रसरत्नसमुच्चय (सुरत्नोज्ज्वला हिन्दी व्याख्या सहित)
Rasaratna Samuchchaya Hindi
रस-वाग्भटाचार्य (टीकाकार: पं. अम्बिकादत्त शास्त्री) द्वारा
स्रोत: Rasaratna Samuchchaya with Suratnojjvala Hindi Commentary by Pt. Ambika Datta Shastri (1939) (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें१९८ रसरत्नसमुच्चये—
'पाषाण से उत्पन्न होने वाले खनिज पदार्थ, खुर, सींग, शल्य (अस्थि) और महारसादियों में जो कठिन (दृढाङ्ग) पदार्थ वैक्रान्त, माक्षिक आदि हैं, उन्हें विधिपूर्वक शुद्ध करके भस्म के रूप में बनाने पर ही वे पारद के कार्य में उपयुक्त हो सकते हैं, अतः बुद्धिमान् को चाहिए कि यथाशास्त्र इनकी शुद्धि तथा भस्म करे' ॥ २१८ ॥
भूनागसत्त्वपातनम्—
वज्राणां द्रावणार्थाय सत्त्वं भूनागजं ब्रुवे ।
तदेव परमं तेजः सूतराजेन्द्रवज्रयोः ॥ २१९ ॥
धौतभूनागसम्भूतं मर्दयेद्भृङ्गजद्रवैः ।
निम्बूर्द्रवैश्च निर्गुण्ड्याः स्वरसैस्त्रिदिनं पृथक् ॥ २२० ॥
तद्द्रावणगणोपेतं सम्मर्द्य वटकीकृतम् ।
निरुध्य दृढमूषायां द्विण्डं प्रधमेद् दृढम् ॥ २२१ ॥
स्वतः शीतं समाहृत्य पट्टके विनिवेश्य तत् ।
रवकान् राजिकातुल्यानैशूनतिभरान्वितान् ॥ २२२ ॥
द्वादशांशार्कसंयुक्तानध्मित्वा रवकान्हरेत् ।
प्रक्षाल्य रवकानाशु समादाय प्रयत्नतः ॥ २२३ ॥
वज्रादिद्रावणं तेन प्रकुर्वीत यथेप्सितम् ।
खरसत्त्वमिदं प्रोक्तं रसायनमनुत्तमम् ।
द्वित्रिमूषासु चैकस्यां सत्त्वं भवति निश्चितम् ॥ २२४ ॥
भूनाग (केञ्चुआअर्थवर्म) का सत्त्व हीरकादि वज्रों के द्रावण करने में अत्यन्त उत्तम है तथा पारद और हीरक की शक्ति को बढाता है, इस लिये इस सत्त्व के पातन की विधि कहता हूं। जल से अच्छी प्रकार धोये हुए केञ्चुओं को सुखा कर उनका चूर्ण बना लेना चाहिए, फिर इस चूर्ण को भृङ्गराजरस (भांगरा), निम्बूरस और निर्गुण्डी स्वरस, से पृथक् २ तीन २ दिन तक मर्दनकरके द्रावक वर्ग के पदार्थ मिलाकर घोट लेना चाहिए। फिर टिकिया बनाकर एक मजबूत मूषा के अन्दर बन्द करके दो दण्ड (४८ मिनट) तक तेज अग्निद्वारा फूंकना चाहिए। स्वाङ्गशीत होने पर मूषा से उनको निकाल कर किसो पट्ट (काष्ठपट्ट या वस्त्र) पर डाल कर या वस्त्र से छान करके राई के बराबर मोटे २ तथा वजनी सत्त्व