रसरत्नसमुच्चय (सुरत्नोज्ज्वला हिन्दी व्याख्या सहित)
Rasaratna Samuchchaya Hindi
रस-वाग्भटाचार्य (टीकाकार: पं. अम्बिकादत्त शास्त्री) द्वारा
स्रोत: Rasaratna Samuchchaya with Suratnojjvala Hindi Commentary by Pt. Ambika Datta Shastri (1939) (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंपञ्चमोऽध्यायः । | २०१
रजश्चाङ्कोलबीजानां तद्बद्ध्वा विरलाम्बरे ।
तद्विलम्ब्याऽऽतपे तीव्रे तस्याधश्चषकं न्यसेत् ॥
तस्मिन्निपतितं तैलमादेयं श्वित्रनाशनम् ॥ २३४ ॥
अथवा इन्द्रायण के पत्ते तथा ज्योतिष्मती ( मालकंगुनी ) के पत्तों को काञ्जी में बारीक पीस कर कल्क बना लें, फिर इस कल्क के साथ अङ्कोल के बीजों के चूर्ण को पीस कर एक पतले वस्त्र में रख कर पोटली बनालें, फिर इस पोटली को तेज धूप में लटका करके नीचे एक काच का प्याला रख दें, फिर धूप के कारण पोटली से तैल चूकर प्याले में इकट्ठा हो जाता है, इस तैल को श्वेत कुष्ठ पर लगाने से वह अच्छा हो जाता है ॥ २३३-२३४ ॥
मतान्तरम्—
अङ्कोलबीजसम्भूतं चूर्णं सम्मर्द्य काञ्जिकैः ।
एकरात्रोषितं तत्तु पिण्डीकृत्य ततः परम् ॥ २३५ ॥
स्वेदयेत्कन्दुके यन्त्रे घटिकाद्वितयं ततः ।
तां च पिण्डीं दृढे वस्त्रे बद्ध्वा निष्पीड्य काष्ठतः ॥ २३६ ॥
अधः पात्रस्थितं तैलं समाहृत्य नियोजयेत् ।
एवं कन्दुकयन्त्रेण सर्वतैलान्युपाहरेत् ॥ २३७ ॥
अथवा अङ्कोल बीज के चूर्ण को काञ्जी से घोटकर रात्रिपर्यन्त रख दें, फिर उस चूर्ण का गोला बना कर के एक हण्डिका में पानी भर कर गले पर एक वस्त्र बांध देना चाहिए । उस वस्त्र के मध्य भाग में गोला रख कर ऊपर से एक सकोरे से ढक कर के बन्द कर देना चाहिए, पश्चात् उस यन्त्र (कन्दुकेनामक) को अग्नि पर चढाकर दो घड़ी तक स्वेदन करना चाहिए। बाद में उस स्वेदित गोले को मजबूत वस्त्र के अन्दर बांधकर दो काष्ठों के बीच दबाकर नीचे के पात्र में निकले हुए तैल को निकाल कर यथामति सर्वत्र प्रयोग करें, इसी प्रकार बनाये हुए कन्दुक नाम के यन्त्र से सर्व प्रकार के तैलों को निकालना चाहिए ॥ २३५-२३७ ॥
मतान्तरम्—
अङ्कोलस्यापि तैलं स्यात्काकतुण्ड्या समूलया ॥ २३८ ॥
अथवा जड़ के सहित श्वेत गुञ्जा को पीस कर उसके रस से अङ्कोल के बीजों