रसरत्नसमुच्चय (सुरत्नोज्ज्वला हिन्दी व्याख्या सहित)
Rasaratna Samuchchaya Hindi
रस-वाग्भटाचार्य (टीकाकार: पं. अम्बिकादत्त शास्त्री) द्वारा
स्रोत: Rasaratna Samuchchaya with Suratnojjvala Hindi Commentary by Pt. Ambika Datta Shastri (1939) (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें२०० | रसरत्नसमुच्चये—
अग्नि में फूके, स्वाङ्गशीत होने पर मूषा से भूनाग सत्त्व को निकालकर खल्व में पीस करके धोकर छोटे २ सत्त्व के कणों को यत्नपूर्वक निकाल ले', पश्चात् उन्हें मूषायन्त्र में बन्दकर स्वर्णद्रावण की विधि के अनुसार गला कर निकाल ले', फिर -चूर्ण कर प्रयोग करना चाहिए ॥ २२५–२३० ॥
अथ भूनागमुद्रिका—
भूनागोद्भवसत्त्वमुत्तममिदं श्रीसोमदेवोदितं
दत्तं पादमितं द्विशाणकनकेनैकं गतेनोर्मिकाम् ।
तद्धौताम्बुविलेपितं स्थिरचराद्भूतं विषं नेत्ररूक्
शूलं मूलगदं च कर्णजरुजो हन्यात्प्रसूतिग्रहम् ॥ २३१ ॥
इति भूनागाधिकारः ।
श्रीसोमदेव के द्वारा कथित उत्तम भूनागसत्त्व चतुर्थांश ( २ मासा ) लेकर दो शाण ( ८ मासा ) स्वर्ण के साथ गलाकर दोनों को मिला कर एक अंगूठी बनवा लेनी चाहिए, फिर उस अंगूठी को पानी में डाल कर निकाल लें, वह अंगूठी का पानी स्थावर और जंगमविषवाधा, नेत्ररोग, शूल, अर्श, कर्णरोग और प्रसूति-रोग को स्पर्शमात्र से नष्ट कर देता है ॥ २३१ ॥
अथ तैलपातनविधिः ।
मूलान्युत्तरवारुण्या जर्जरीकृत्य काञ्जिके ।
क्षिपेदङ्कोल्लबीजानां पेषिकां जर्जरीकृताम् ॥
तत्तैलं घृतवत्स्त्यानं ग्राह्यं तत्तु यथाविधि ॥ २३२ ॥
तैल भी बीजों का सत्त्व होता है इस लिये सत्त्व पातन के प्रकरण में उनके निकालने की विधि लिखते हैं । इन्द्रवारुणी की जड़ को काञ्जी में पीसकर उसमें अंकोल के बीजों को पीस कर मिला देना चाहिए, फिर एक वस्त्र की बनी हुई पोटली में इनको रखकर तेज धूप में किसी लकड़ी के सहारे लटका देना चाहिए । जब पोटली से तैल नीचे रखे बर्तन में चूकर घी के समान ( गाढ़ा ) घनीभूत हो जाय तब किसी पात्र (शीशी) में ले लेना चाहिए ॥ २३२ ॥
मतान्तरम्—
सम्पेष्योत्तरवारुण्याः पेटकार्या दलान्यथ ।
काञ्जिकेन ततस्तेन कल्केन परिमर्दयेत् ॥ २३३ ॥