भारतकोश
रसरत्नसमुच्चय (सुरत्नोज्ज्वला हिन्दी व्याख्या सहित)

रसरत्नसमुच्चय (सुरत्नोज्ज्वला हिन्दी व्याख्या सहित)

Rasaratna Samuchchaya Hindi

रस-वाग्भटाचार्य (टीकाकार: पं. अम्बिकादत्त शास्त्री) द्वारा

स्रोत: Rasaratna Samuchchaya with Suratnojjvala Hindi Commentary by Pt. Ambika Datta Shastri (1939) (उद्गम)

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२०२ रसरत्नसमुच्चये—

को घोट कर कन्दुकनामक (१) यन्त्र से तैल निकालते हैं ॥ २३८ ॥

तैलपातनम्—

वाकुचीदेवदाल्याश्च कर्कोटीमूलतो भवेत् ॥ २३९ ॥

कर्कोटी (बांझककोड़ा) के जड़ के रस से वाकुची और वन्दाल के बीजों को पीस कर उपर्युक्तविधि से तैल निकालते हैं ॥ २३९ ॥

अथ विषमुष्टितैलपातनम्—

अपामार्गकषायेण तैलं स्याद्विषमुष्टिजम् ॥ २४० ॥

अपामार्ग के खरस से कुचले को घोट कर उपर्युक्तविधि से तैल निकालते हैं॥ २४०॥

अथ जैपालतैलपातनम्—

मूलक्वाथैः कुमार्याश्च तैलं जेपालजं हरेत् ॥ २४१ ॥

घृतकुमारी की जड़ के रस से जैपाल (जमालगोटा) बीज को पीसकर तैल निकालना चाहिए ॥ २४१ ॥

वाकुचीतैलाहरणविधिः—

क्वाथैरक्तापामार्गस्य बाकुचीतैलमाहरेत् ॥ २४२ ॥

लाल अपामार्ग (लालदण्डी घोंघा) के क्वाथ से बाकुची बीजों को घोट कर तैल निकालना चाहिए ॥ २४२ ॥

अथ कृष्णमिश्रश्वेतगुञ्जाबीजतैलपातनविधिः—

कृष्णायाः काकतुण्ड्याश्च बीजचूर्णानि कारयेत् । कान्तपाषाणचूर्णं च एकीकृत्य निरोधयेत् । धान्यराशिगतं पश्चादुद्धृत्य तैलमाहरेत् ॥ २४३ ॥

इति श्रीवैद्यपतिसिंहगुप्तस्य सूनोर्वाग्भट्टाचार्यस्य कृतौ रसरत्नसमुच्चये लोहशोध- नमारणादिनिरूपणं नाम पञ्चमोऽध्यायः ॥ ५ ॥


पिप्पली, श्वेतगुञ्जा और कान्तपाषाण का चूर्ण, इन सब को बराबर २ लेकर जल से पीस लें। फिर इस कल्क को किसी पात्र में बन्दकर धान के ढेर में एक


( १ ) साम्बुस्थालीमुखे बद्धे वस्त्रे स्वेद्यं निधाय च ।
पिधाय पच्यते यत्र तद् यन्त्रं कन्दुकं स्मृतम् ॥