रसरत्नसमुच्चय (सुरत्नोज्ज्वला हिन्दी व्याख्या सहित)
Rasaratna Samuchchaya Hindi
रस-वाग्भटाचार्य (टीकाकार: पं. अम्बिकादत्त शास्त्री) द्वारा
स्रोत: Rasaratna Samuchchaya with Suratnojjvala Hindi Commentary by Pt. Ambika Datta Shastri (1939) (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंपञ्चमोऽध्यायः । १९९
कणों को एकत्र करके उनमें १२ वां भाग शुद्ध ताम्र का चूर्ण मिला कर मूषायन्त्र में बन्द करके फूंक दे', फिर उन सत्त्वकणों को निकाल के जल से धोकर रख लेना चाहिए । इन से वज्रादि का द्रावण करना चाहिए। यह सत्त्व अत्यन्त उत्तम रसायन है तथा इसे खर सत्त्व कहते हैं, इस सत्त्व को सम्पूर्ण निकालने के लिये दो या तीन मूषा लेकर विधिपूर्वक कार्य करना चाहिए। कभी २ एक ही मूषा के द्वारा सम्पूर्ण सत्त्व निकल जाता है ॥ २१९-२२४ ॥
मतान्तरम्—
भुजङ्गमानुपादाय चतुष्प्रस्थसमन्वितान् ।
सुवर्णरूप्यताम्रायस्कान्तसम्भूतिभूमिजान् ॥ २२५ ॥
प्रक्षाल्य रजनीतोयैः शीतलैश्च जलैरपि ।
उपोषितं मयूरं वा शूरं वा चरणायुधम् ॥ २२६ ॥
क्रमेण चारयित्वाथ तद्विष्ठां समुपाहरेत् ।
क्षाराम्लैः सह सम्पेष्य विशोष्य च खरातपे ॥ २२७ ॥
ततः खर्परके क्षिप्त्वा भर्जयित्वा मषीं चरेत् ।
मषीं द्रावणवर्गेण संयुक्तां सम्प्रमर्दिताम् ॥ २२८ ॥
निरुध्य कोष्ठिकामध्ये प्रधमेद्घटिकाद्वयम् ।
शीतलीभूतमूषायाः खोटमाहृत्य पेषयेत् ॥ २२९ ॥
प्रक्षाल्य रवकान् सूक्ष्मान् समादाय प्रयत्नतः ।
सुवर्णमानवद् ध्मात्वा रवं कृत्वा नियोजयेत् ॥ २३० ॥
सुवर्ण, रजत, ताम्र, कान्तलौह इत्यादि धातुएं जिन खानों से निकलती हैं उन खानों की मिट्टी में उत्पन्न होने वाले केंचुए ४ प्रस्थ ( २५६ या ३ सेर १६ तो० ) लेकर उन को हरिद्रा के स्वरस या क्वाथ से प्रथम अच्छी तरह धोकर दूसरी बार शीतल जल से धो कर साफ कर लेना चाहिए । फिर उन्हें एक भूखे मयूर या जवान कुक्कुट ( मुर्गा ) को खिला देवें । पश्चात् उस मयूर या मुर्गे की विष्ठा ( केंचुएं के खाने से निकली हुई ) को लेकर खल्व में क्षार और अम्ल वर्ग के पदार्थों के साथ घोटकर तेज धूप में सुखा ले', सूखने पर एक मिट्टी के खर्पर में उसे भुंजकर मषी अथवा कज्जली अथवा राख बनालेवे', फिर इस राख को द्रावकवर्ग की औषधियों के साथ घोटकर मूषायन्त्र में बन्दकर दो घड़ी तक