भारतकोश
रसरत्नसमुच्चय (सुरत्नोज्ज्वला हिन्दी व्याख्या सहित)

रसरत्नसमुच्चय (सुरत्नोज्ज्वला हिन्दी व्याख्या सहित)

Rasaratna Samuchchaya Hindi

रस-वाग्भटाचार्य (टीकाकार: पं. अम्बिकादत्त शास्त्री) द्वारा

स्रोत: Rasaratna Samuchchaya with Suratnojjvala Hindi Commentary by Pt. Ambika Datta Shastri (1939) (उद्गम)

DevanagariHindipublished362 पृष्ठ

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२०६ रसरत्नसमुच्चये—

जो नगर रोग से रहित, धर्म पूर्वक राज्य से युक्त, मनोहर, शिव तथा पार्वती के निवास से पवित्र, देश के समृद्ध तथा शुभ हो ऐसे शहर में रस का साधन करना चाहिए और जहां पर अत्यन्त रमणीक तथा चार द्वार वाला उपवन बनवाकर उसमें अत्यन्त विस्तृत ( लम्बी, चौड़ी ) मनोहर तथा सुन्दर २ खिड़कियों और झरोखों से युक्त और जिस मेंअनेक धन्वन्तरि, सिद्धिरसायन, शास्त्र के प्रवर्तक आचार्य, देवता, तथा यन्त्रादिक उपकरणों के चित्र लगे हों ऐसी रसशाला बनवानी चाहिये। उसी रसशाला के समीप प्रकाशवाली समान भूमि में एक रसमण्डप बनाना चाहिए जो कि अत्यन्त शुभ, खूब लम्बा चौड़ा, सुन्दर किंवाड़ और अर्गला से युक्त हो और पताकाएं, छत्र, वितान ( चन्दोवा ) जिसमें लगे हों और चारों तरफ सुगन्धित पुष्पों की मालाओं के टांकने से सुशोभित तथा भेरी मृदङ्ग, शंख, घड़ियाल घण्टा आदि वाद्यों से शब्दायमान होना चाहिए। उसी मण्डप की भूमि समान, दृढ और दर्पण के समान चमकदार होनी चाहिए, और उसके बीचों बीच शास्त्रानुसार शुभ लक्षणों वाली अत्यन्त सुन्दर वेदिका का निर्माण कराना चाहिए॥११-१६॥

रसलिङ्गस्थापनादि—

निष्कत्रयं हेमपत्रं रसेन्द्रं नवनिष्ककम् ।
अम्लेन मर्दयेद्यामं तेन लिङ्गन्तु कारयेत् ॥ १७ ॥
दोलायन्त्रे सारनाले जम्बीरस्थं दिनं पचेत् ।
तल्लिङ्गं पूजयेत्तत्र सुशुभैरुपचारकैः ॥ १८ ॥

तीन निष्क ( १२ मासा ) शुद्ध स्वर्ण के पत्र और नौ निष्क ( ८ मा० ) पारद लेकर दोनों को निम्बू के रस से एक प्रहर तक घोट कर इनका शिवलिंग बनवा लेना चाहिये, फिर उस लिङ्ग को बड़े निम्बू के बीच में रख कर काञ्जी में दोलायन्त्र के द्वारा एक दिन तक पकाना चाहिये, पश्चात् उसका वेदिका के मध्य में स्थापन करा कर सुन्दर उपचारों से यथाशास्त्र पूजन करना चाहिये॥१७-१८॥

रसलिङ्गपूजनफलम्—

लिङ्गकोटिसहस्रस्य यत्फलं सम्यगर्च॑नात् ।
तत्फलं कोटिगुणितं रसलिङ्गार्चनाद्भवेत् ॥ १९ ॥
ब्रह्महत्यासहस्राणि गोहत्याश्चायुतानि हि ।
तत्क्षणाद्विलयं यान्ति रसलिङ्गस्य दर्शनात् ॥ २० ॥