्रहणी, आमदोष, मन्दाग्नि तथा सर्व प्रकार के जलदोष से उत्पन्न रोग भिन्न २ अनुपान के साथ सेवन से नष्ट हो जाते हैं ॥ १८४-१८९ ॥

अथ पित्तलम्—

पित्तलभेदाः—

रीतिका काकतुण्डी च द्विविधं पित्तलं भवेत् ॥ १९० ॥

पीतलधातु दो प्रकार की होती है, एक को रीतिका तथा द्वितीय भेद को काकतुण्डी कहते हैं ॥ १९० ॥

रीतिकालक्षणम्—

सन्ताप्य काञ्जिके क्षिप्ता ताम्राभा रीतिका मता ॥ १९१ ॥

पीतल को अग्नि में तपाकर काञ्जी में बुझाने से यदि वह ताम्बे के रङ्ग की हो जाय तो वह रीतिका पित्तल कहलाता है ॥ १९१ ॥

काकतुण्डी लक्षणम्—

एवं या जायते कृष्णा काकतुण्डीति सा मता ॥ १९२ ॥

पीतल को अग्नि में प्रतप्त कर काञ्जी में बुझाने से यदि वह कृष्णवर्ण की हो जाय तो काकतुण्डी पित्तल कही जाती है ॥ १९२ ॥

अथ रीतिकाया गुणाः—

रीतिस्तिक्तरसा रूक्षा जन्तुघ्नी सास्रपित्तनुत् ।
पाण्डुकुष्ठहरा योगात्सोष्णवीर्या च शीतला ॥ १९३ ॥

रीतिका नाम की पीतल स्वाद में तिक्त, रूक्ष, जन्तुनाशक, रक्तपित्त और कुष्ठ को नाश करनेवाली और पाण्डुरोग नाशक है। शीतल पदार्थों के साथ सेवन करने से शीतवीर्य और उष्ण पदार्थों के साथ उष्णवीर्य है ॥ १९३ ॥

पञ्चमोऽध्यायः ।
१४३

अथ काकतुण्ड्या गुणाः—

काकतुण्डी गतस्नेहा तिक्तोष्णा कफपित्तनुत् ।
यकृत्प्लीहहरा शीतवीर्या च परिकीर्तिता ॥ १६४ ॥

काकतुण्डी नामक पीतल रूक्ष, कटु, उष्णवीर्य, कफपित्तनाशक और यकृत और प्लीहावृद्धि को नष्ट करती है तथा यह शीतवीर्य होती है ॥ १६४ ॥

अथ शुभरीतिका लक्षणम्—

गुर्वी मृद्वी च पीनाभा साराङ्गो ताडनक्षमा ।
सुस्निग्धा मसृणाङ्गी च रीतिरेतादृशी शुभा ॥ १६५ ॥

जो पीतल वजन मे' भारी, मृदु, पीतवर्णयुक्त, आघात से नहीं टूटने वाली और दृढ, अत्यन्त स्निग्ध तथा मसृण होतो वह पीतल औषध कर्म में श्रेष्ठ है॥ १६५॥

अशुभरीतिका लक्षणम्—

पाण्डुपीता खरा रूक्षा बर्बरा ताडनक्षमा ।
पूतिगन्धा तथा लघ्वी रीतिर्नेष्टा रसादिषु ॥ १६६ ॥

जो पीतल पाण्डुता तथा पीलेवर्ण वाली, खर, रूक्ष, आघात से टूटने वाली, लघु और दुर्गन्ध युक्त हो वह रसादि कर्म मे' श्रेष्ठ नहीं है ॥ १६६ ॥

रीतिकाशोधनम्—

तप्त्वा क्षिप्त्वा च निर्गुण्डीरसे श्यामारजोऽन्विते ।
पञ्चवारेण संशुद्धिं रीतिरायाति निश्चितम् ॥ १६७ ॥

पीतल को अग्नि मे' प्रतप्त कर हरिद्राचूर्ण से युक्त निर्गुण्डी के रस में ५ वार बुझाने से वह निश्चय ही शुद्ध हो जाती है ॥ १६७ ॥

रीतिका मारणम्—

निम्बूरसशिलागन्धवेष्टिता पुटिताऽष्टधा ।
रीतिरायाति भस्मत्वं ततो योज्या यथायथम् ॥ १६८ ॥

शुद्ध पीतल के छोटे छोटे पत्र बनाकर उनकी बराबर शुद्ध गन्धक और मन शिला को निम्बू के रस मे' पीसकर पत्रों पर लेप कर देना चाहिए । फिर सम्पुट मे' बन्द कर पुट देवे', इस तरह आठ पुट देने से पीतल की श्रेष्ठ भस्म हो जाती है । इसको शास्त्रानुसार योगों में प्रयुक्त करना चाहिए ॥ १६८ ॥

रस० १३

१९४ रसरत्नसमुच्चये—

मतान्तरम्—

ताम्रवन्मारणं तस्याः कृत्वा सर्वत्र योजयेत् ॥ १८६ ॥

अथवा ताम्रभस्म विधि से पीतल की भस्म बना कर सब जगह उसका प्रयोग करें ॥ १९९ ॥

पित्तलरसायनम्—

मृतारकूटकं कान्तं व्योमसत्त्वं च मारितम् ।
त्रयं समांशकं तुल्यं व्योषं जन्तुघ्नसंयुतम् ॥ २०० ॥
ब्रह्मबीजाजमोदाऽग्निभल्लाततिलसंयुतम् ।
सेवितं निष्कमात्रं हि जन्तुघ्नं कुष्ठनाशनम् ।
विशेषाच्छ्वेतकुष्ठघ्नं दीपनं पाचनं हितम् ॥ २०१ ॥

पीतलभस्म, कान्तलौहभस्म, मारित अभ्रकसत्त्व, इन तीनों को समान भाग ले कर खरल में घोट कर बराबर सोंठ, मिर्च, पीपल, वायविडङ्ग, ढाक के बीज, अजमोद और चित्रक के चूर्ण के साथ एक निष्क (४ मासे) की मात्रा के सेवन करने से कृमि, कुष्ठ और विशेषकर श्वेतकुष्ठ को नष्ट करती है तथा दीपन और पाचन है ॥ २००-२०१ ॥

पित्तलद्रुतिः—

सुवर्णरीतिकाचूर्णं भक्षितं वेष्टितं पुनः ।
छागेन कृष्णवर्णेन मत्तेन तरुणेन च ॥ २०२ ॥
तल्लिप्तं खर्परे दग्धं द्रुतिं मुञ्चति शोभनाम् ।
चतुर्दशलसद्वर्णसुवर्णसदृशच्छविः ।
देहलोहकरी प्रोक्ता युक्ता रसरसायने ॥ २०३ ॥

इति पित्तलाधिकारः ।

सुवर्ण के समान उत्तम पीतवर्ण के शुद्ध पित्तल चूर्ण को किसी खाद्य पदार्थ के साथ मिलाकर काले और हृष्ट पुष्ट जवान बकरे को खिला देना चाहिए, फिर बकरे की विष्ठा (मींगणियां) को द्रावक वर्ग की औषधियों के साथ पीस कर मिट्टी के खर्पर में लिप्तकर अग्नि में जला देने से चौदह प्रकार के वर्ण से युक्त सुवर्ण के समान चमकदार उत्तम पीतल की द्रुति हो जाती है, इसका रस और रसायन कर्म में प्रयोग करने से देह लोह के समान दृढ और स्थिर हो जाती है ॥ ३०२-२०३ ॥

पञ्चमोऽध्यायः । : १९५

अथ कांस्यम्—
कांस्योत्पत्तिवर्णनम्—
अष्टभागेन ताम्रेण द्विभागखुरकेण च ।
विद्रुतेन भवेत्कांस्यं तत्सौराष्ट्रभवं शुभम् ॥ २०४ ॥

आठभाग ताम्र, दो भाग खुरक वङ्ग, इनदोनों को अग्नि में द्रुत करके मिलाने से कांस्य (कृत्रिम) बनता है। इसी विधि से खानों के अन्दर भी इसकी उत्पत्ति होती है, सौराष्ट्र देश का बना कांसा शुभ होता है ॥ २०४ ॥

अथ प्रशस्तकांस्यलक्षणम्—
तीक्ष्णशब्दं मृदु स्निग्धमीषच्छ्यामलशुभ्रकम् ।
निर्मलं दाहरक्तं च षोढा कांस्यं प्रशस्यते ॥ २०५ ॥

जो कांसा बजाने से तेज शब्द करता हो और मृदु, स्निग्ध तथा कुछ श्यामता युक्त शुभ्र (श्वेत) वर्ण का हो, निर्मल तथा अग्नि में तपाने से रक्तवर्ण का हो जाय इन लक्षणों वाला कांसा श्रेष्ठ होता है ॥ २०५ ॥

त्याज्यकांस्यलक्षणम्—
तत्पीतं दहने ताम्रं खरं रूक्षं घनासहम् ।
मन्दनादं गतज्योतिः सप्तधा कांस्यमुत्सृजेत् ॥ २०६ ॥

जिस कांसे का वर्ण पीला हो तथा अग्नि में तपाने से ताम्बे के समान वर्ण हो जाय तथा खर, रूक्ष, पीटने से टूटने वाला, ताड़न करने पर मन्द शब्द करने वाला और कान्ति रहित हो, इन सात लक्षणों वाला कांस्य औषध कर्म में त्याज्य है ॥ २०६ ॥

अथ कांस्यगुणाः—
कांस्यं लघु च तिक्तोष्णं लेखनं दृक्प्रसादनम् ।
कृमिकुष्ठहरं वातपित्तघ्नं दीपनं हितम् ॥ २०७ ॥
घृतमेकं विना चान्यत्सर्वं कांस्यगतं नृणाम् ।
भुक्तमारोग्यसुखदं हितं सात्म्यकरं तथा ॥ २०८ ॥

कांस्य लघु, तिक्त, उष्ण और लेखन होता है तथा कृमि, कुष्ठ, वात, पित्त का नाशक, अग्नि को दीप्त करने वाला और दृष्टि को बढ़ाता है तथा हितकर है।
कांसे के बने पात्र में घृत को छोड़कर अन्य भोज्य पदार्थ रखकर खाने से मनुष्यों ।

१९६ | रसरत्नसमुच्चये—

के लिये आरोग्य और सुख प्रद है और शरीर के या प्रकृति के लिये सात्म्य होता है ॥ २०७-२०८ ॥

अथ कांस्यशोधनम्—
तप्तं कांस्यं गवां मूत्रे वापितं परिशुध्यति ॥ २०९ ॥
कांसे को अग्नि में प्रतप्त कर गोमूत्र में सातवार बुझानेसे वह शुद्ध होजाता है॥२०९॥

अथ कांस्यमारणम्—
म्रियते गन्धतालाभ्यां निरुत्थं पञ्चभिः पुटैः ॥ २१० ॥
कांस्य के पत्रोंपर निम्बूरस से घोटे हुए गन्धक और मनःशिला का लेपकर पांच पुट देने से उसको निरुत्थ भस्म हो जाती है ॥ २१० ॥

मतान्तरम्—
त्रिक्षारं पञ्चलवणं सप्तधाऽम्लेन भावयेत् ॥
कांस्याऽऽरकूटपत्राणि तेन कल्केन लेपयेत् ।
रुद्ध्वा गजपुटे पक्कं शुद्धभस्मत्वमाप्नुयात् ॥ २११ ॥
इति कांस्याधिकारः ।

सजिखार, ज़वाखार, टङ्कण और पांचो नमक (सौवर्चल, सैन्धव, विड्, औद्भिद, सामुद्र) इनको किसी अम्लरस से सातवार भावित कर कांस्य तथा पीतल के पत्रों पर लेप करके सम्पुट में बन्द कर गज पुट में फूक देने से कांसे या पीतल की उत्तम भस्म हो जाती है॥ २११ ॥

अथ वर्तलोहम्—
वर्तलोहस्वरूपः—
कांस्यार्कर्रीतिलाहाऽहिजातं तद्वर्त्तलोहकम् ।
तदेव पञ्चलोहाख्यं लोहविद्भिरुदाहृतम् ॥ २१२ ॥
कांस्य, ताम्र, पित्तल, लोह, सीस इनको गला कर मिला देने से जो धातु बनती है उस को लोहके विशेषज्ञ वर्तलोह या लोहपञ्च या पञ्चलोह (भरत) कहते हैं॥२१२॥

अथ वर्तलोहगुणाः—
हिमाम्लं कटुकं रूक्षं कफपित्तविनाशनम् ।
रुच्यं त्वच्यं कृमिघ्नं च नेत्र्यं मलविशोधनम् ॥ २१३ ॥
तद्भाण्डे साधितं सर्वमन्नव्यञ्जनसूपकम् ।

पञ्चमोऽध्यायः । १९७

पञ्चमोऽध्यायः । १९७

अम्लेन वर्जितं चापि दीपनं पाचनं हितम् ॥ २१४ ॥

वर्तलोह ( भरत ) शीतवीर्य्य, अम्ल, कटु, रूक्ष, कफपित्त और कृमि को नष्ट करता है, त्वचा और नेत्र के विकारों में हितकर तथा रुचिकारक और मल-शोधक होता है तथा भरत के बने हुए पात्र में अम्ल पदार्थ के अतिरिक्त और अन्य सर्व प्रकार के अन्न, शाक, दाल इत्यादि बनाकर खाने से अग्नि अत्यन्त दीप्त होती है तथा पाचकशक्ति भी बढती है ॥ २१३-२१४ ॥

वर्तलोहशोधनम्— द्रुतमश्वजले क्षिप्तं वर्तलोहं विशुष्यति ॥ २१५ ॥

वर्तलोह को अग्नि पर पिघलाकर तुरन्त ही घोड़े के मूत्र में बुझाने से वह शुद्ध होजाता है ॥ २१५ ॥

वर्तलोहमारणम्— म्रियते गन्धतालाभ्यां पुटितं वर्तलोहकम् । तेषु तेष्विह योगेषु योजनीयं यथाविधि ॥ २१६ ॥ इति वर्तलोहाधिकारः ।

शुद्धवर्त लोह के छोटे २ पत्र या टुकड़े करके उन पर समानभाग गन्धक और शुद्ध हरताल को निम्बू के रस में घोटकर लेप कर देना चाहिए, पश्चात् सम्पुट में बन्द करके गजपुट में सात बार फूंक देना चाहिए, इस तरह बनी भस्म को यथाशास्त्र सर्वप्रयोगों में प्रयुक्त करनी चाहिए ॥ २१६ ॥

अथ रसोपरसलोहानां सूतसाधकत्वनिर्देशः— जातिमद्भिर्विशुद्धैश्च विधिना परिसाधितैः । रसोपरसलोहाद्यैः सूतः सिध्यति नान्यथा ॥ २१७ ॥

जो रस उपरस और लोह उत्तमजाति के हों तथा विधिपूर्वक शुद्ध और भस्म किये गये हों उन्हीं के संसर्ग से पारद सिद्ध होकर शरीर को अजर अमर बनाता है, इनके बिना पारद भी सिद्ध नहीं होता है ॥ २१७ ॥

रत्नादीनां सूतयोग्यत्वनिर्देशः— रत्नानि लोहानि वराटशुक्तिपाषाणजातं खुरशृङ्गशल्यम् । महारसाद्येषु कठोरदेहं भस्मीकृतं स्यात्खलु सूतयोग्यम् ॥२१८॥

सर्वप्रकार के रत्न, लोह (सप्त या अष्ट धातु) कौड़ी, शुक्ति, पाषाणजाति या

१९८ रसरत्नसमुच्चये—

'पाषाण से उत्पन्न होने वाले खनिज पदार्थ, खुर, सींग, शल्य (अस्थि) और महारसादियों में जो कठिन (दृढाङ्ग) पदार्थ वैक्रान्त, माक्षिक आदि हैं, उन्हें विधिपूर्वक शुद्ध करके भस्म के रूप में बनाने पर ही वे पारद के कार्य में उपयुक्त हो सकते हैं, अतः बुद्धिमान् को चाहिए कि यथाशास्त्र इनकी शुद्धि तथा भस्म करे' ॥ २१८ ॥

भूनागसत्त्वपातनम्—

वज्राणां द्रावणार्थाय सत्त्वं भूनागजं ब्रुवे ।
तदेव परमं तेजः सूतराजेन्द्रवज्रयोः ॥ २१९ ॥
धौतभूनागसम्भूतं मर्दयेद्भृङ्गजद्रवैः ।
निम्बूर्द्रवैश्च निर्गुण्ड्याः स्वरसैस्त्रिदिनं पृथक् ॥ २२० ॥
तद्द्रावणगणोपेतं सम्मर्द्य वटकीकृतम् ।
निरुध्य दृढमूषायां द्विण्डं प्रधमेद् दृढम् ॥ २२१ ॥
स्वतः शीतं समाहृत्य पट्टके विनिवेश्य तत् ।
रवकान् राजिकातुल्यानैशूनतिभरान्वितान् ॥ २२२ ॥
द्वादशांशार्कसंयुक्तानध्मित्वा रवकान्हरेत् ।
प्रक्षाल्य रवकानाशु समादाय प्रयत्नतः ॥ २२३ ॥
वज्रादिद्रावणं तेन प्रकुर्वीत यथेप्सितम् ।
खरसत्त्वमिदं प्रोक्तं रसायनमनुत्तमम् ।
द्वित्रिमूषासु चैकस्यां सत्त्वं भवति निश्चितम् ॥ २२४ ॥

भूनाग (केञ्चुआअर्थवर्म) का सत्त्व हीरकादि वज्रों के द्रावण करने में अत्यन्त उत्तम है तथा पारद और हीरक की शक्ति को बढाता है, इस लिये इस सत्त्व के पातन की विधि कहता हूं। जल से अच्छी प्रकार धोये हुए केञ्चुओं को सुखा कर उनका चूर्ण बना लेना चाहिए, फिर इस चूर्ण को भृङ्गराजरस (भांगरा), निम्बूरस और निर्गुण्डी स्वरस, से पृथक् २ तीन २ दिन तक मर्दनकरके द्रावक वर्ग के पदार्थ मिलाकर घोट लेना चाहिए। फिर टिकिया बनाकर एक मजबूत मूषा के अन्दर बन्द करके दो दण्ड (४८ मिनट) तक तेज अग्निद्वारा फूंकना चाहिए। स्वाङ्गशीत होने पर मूषा से उनको निकाल कर किसो पट्ट (काष्ठपट्ट या वस्त्र) पर डाल कर या वस्त्र से छान करके राई के बराबर मोटे २ तथा वजनी सत्त्व

पञ्चमोऽध्यायः । १९९

कणों को एकत्र करके उनमें १२ वां भाग शुद्ध ताम्र का चूर्ण मिला कर मूषायन्त्र में बन्द करके फूंक दे', फिर उन सत्त्वकणों को निकाल के जल से धोकर रख लेना चाहिए । इन से वज्रादि का द्रावण करना चाहिए। यह सत्त्व अत्यन्त उत्तम रसायन है तथा इसे खर सत्त्व कहते हैं, इस सत्त्व को सम्पूर्ण निकालने के लिये दो या तीन मूषा लेकर विधिपूर्वक कार्य करना चाहिए। कभी २ एक ही मूषा के द्वारा सम्पूर्ण सत्त्व निकल जाता है ॥ २१९-२२४ ॥

मतान्तरम्—

भुजङ्गमानुपादाय चतुष्प्रस्थसमन्वितान् ।
सुवर्णरूप्यताम्रायस्कान्तसम्भूतिभूमिजान् ॥ २२५ ॥
प्रक्षाल्य रजनीतोयैः शीतलैश्च जलैरपि ।
उपोषितं मयूरं वा शूरं वा चरणायुधम् ॥ २२६ ॥
क्रमेण चारयित्वाथ तद्विष्ठां समुपाहरेत् ।
क्षाराम्लैः सह सम्पेष्य विशोष्य च खरातपे ॥ २२७ ॥
ततः खर्परके क्षिप्त्वा भर्जयित्वा मषीं चरेत् ।
मषीं द्रावणवर्गेण संयुक्तां सम्प्रमर्दिताम् ॥ २२८ ॥
निरुध्य कोष्ठिकामध्ये प्रधमेद्घटिकाद्वयम् ।
शीतलीभूतमूषायाः खोटमाहृत्य पेषयेत् ॥ २२९ ॥
प्रक्षाल्य रवकान् सूक्ष्मान् समादाय प्रयत्नतः ।
सुवर्णमानवद् ध्मात्वा रवं कृत्वा नियोजयेत् ॥ २३० ॥

सुवर्ण, रजत, ताम्र, कान्तलौह इत्यादि धातुएं जिन खानों से निकलती हैं उन खानों की मिट्टी में उत्पन्न होने वाले केंचुए ४ प्रस्थ ( २५६ या ३ सेर १६ तो० ) लेकर उन को हरिद्रा के स्वरस या क्वाथ से प्रथम अच्छी तरह धोकर दूसरी बार शीतल जल से धो कर साफ कर लेना चाहिए । फिर उन्हें एक भूखे मयूर या जवान कुक्कुट ( मुर्गा ) को खिला देवें । पश्चात् उस मयूर या मुर्गे की विष्ठा ( केंचुएं के खाने से निकली हुई ) को लेकर खल्व में क्षार और अम्ल वर्ग के पदार्थों के साथ घोटकर तेज धूप में सुखा ले', सूखने पर एक मिट्टी के खर्पर में उसे भुंजकर मषी अथवा कज्जली अथवा राख बनालेवे', फिर इस राख को द्रावकवर्ग की औषधियों के साथ घोटकर मूषायन्त्र में बन्दकर दो घड़ी तक

२०० | रसरत्नसमुच्चये—

अग्नि में फूके, स्वाङ्गशीत होने पर मूषा से भूनाग सत्त्व को निकालकर खल्व में पीस करके धोकर छोटे २ सत्त्व के कणों को यत्नपूर्वक निकाल ले', पश्चात् उन्हें मूषायन्त्र में बन्दकर स्वर्णद्रावण की विधि के अनुसार गला कर निकाल ले', फिर -चूर्ण कर प्रयोग करना चाहिए ॥ २२५–२३० ॥

अथ भूनागमुद्रिका—

भूनागोद्भवसत्त्वमुत्तममिदं श्रीसोमदेवोदितं
दत्तं पादमितं द्विशाणकनकेनैकं गतेनोर्मिकाम् ।
तद्धौताम्बुविलेपितं स्थिरचराद्भूतं विषं नेत्ररूक्
शूलं मूलगदं च कर्णजरुजो हन्यात्प्रसूतिग्रहम् ॥ २३१ ॥
इति भूनागाधिकारः ।

श्रीसोमदेव के द्वारा कथित उत्तम भूनागसत्त्व चतुर्थांश ( २ मासा ) लेकर दो शाण ( ८ मासा ) स्वर्ण के साथ गलाकर दोनों को मिला कर एक अंगूठी बनवा लेनी चाहिए, फिर उस अंगूठी को पानी में डाल कर निकाल लें, वह अंगूठी का पानी स्थावर और जंगमविषवाधा, नेत्ररोग, शूल, अर्श, कर्णरोग और प्रसूति-रोग को स्पर्शमात्र से नष्ट कर देता है ॥ २३१ ॥

अथ तैलपातनविधिः ।

मूलान्युत्तरवारुण्या जर्जरीकृत्य काञ्जिके ।
क्षिपेदङ्कोल्लबीजानां पेषिकां जर्जरीकृताम् ॥
तत्तैलं घृतवत्स्त्यानं ग्राह्यं तत्तु यथाविधि ॥ २३२ ॥

तैल भी बीजों का सत्त्व होता है इस लिये सत्त्व पातन के प्रकरण में उनके निकालने की विधि लिखते हैं । इन्द्रवारुणी की जड़ को काञ्जी में पीसकर उसमें अंकोल के बीजों को पीस कर मिला देना चाहिए, फिर एक वस्त्र की बनी हुई पोटली में इनको रखकर तेज धूप में किसी लकड़ी के सहारे लटका देना चाहिए । जब पोटली से तैल नीचे रखे बर्तन में चूकर घी के समान ( गाढ़ा ) घनीभूत हो जाय तब किसी पात्र (शीशी) में ले लेना चाहिए ॥ २३२ ॥

मतान्तरम्—

सम्पेष्योत्तरवारुण्याः पेटकार्या दलान्यथ ।
काञ्जिकेन ततस्तेन कल्केन परिमर्दयेत् ॥ २३३ ॥

पञ्चमोऽध्यायः । | २०१


रजश्चाङ्कोलबीजानां तद्बद्ध्वा विरलाम्बरे ।
तद्विलम्ब्याऽऽतपे तीव्रे तस्याधश्चषकं न्यसेत् ॥
तस्मिन्निपतितं तैलमादेयं श्वित्रनाशनम् ॥ २३४ ॥

अथवा इन्द्रायण के पत्ते तथा ज्योतिष्मती ( मालकंगुनी ) के पत्तों को काञ्जी में बारीक पीस कर कल्क बना लें, फिर इस कल्क के साथ अङ्कोल के बीजों के चूर्ण को पीस कर एक पतले वस्त्र में रख कर पोटली बनालें, फिर इस पोटली को तेज धूप में लटका करके नीचे एक काच का प्याला रख दें, फिर धूप के कारण पोटली से तैल चूकर प्याले में इकट्ठा हो जाता है, इस तैल को श्वेत कुष्ठ पर लगाने से वह अच्छा हो जाता है ॥ २३३-२३४ ॥

मतान्तरम्—

अङ्कोलबीजसम्भूतं चूर्णं सम्मर्द्य काञ्जिकैः ।
एकरात्रोषितं तत्तु पिण्डीकृत्य ततः परम् ॥ २३५ ॥
स्वेदयेत्कन्दुके यन्त्रे घटिकाद्वितयं ततः ।
तां च पिण्डीं दृढे वस्त्रे बद्ध्वा निष्पीड्य काष्ठतः ॥ २३६ ॥
अधः पात्रस्थितं तैलं समाहृत्य नियोजयेत् ।
एवं कन्दुकयन्त्रेण सर्वतैलान्युपाहरेत् ॥ २३७ ॥

अथवा अङ्कोल बीज के चूर्ण को काञ्जी से घोटकर रात्रिपर्यन्त रख दें, फिर उस चूर्ण का गोला बना कर के एक हण्डिका में पानी भर कर गले पर एक वस्त्र बांध देना चाहिए । उस वस्त्र के मध्य भाग में गोला रख कर ऊपर से एक सकोरे से ढक कर के बन्द कर देना चाहिए, पश्चात् उस यन्त्र (कन्दुकेनामक) को अग्नि पर चढाकर दो घड़ी तक स्वेदन करना चाहिए। बाद में उस स्वेदित गोले को मजबूत वस्त्र के अन्दर बांधकर दो काष्ठों के बीच दबाकर नीचे के पात्र में निकले हुए तैल को निकाल कर यथामति सर्वत्र प्रयोग करें, इसी प्रकार बनाये हुए कन्दुक नाम के यन्त्र से सर्व प्रकार के तैलों को निकालना चाहिए ॥ २३५-२३७ ॥

मतान्तरम्—

अङ्कोलस्यापि तैलं स्यात्काकतुण्ड्या समूलया ॥ २३८ ॥

अथवा जड़ के सहित श्वेत गुञ्जा को पीस कर उसके रस से अङ्कोल के बीजों

२०२ रसरत्नसमुच्चये—

को घोट कर कन्दुकनामक (१) यन्त्र से तैल निकालते हैं ॥ २३८ ॥

तैलपातनम्—

वाकुचीदेवदाल्याश्च कर्कोटीमूलतो भवेत् ॥ २३९ ॥

कर्कोटी (बांझककोड़ा) के जड़ के रस से वाकुची और वन्दाल के बीजों को पीस कर उपर्युक्तविधि से तैल निकालते हैं ॥ २३९ ॥

अथ विषमुष्टितैलपातनम्—

अपामार्गकषायेण तैलं स्याद्विषमुष्टिजम् ॥ २४० ॥

अपामार्ग के खरस से कुचले को घोट कर उपर्युक्तविधि से तैल निकालते हैं॥ २४०॥

अथ जैपालतैलपातनम्—

मूलक्वाथैः कुमार्याश्च तैलं जेपालजं हरेत् ॥ २४१ ॥

घृतकुमारी की जड़ के रस से जैपाल (जमालगोटा) बीज को पीसकर तैल निकालना चाहिए ॥ २४१ ॥

वाकुचीतैलाहरणविधिः—

क्वाथैरक्तापामार्गस्य बाकुचीतैलमाहरेत् ॥ २४२ ॥

लाल अपामार्ग (लालदण्डी घोंघा) के क्वाथ से बाकुची बीजों को घोट कर तैल निकालना चाहिए ॥ २४२ ॥

अथ कृष्णमिश्रश्वेतगुञ्जाबीजतैलपातनविधिः—

कृष्णायाः काकतुण्ड्याश्च बीजचूर्णानि कारयेत् । कान्तपाषाणचूर्णं च एकीकृत्य निरोधयेत् । धान्यराशिगतं पश्चादुद्धृत्य तैलमाहरेत् ॥ २४३ ॥

इति श्रीवैद्यपतिसिंहगुप्तस्य सूनोर्वाग्भट्टाचार्यस्य कृतौ रसरत्नसमुच्चये लोहशोध- नमारणादिनिरूपणं नाम पञ्चमोऽध्यायः ॥ ५ ॥


पिप्पली, श्वेतगुञ्जा और कान्तपाषाण का चूर्ण, इन सब को बराबर २ लेकर जल से पीस लें। फिर इस कल्क को किसी पात्र में बन्दकर धान के ढेर में एक


( १ ) साम्बुस्थालीमुखे बद्धे वस्त्रे स्वेद्यं निधाय च ।
पिधाय पच्यते यत्र तद् यन्त्रं कन्दुकं स्मृतम् ॥

षष्ठोऽध्यायः । | २०३

पक्ष तक गाड़ देना चाहिए । फिर इस कल्क को दो काष्ठ के पट्टों के बीच में दबाकर तैल निकालना चाहिए ॥ २४३ ॥

इति श्रीकृष्णान्त्मजेन पण्डितप्रवरेण श्रीअम्बिकादत्तशास्त्रिणा विरचितायां
रसरत्नसमुच्चयस्य रत्नोज्ज्वलाख्य-भाषाटीकायां
लोहशोधनमारणादिनिरूपणं नाम पञ्चमोऽध्यायः।


अथ षष्ठोऽध्यायः।

शिष्योपनयननिरूपणम्—

अथ क्रमयुक्तशास्त्रम्—

रसशास्त्राणि सर्वाणि समालोच्य यथाक्रमम् ।
साधकानां हितार्थाय प्रकटीक्रियतेऽधुना ॥ १ ॥

यथाक्रम से सब रस के शास्त्रों का उत्तम प्रकार से अवलोकन कर रस शास्त्र को जानने की इच्छा वाले साधकों के हित के लिये रसशास्त्र का वर्णन किया जाता है॥१॥

शास्त्रक्रमयोः परस्परापेक्षा—

न क्रमेण विना शास्त्रं न शास्त्रेण विना क्रमः ।
शास्त्रं क्रमयुतं ज्ञात्वा यः करोति स सिद्धिभाक् ॥ २ ॥

जिस शास्त्र में पौर्वापर्य्यरूप क्रम नहीं रहता है वह शास्त्र उत्तम शास्त्र नहीं है और शास्त्रप्रमाण से शून्य क्रम भी उत्तम क्रम नहीं है, इस कारण जो साधक क्रमानुसार शास्त्र को जान कर रसादिकर्म करने में प्रवृत्त होता है वही सिद्धि को प्राप्त करता है ॥ २ ॥

रसविद्यागुरुः—

आचार्यो ज्ञानवान्दक्षो रसशास्त्रविशारदः ।
मन्त्रसिद्धो महावीरो निश्चलः शिववत्सलः ॥ ३ ॥
देवीभक्तः सदा धीरो देवतायागतत्परः ।
सर्वाम्नायविशेषज्ञः कुशलो रसकर्मणि ।

२०४ रसरत्नसमुच्चये—

एवं लक्षणसंयुक्तो रसविद्यागुरुर्भवेत् ॥ ४ ॥

रसशास्त्र का उपदेशक आचार्य शास्त्र का पूर्णज्ञाता, रसनिर्माणक्रिया में चतुर, रसशास्त्र का पूर्ण विद्वान, मन्त्र की सिद्धि से युक्त, शूरवीर, गम्भीर चित्त वाला तथा शिव का भक्त, देवी का भक्त, सदा धैर्यता से काम करने वाला, देवता प्रसाधक, यज्ञ कर्म में संलग्न, प्रायः सर्व वेद दर्शनादि शास्त्रों का विशेषज्ञ, पारद तथा सर्व रस कर्म में निपुण, इतने लक्षणों से यदि सम्पन्न हो तो वह रसशास्त्र का आचार्य हो सकता है ॥ ३-४ ॥

अथ शिष्यगुणाः—

गुरुभक्ताः सदाचाराः सत्यवन्तो दृढव्रताः ।
निरालस्याः स्वधर्मज्ञाः सदाऽऽज्ञापरिपालकाः ॥ ५ ॥
दम्भमात्सर्यनिर्मुक्ताः कुलाऽऽचारेषु दीक्षिताः ।
अत्यन्तसाधकाः शान्ता मन्त्राऽऽराधनतत्पराः ॥
इत्येवं लक्षणैर्युक्ताः शिष्याः स्युः सूतसिद्धये ॥ ६ ॥

गुरु के भक्त, सदाचारसम्पन्न, सत्यवादी, अपने नियत (व्रत) में दृढ, आलस्य से रहित, स्वधर्म के जानने वाले, सर्वदा आप्त जनों की आज्ञा का पालन करने वाले और पाखण्ड तथा मात्सर्य से रहित, अपने कुलपरम्परा से प्राप्त आचार को मानने वाले, शान्तस्वभाव, रसादिविद्याग्रहण करने में अत्यन्त उत्साही और मन्त्रों के सिद्ध करने में प्रयत्नशील, इन लक्षणों से युक्त शिष्य सूत को सर्वसिद्धिप्रद बनाने में समर्थ हो सकते हैं तथा वे ही रसविद्या जानने के अधिकारी हैं ॥ ५-६ ॥

अथानुचरगुणाः—

सहायाः सोद्यमास्तत्र तथा शिष्यास्ततोऽधिकाः ।
कुलीनाः स्वामिभक्ताश्च कर्तव्या रसकर्मणि ॥ ७ ॥

जो सेवक उद्योगशील, शिष्य से भी अधिक गुण सम्पन्न तथा उत्तमकुल में उत्पन्न और स्वामीभक्त हों उन्हें रसकर्म में नियुक्त करना चाहिए ॥ ७ ॥

अथायोग्यशिष्याः—

नास्तिका ये दुराचाराश्चुम्बका गुरुतोऽपरात् ।
विद्यां ग्रहीतुमिच्छन्ति चौर्यच्छृङ्खलोत्सवात् ॥ ८ ॥

षष्ठोऽध्यायः ।
२०५

न तेषां सिध्यते किञ्चिन्मणिमन्त्रौषधादिकम् ।
कुर्वन्ति यदि मोहेन नाशयन्ति स्वकं धनम् ॥
इह लोके सुखं नास्ति परलोके तथैव च ॥ ९ ॥
तस्माद्भक्तिबलादेव सन्तुष्यति यदा गुरुः ।
तदा शिष्येण सा ग्राह्या रसविद्याऽऽत्मसिद्धये ।
हस्तमस्तकयोगेन वरं लब्ध्वा सुसाधयेत् ॥ १० ॥

जो शिष्य नास्तिक अर्थात् गुरु, शास्त्र, देव, धर्म, स्वर्गादि और पाप तथा पुण्य में विश्वास नहीं करते हों, दुष्ट आचार विचार वाले, गुरु को छोड़ कर अन्य से या गुरुही से चोरी, कपट और दुष्टता को छिपाकर विद्या की प्राप्ति के इच्छुक हों उनको मणि मन्त्र और औषध में से कुछ भी यथार्थ रूप से प्राप्त नहीं होता है और यदि वे मोह के वश से रसविद्या की सिद्धि में प्रवृत्त होते हैं तो स्वकीय धन का नाश कर इस लोक और परलोक में सुख से वञ्चित ही रहते हैं । इसलिये जब गुरु भक्तिभाव से प्रसन्न हो जायं तब उनसे आत्मसिद्धि के लिये रसविद्या ग्रहण करनी चाहिए। फिर गुरु को बद्धाञ्जलि होकर शिर से प्रणाम करके आशीर्वाद प्राप्त कर रसकर्म का साधन करना चाहिए ॥ ८–१० ॥

अथ रससाधनरसशालारसमण्डपाः—

आतङ्करहिते देशे धर्मराज्ये मनोरमे ।
उमामहेश्वरोपेते समृद्धे नगरे शुभे ॥ ११ ॥
कर्त्तव्यं साधनं तत्र रसराजस्य धीमता ।
अत्यन्तोपवने रम्ये चतुर्द्वारोपशोभिते ॥ १२ ॥
तत्र शाला प्रकर्त्तव्या सुविस्तीर्णा मनोरमा ।
सम्यग्वातायनोपेता दिव्यचित्रैर्विचित्रिता ॥ १३ ॥
तत्समीपे समे दीप्ते कर्त्तव्यं रसमण्डपम् ।
अतिगुप्तं सुविस्तीर्णं कपाटार्गलशोभितम् ॥ १४ ॥
ध्वजछत्रवितानाढ्यं पुष्पमालाविलम्बितम् ।
भेरीकाहलघण्टादिशृङ्गीनादविनादितम् ॥ १५ ॥
भूः समा तत्र कर्त्तव्या सुदृढा दर्पणोपमा ।
तन्मध्ये वेदिका रम्या कर्त्तव्या लक्षणान्विता ॥ १६ ॥

२०६ रसरत्नसमुच्चये—

जो नगर रोग से रहित, धर्म पूर्वक राज्य से युक्त, मनोहर, शिव तथा पार्वती के निवास से पवित्र, देश के समृद्ध तथा शुभ हो ऐसे शहर में रस का साधन करना चाहिए और जहां पर अत्यन्त रमणीक तथा चार द्वार वाला उपवन बनवाकर उसमें अत्यन्त विस्तृत ( लम्बी, चौड़ी ) मनोहर तथा सुन्दर २ खिड़कियों और झरोखों से युक्त और जिस मेंअनेक धन्वन्तरि, सिद्धिरसायन, शास्त्र के प्रवर्तक आचार्य, देवता, तथा यन्त्रादिक उपकरणों के चित्र लगे हों ऐसी रसशाला बनवानी चाहिये। उसी रसशाला के समीप प्रकाशवाली समान भूमि में एक रसमण्डप बनाना चाहिए जो कि अत्यन्त शुभ, खूब लम्बा चौड़ा, सुन्दर किंवाड़ और अर्गला से युक्त हो और पताकाएं, छत्र, वितान ( चन्दोवा ) जिसमें लगे हों और चारों तरफ सुगन्धित पुष्पों की मालाओं के टांकने से सुशोभित तथा भेरी मृदङ्ग, शंख, घड़ियाल घण्टा आदि वाद्यों से शब्दायमान होना चाहिए। उसी मण्डप की भूमि समान, दृढ और दर्पण के समान चमकदार होनी चाहिए, और उसके बीचों बीच शास्त्रानुसार शुभ लक्षणों वाली अत्यन्त सुन्दर वेदिका का निर्माण कराना चाहिए॥११-१६॥

रसलिङ्गस्थापनादि—

निष्कत्रयं हेमपत्रं रसेन्द्रं नवनिष्ककम् ।
अम्लेन मर्दयेद्यामं तेन लिङ्गन्तु कारयेत् ॥ १७ ॥
दोलायन्त्रे सारनाले जम्बीरस्थं दिनं पचेत् ।
तल्लिङ्गं पूजयेत्तत्र सुशुभैरुपचारकैः ॥ १८ ॥

तीन निष्क ( १२ मासा ) शुद्ध स्वर्ण के पत्र और नौ निष्क ( ८ मा० ) पारद लेकर दोनों को निम्बू के रस से एक प्रहर तक घोट कर इनका शिवलिंग बनवा लेना चाहिये, फिर उस लिङ्ग को बड़े निम्बू के बीच में रख कर काञ्जी में दोलायन्त्र के द्वारा एक दिन तक पकाना चाहिये, पश्चात् उसका वेदिका के मध्य में स्थापन करा कर सुन्दर उपचारों से यथाशास्त्र पूजन करना चाहिये॥१७-१८॥

रसलिङ्गपूजनफलम्—

लिङ्गकोटिसहस्रस्य यत्फलं सम्यगर्च॑नात् ।
तत्फलं कोटिगुणितं रसलिङ्गार्चनाद्भवेत् ॥ १९ ॥
ब्रह्महत्यासहस्राणि गोहत्याश्चायुतानि हि ।
तत्क्षणाद्विलयं यान्ति रसलिङ्गस्य दर्शनात् ॥ २० ॥

षष्ठोऽध्यायः । २०७

षष्ठोऽध्यायः । २०७

स्पर्शानात्प्राप्यते मुक्तिरिति सत्यं शिवोदितम् ।
आग्नेय्यां श्रीअघोरेण मन्त्रराजेन चार्चयेत् ॥ २१ ॥

एक सहस्रकरोड़ शिवलिङ्गों की यथाविधि पूजन करने से जो फल होता है उससे भी करोड़ों गुना अधिक फल रसलिङ्ग की पूजन करने से प्राप्त होता है । हजारों ब्रह्महत्याओं से तथा लाखों गोहत्याओं से जो पाप उत्पन्न होता है वह केवल रसलिङ्ग के दर्शन कर लेने से क्षण भर में नष्ट हो जाता है । श्रीशिवजी ने कहा है कि इस लिङ्ग के स्पर्श करने से मुक्ति प्राप्त होती है, यह सत्य है । अग्निकोण में रसलिङ्ग की स्थापना करके सब मन्त्रों में प्रधान जो अघोरमन्त्र(१) है उससे उसकी पूजन करनी चाहिए ॥ १९-२१ ॥

ध्यानम्—
अष्टादशभुजं शुभ्रं पञ्चवक्त्रं त्रिलोचनम् ।
प्रेतारूढं नीलकण्ठं रसलिङ्गं विचिन्तयेत् ॥ २२ ॥
तस्योत्सङ्गे महादेवीमेकवक्त्रां चतुर्भुजाम् ।
अक्षमालाङ्कुशं दत्ते वामे पाशाभयं शुभम् ॥
दधतीं तप्तहेमाभां पीतवस्त्रां विभावयेत् ॥ २३ ॥

रसलिङ्ग का ध्यान—जिनके १८ भुजाएं हैं और जिनका गौरवर्ण हैं तथा जिनके ५ मुख और तीन नेत्र हैं और प्रेत (मृतक) के ऊपर आरूढ़, नीलकण्ठ-वाले ऐसे महादेव जी का रसलिङ्ग में अपना ध्यान बैठाना चाहिए, अर्थात् यह रसलिङ्ग एक तरह से शिवस्वरूप ही है और शिवस्वरूप उस रसलिङ्ग की प्रतिमा की गोद में अद्वितीयमुखवाली तथा चार भुजाओं से शोभायमान, दक्षिणहस्त में रुद्राक्षमाला और अङ्कुश और वामहस्त में शुभ पाश धारण की हुई और एक हस्त से भक्तजनों को शुभ अभयप्रदान करती हुई, सन्तप्त सुवर्ण की कान्ति के समान दैदीप्यमान एवं पीतवस्त्र धारण की हुई महादेवी श्री पार्वती का ध्यान करना चाहिए ॥ २२-२३ ॥

देवीपूजनमन्त्रम् ।
"वाङ्मयी श्रीः कामराजशक्तिबीजं रसाङ्कुशा-


( १ ) अघोरमन्त्रः-अघोरेभ्योऽथघोरेभ्यो घोरघोरतरेभ्यश्च ।
सर्व्वतः सर्व्वसर्वेभ्यो नमस्ते रुद्ररूपेभ्यः ॥

२०८ रसरत्नसमुच्चये—

य नमो" द्वादशार्णेषा ज्ञेया विद्या रसाङ्कुशा ॥ २४ ॥
अनया पूजयेद्देवीं गन्धपुष्पाक्षतादिभिः ।
नन्दीभृङ्गीमहाकालकुलीरान्पूर्वदिक्क्रमात् ॥ २५ ॥
पूजयेन्नाममन्त्रैश्च प्रणवादिनमोन्तकैः ।
एवं नित्यार्चनं तत्र कर्तव्यं रससिद्धये ॥ २६ ॥

"ॐ वाग्वायीश्रीः" इत्यादि २४ वें श्लोक में कहे मन्त्र का उच्चारण करते हुए गन्ध, पुष्प, अक्षत, नैवेद्य, दीप आदि से श्री पार्वती देवी की पूजन करे पश्चात् यथाक्रम से रसलिङ्ग के पूर्व दिशा में नन्दी, पश्चिम में भृङ्गी, उत्तर में महाकाल और दक्षिण में कुलीर गण की स्थापना करके इनके नाम के आदि में ॐकार तथा अन्त में नमः-शब्द लगाकर (जैसे ॐ नन्दिने नमः) मन्त्र का उच्चारण करते हुए चारों की पूजन करनी चाहिए । इस तरह रससिद्धि की प्राप्ति के लिये उस रस मण्डप में सदा पूजन करनी चाहिए ॥ २४-२६ ॥

अथ कुम्भस्थापनादिशिष्यदीक्षादानविधिः—

रसविद्या शिवेनोक्ता दातव्या साधकाय वै ।
यथोक्तेन विधानेन गुरुणा मुदितात्मना ॥ २७ ॥
सुमुहूर्ते सुनक्षत्रे चन्द्रताराबलान्विते ।
कलशं तोयसम्पूर्णं हेमरत्नफलैर्युतम् ॥ २८ ॥
स्थापयेद्रसलिङ्गाग्रे दिव्यवस्त्रेण वेष्टितम् ।
गन्धपुष्पाक्षतैर्धूपनैवेद्यश्च सुपूजयेत् ॥ २९ ॥
पूजान्ते हवनं कुर्याद्योनिकुण्डे सुलक्षणे ।
तिलाज्यैः पायसैः पुष्पैः शतपुष्पादिकैः पृथक् ॥ ३० ॥
अघोरेण रसाङ्कुश्या होमान्ते शिष्यमाह्वयेत् ।
कालिनीशक्तिसंयुक्तं रससिद्धिपरायणम् ॥ ३१ ॥

यह रसविद्या श्रीशिवजी ने कही है । इस विद्या को प्राप्त करने की इच्छा रखने वाले साधक को प्रसन्नचित्त गुरु द्वारा शास्त्रोक्तविधि के अनुसार शुभ मुहूर्त, शुभ नक्षत्र तथा शुभचन्द्रबल और शुभताराबल के समय में पूजन हवनादि करके प्रदान करनी चाहिए ।

**पूजनविधि—**उपर्युक्त शुभ दिन में जल से भरा हुआ और सुवर्ण,

षष्ठोऽध्यायः। २०९

रत्न, फल पुष्पों से युक्त दिव्यवस्त्र से वेष्टित (ढका हुआ) एक कलश रसलिङ्ग के सामने स्थापित करके उसको गन्ध, पुष्प, अक्षत और नैवेद्य से अच्छी प्रकार जन करनी चाहिए। फिर पूजन के पश्चात् योनि के समान आकार वाले उत्तम कुण्ड में तिल, घृत, क्षीरान्न, पुष्प, क्षौफ इत्यादि पृथक् २ पदार्थों के द्वारा अघोर रसाङ्कुशीमन्त्र का उच्चारण करते हुए अथवा श्रो अघोरमन्त्र से रसा-ङ्कुशी देवी के निमित्त हवन करना चाहिए। होम हो जाने के पश्चात् वक्ष्यमाण-लक्षणों से युक्त कालिनीशक्ति से युक्त और रस की सिद्धि करने में परायण शिष्य को समीप बुलाना चाहिए ॥ २७-३१ ॥

अथ कालिनीलक्षणम्— यस्यास्तु कुञ्चिताः केशाः श्यामा या पद्मलोचना । सुरूपा तरुणी भिन्ना विस्तीर्णजघना शुभा ॥ ३२ ॥ सङ्कीर्णहृदया पीनस्तनभारेण नम्निता । चुम्बनालिङ्गनस्पर्शकोमला मृदुभाषिणी ॥ ३३ ॥ अश्वत्थपत्रसदृशयोनिश्रदेशसुशोभिता । कृष्णपक्षे पुष्पवती सा नारी कालिनी स्मृता ॥ रसबन्धे प्रयोगे च उत्तमा सा रसायने ॥ ३४ ॥

जिस स्त्री के घुंघरीले बाल हों और जो श्याम अङ्ग की या सोलह वर्ष की हो तथा कमल के समान विशाल और मनोहर नेत्रों से शोभायमान, सुन्दर लावण्ययुक्त, युवती (यौवनमदोन्मत्त) और प्रस्फुटित योनिरवाली और विस्तीर्ण जंघाओं वाली, शुभलक्षणों से युक्त, संकीर्ण (प्रसन्न) हृदय वाली और जो बड़े २ स्तनों के भार से कुछ झुकी हुई हो तथा चुम्बन, आलिङ्गन और स्पर्श में कोमल प्रतीत होने वाली, मधुर आलाप (भाषण) शील तथा जिस का योनि-प्रदेश पीपल के पत्ते की रचना के समान सुशोभित हो और जो कृष्णपक्ष में रजस्वला होती हो वह स्त्री कालिनी कहलाती है। कालिनी स्त्री रस के बन्धन करने में, प्रयोग में और रसायन में उत्तम होती है ॥ ३२-३४ ॥

अथ कालिन्यभावे तदनुकल्पविधिः— तदभावे सुरूपा तु या काचित्तरुणाङ्गना । तस्या देयं त्रिसप्ताहं गन्धकं घृतसंयुक्तम् ।

रस० १४

२१० रसरत्नसमुच्चये-

कर्षैकैकं प्रभाते तु सा भवेत्कालिनीसमा ॥ ३५ ॥
एवं शक्तियुतो योऽसौ दीक्षयेत्तं गुरुत्तमः ।
सुस्नातमभिषिञ्चेत् मन्त्रेण कलशोदकैः ॥ ३६ ॥
अघोरामङ्कुशीं विद्यां दद्याच्छिष्याय सद्गुरुः ।
यथाशक्त्या सुशिष्येण दातव्या गुरुदक्षिणा ॥ ३७ ॥
अथाज्ञया गुरोर्मन्त्रं लक्षं लक्षं पृथग्जपेत् ।
“ॐ ह्रां ह्रीं हम् अघोरतरप्रस्फुट २ प्रकट २ कह २ शमय २ जात २ दह २ पातय २ ॐ ह्रीं हैं हौं हम् अघोराय फट्” इममघोरमन्त्रन्तु
“ओम् कामराजशक्तिवीजरसाङ्कुशायै आज्ञया विद्यां रसाङ्कुशाम्” ॥
अनया पूजयेद्देवीं शक्तिमङ्कुशविद्यया ॥ ३८ ॥

यदि उपर्युक्त लक्षणों वाली कालिनी स्त्री न मिल सके तो सुन्दररूपवाली किसी भी तरुण स्त्री को २१ दिन तक एक २ कर्ष शुद्ध गन्धक घृत के साथ प्रातः सेवन कराने से वह स्त्री कालिनी के समान सर्व गुणों से युक्त हो जाती है जो शिष्य इस कालिनी स्त्री के साथ दीक्षाग्रहण करने के योग्य हो तो उत्तम गुरु उसको दीक्षित करे । प्रथम स्नान किये हुए शिष्य को गुरु कलश के जल से मन्त्रों का उच्चारण करते हुए अभिषिक्त करे, फिर सद्गुरु शिष्य को अघोर और अङ्कुशी विद्या का उपदेश दे, और अपनी शक्ति के अनुसार दीक्षा के पश्चात् गुरू जी को दक्षिणा दे कर फिर गुरुजी की आज्ञा से दोनों मन्त्रों का पृथक २ एक लाख जप करना चाहिए। इस अंकुशी विद्या(१) के द्वारा शक्तिस्वरूप देवी का पूजन करे ॥ ३५-३८ ॥

तत्र होमविधिः—

दशांशं जुहुयात्कुण्डे त्रिकोणे हस्तमात्रके ।
जातिपुष्पं त्रिमध्वक्तं पूर्णान्ते कन्यकार्चनम् ॥ ३९ ॥

पूजन करने के पश्चात् एक हाथ चौड़ा त्रिकोण के आकार वाला एक हवन का


( १ ) मूलपाठ में मन्त्र का यह स्वरूप लिखा है । ॐ ह्रां ह्रीं हूम, अघोर तर प्रस्फुट २ प्रकट २ कह २ शमय २ जात २ दह २ पातय २ ॐ ह्रीं ह्रौं हौं हूम, अघोराय फट् इममघोरमन्त्रन्तु ॐ कामराजशक्तिबीजरसाङ्कुशायै आज्ञया विद्या रसाङ्कुशाम् ।