भारतकोश
रसरत्नसमुच्चय (सुरत्नोज्ज्वला हिन्दी व्याख्या सहित)

रसरत्नसमुच्चय (सुरत्नोज्ज्वला हिन्दी व्याख्या सहित)

Rasaratna Samuchchaya Hindi

रस-वाग्भटाचार्य (टीकाकार: पं. अम्बिकादत्त शास्त्री) द्वारा

स्रोत: Rasaratna Samuchchaya with Suratnojjvala Hindi Commentary by Pt. Ambika Datta Shastri (1939) (उद्गम)

DevanagariHindipublished362 पृष्ठ

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षष्ठोऽध्यायः ।
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न तेषां सिध्यते किञ्चिन्मणिमन्त्रौषधादिकम् ।
कुर्वन्ति यदि मोहेन नाशयन्ति स्वकं धनम् ॥
इह लोके सुखं नास्ति परलोके तथैव च ॥ ९ ॥
तस्माद्भक्तिबलादेव सन्तुष्यति यदा गुरुः ।
तदा शिष्येण सा ग्राह्या रसविद्याऽऽत्मसिद्धये ।
हस्तमस्तकयोगेन वरं लब्ध्वा सुसाधयेत् ॥ १० ॥

जो शिष्य नास्तिक अर्थात् गुरु, शास्त्र, देव, धर्म, स्वर्गादि और पाप तथा पुण्य में विश्वास नहीं करते हों, दुष्ट आचार विचार वाले, गुरु को छोड़ कर अन्य से या गुरुही से चोरी, कपट और दुष्टता को छिपाकर विद्या की प्राप्ति के इच्छुक हों उनको मणि मन्त्र और औषध में से कुछ भी यथार्थ रूप से प्राप्त नहीं होता है और यदि वे मोह के वश से रसविद्या की सिद्धि में प्रवृत्त होते हैं तो स्वकीय धन का नाश कर इस लोक और परलोक में सुख से वञ्चित ही रहते हैं । इसलिये जब गुरु भक्तिभाव से प्रसन्न हो जायं तब उनसे आत्मसिद्धि के लिये रसविद्या ग्रहण करनी चाहिए। फिर गुरु को बद्धाञ्जलि होकर शिर से प्रणाम करके आशीर्वाद प्राप्त कर रसकर्म का साधन करना चाहिए ॥ ८–१० ॥

अथ रससाधनरसशालारसमण्डपाः—

आतङ्करहिते देशे धर्मराज्ये मनोरमे ।
उमामहेश्वरोपेते समृद्धे नगरे शुभे ॥ ११ ॥
कर्त्तव्यं साधनं तत्र रसराजस्य धीमता ।
अत्यन्तोपवने रम्ये चतुर्द्वारोपशोभिते ॥ १२ ॥
तत्र शाला प्रकर्त्तव्या सुविस्तीर्णा मनोरमा ।
सम्यग्वातायनोपेता दिव्यचित्रैर्विचित्रिता ॥ १३ ॥
तत्समीपे समे दीप्ते कर्त्तव्यं रसमण्डपम् ।
अतिगुप्तं सुविस्तीर्णं कपाटार्गलशोभितम् ॥ १४ ॥
ध्वजछत्रवितानाढ्यं पुष्पमालाविलम्बितम् ।
भेरीकाहलघण्टादिशृङ्गीनादविनादितम् ॥ १५ ॥
भूः समा तत्र कर्त्तव्या सुदृढा दर्पणोपमा ।
तन्मध्ये वेदिका रम्या कर्त्तव्या लक्षणान्विता ॥ १६ ॥