रसरत्नसमुच्चय (सुरत्नोज्ज्वला हिन्दी व्याख्या सहित)
Rasaratna Samuchchaya Hindi
रस-वाग्भटाचार्य (टीकाकार: पं. अम्बिकादत्त शास्त्री) द्वारा
स्रोत: Rasaratna Samuchchaya with Suratnojjvala Hindi Commentary by Pt. Ambika Datta Shastri (1939) (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें२०४ रसरत्नसमुच्चये—
एवं लक्षणसंयुक्तो रसविद्यागुरुर्भवेत् ॥ ४ ॥
रसशास्त्र का उपदेशक आचार्य शास्त्र का पूर्णज्ञाता, रसनिर्माणक्रिया में चतुर, रसशास्त्र का पूर्ण विद्वान, मन्त्र की सिद्धि से युक्त, शूरवीर, गम्भीर चित्त वाला तथा शिव का भक्त, देवी का भक्त, सदा धैर्यता से काम करने वाला, देवता प्रसाधक, यज्ञ कर्म में संलग्न, प्रायः सर्व वेद दर्शनादि शास्त्रों का विशेषज्ञ, पारद तथा सर्व रस कर्म में निपुण, इतने लक्षणों से यदि सम्पन्न हो तो वह रसशास्त्र का आचार्य हो सकता है ॥ ३-४ ॥
अथ शिष्यगुणाः—
गुरुभक्ताः सदाचाराः सत्यवन्तो दृढव्रताः ।
निरालस्याः स्वधर्मज्ञाः सदाऽऽज्ञापरिपालकाः ॥ ५ ॥
दम्भमात्सर्यनिर्मुक्ताः कुलाऽऽचारेषु दीक्षिताः ।
अत्यन्तसाधकाः शान्ता मन्त्राऽऽराधनतत्पराः ॥
इत्येवं लक्षणैर्युक्ताः शिष्याः स्युः सूतसिद्धये ॥ ६ ॥
गुरु के भक्त, सदाचारसम्पन्न, सत्यवादी, अपने नियत (व्रत) में दृढ, आलस्य से रहित, स्वधर्म के जानने वाले, सर्वदा आप्त जनों की आज्ञा का पालन करने वाले और पाखण्ड तथा मात्सर्य से रहित, अपने कुलपरम्परा से प्राप्त आचार को मानने वाले, शान्तस्वभाव, रसादिविद्याग्रहण करने में अत्यन्त उत्साही और मन्त्रों के सिद्ध करने में प्रयत्नशील, इन लक्षणों से युक्त शिष्य सूत को सर्वसिद्धिप्रद बनाने में समर्थ हो सकते हैं तथा वे ही रसविद्या जानने के अधिकारी हैं ॥ ५-६ ॥
अथानुचरगुणाः—
सहायाः सोद्यमास्तत्र तथा शिष्यास्ततोऽधिकाः ।
कुलीनाः स्वामिभक्ताश्च कर्तव्या रसकर्मणि ॥ ७ ॥
जो सेवक उद्योगशील, शिष्य से भी अधिक गुण सम्पन्न तथा उत्तमकुल में उत्पन्न और स्वामीभक्त हों उन्हें रसकर्म में नियुक्त करना चाहिए ॥ ७ ॥
अथायोग्यशिष्याः—
नास्तिका ये दुराचाराश्चुम्बका गुरुतोऽपरात् ।
विद्यां ग्रहीतुमिच्छन्ति चौर्यच्छृङ्खलोत्सवात् ॥ ८ ॥