रसरत्नसमुच्चय (सुरत्नोज्ज्वला हिन्दी व्याख्या सहित)
Rasaratna Samuchchaya Hindi
रस-वाग्भटाचार्य (टीकाकार: पं. अम्बिकादत्त शास्त्री) द्वारा
स्रोत: Rasaratna Samuchchaya with Suratnojjvala Hindi Commentary by Pt. Ambika Datta Shastri (1939) (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें१९४ रसरत्नसमुच्चये—
मतान्तरम्—
ताम्रवन्मारणं तस्याः कृत्वा सर्वत्र योजयेत् ॥ १८६ ॥
अथवा ताम्रभस्म विधि से पीतल की भस्म बना कर सब जगह उसका प्रयोग करें ॥ १९९ ॥
पित्तलरसायनम्—
मृतारकूटकं कान्तं व्योमसत्त्वं च मारितम् ।
त्रयं समांशकं तुल्यं व्योषं जन्तुघ्नसंयुतम् ॥ २०० ॥
ब्रह्मबीजाजमोदाऽग्निभल्लाततिलसंयुतम् ।
सेवितं निष्कमात्रं हि जन्तुघ्नं कुष्ठनाशनम् ।
विशेषाच्छ्वेतकुष्ठघ्नं दीपनं पाचनं हितम् ॥ २०१ ॥
पीतलभस्म, कान्तलौहभस्म, मारित अभ्रकसत्त्व, इन तीनों को समान भाग ले कर खरल में घोट कर बराबर सोंठ, मिर्च, पीपल, वायविडङ्ग, ढाक के बीज, अजमोद और चित्रक के चूर्ण के साथ एक निष्क (४ मासे) की मात्रा के सेवन करने से कृमि, कुष्ठ और विशेषकर श्वेतकुष्ठ को नष्ट करती है तथा दीपन और पाचन है ॥ २००-२०१ ॥
पित्तलद्रुतिः—
सुवर्णरीतिकाचूर्णं भक्षितं वेष्टितं पुनः ।
छागेन कृष्णवर्णेन मत्तेन तरुणेन च ॥ २०२ ॥
तल्लिप्तं खर्परे दग्धं द्रुतिं मुञ्चति शोभनाम् ।
चतुर्दशलसद्वर्णसुवर्णसदृशच्छविः ।
देहलोहकरी प्रोक्ता युक्ता रसरसायने ॥ २०३ ॥
इति पित्तलाधिकारः ।
सुवर्ण के समान उत्तम पीतवर्ण के शुद्ध पित्तल चूर्ण को किसी खाद्य पदार्थ के साथ मिलाकर काले और हृष्ट पुष्ट जवान बकरे को खिला देना चाहिए, फिर बकरे की विष्ठा (मींगणियां) को द्रावक वर्ग की औषधियों के साथ पीस कर मिट्टी के खर्पर में लिप्तकर अग्नि में जला देने से चौदह प्रकार के वर्ण से युक्त सुवर्ण के समान चमकदार उत्तम पीतल की द्रुति हो जाती है, इसका रस और रसायन कर्म में प्रयोग करने से देह लोह के समान दृढ और स्थिर हो जाती है ॥ ३०२-२०३ ॥