रसरत्नसमुच्चय (सुरत्नोज्ज्वला हिन्दी व्याख्या सहित)
Rasaratna Samuchchaya Hindi
रस-वाग्भटाचार्य (टीकाकार: पं. अम्बिकादत्त शास्त्री) द्वारा
स्रोत: Rasaratna Samuchchaya with Suratnojjvala Hindi Commentary by Pt. Ambika Datta Shastri (1939) (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंपञ्चमोऽध्यायः । १९१
चाहिए। एक प्रहर के बाद भस्म को निकाल कर, उसमें बराबर शुद्धमनः शिला मिला- कर केजम्बीररस या काञ्जी से घोटकर सम्पुट में बन्दकर के फूंक दें। एक प्रहर के पश्चात् स्वाङ्गशीत होने पर पुट से निकालकर फिर बीसवें भाग की मात्रा में मनः- शिला मिला कर किसी अम्ल से घोटकर सम्पुट कर के एक प्रहर तक पकाना चाहिए। इस तरह प्रत्येक पुट में बीसवां भाग मनःशिला मिला कर ६० पुट देने से नाग की अत्यन्त गुणकर निरुत्थ भस्म हो जाती है ॥ १८०-१८२ ॥
अथ मतान्तरम्— शिलया रविदुग्धेन नागपत्राणि लेपयेत् । मारयेत्पुटयोगेन निरुत्थं जायते तथा ॥ १८३ ॥ अथवा शुद्धनाग के पत्रों पर मदार के दुग्ध में घोटी हुई मनःशिला की पिट्ठी का लेप कर पुटकी विधि से १० या १५ पुट देने से नाग की निरुत्थ भस्म हो जाती है ॥ १८३ ॥
अथ नागरसायनम्— एवं नागोद्भवं भस्म ताप्यभस्माधभागिकम् । पादं पादं क्षिपेद्भस्म शुल्वस्य विमलस्य च ॥ १८४ ॥ कान्ताभ्रसत्त्वयोश्चापि स्फटिकस्य पृथक् पृथक् । सर्वमेकत्र सञ्चूर्ण्य पुटेत्त्रिफलवारिणा ॥ १८५ ॥ त्रिंशद्वनगिरिण्डैश्च त्रिंशद्वारं विचूर्ण्य तत् । व्योषवेल्लकरचूर्णैश्च समांशैः सह मेलयेत् ॥ १८६ ॥ मध्वाज्यसहितं हन्ति प्रलीढं वल्लमात्रया । अशीतिवातजान्रोगान्धनुर्वातं विशेषतः ॥ १८७ ॥ कफरोगानशेषांश्च मूत्ररोगांश्च सर्वशः । श्वासं कासं क्षयं पाण्डुंश्वयथुं शीतकज्वरम् ॥ १८८ ॥ ग्रहणीमामदोषं च वह्निमान्द्यं सुदुर्ज्जरम् । सर्वानुदकदोषंश्च तत्तद्रोगानुपानतः ॥ १८९ ॥
उपर्युक्तविधि से बनाई हुई सीसे की भस्म एक भाग तथा सुवर्णमाक्षिकभस्म अर्द्धभाग तथा ताम्रभस्म, विमलभस्म कान्तलौहभस्म, अभ्रकसत्व, स्फटिकभस्म, ये प्रत्येक सीस भस्म से चतुर्थांश लेना चाहिए इन सबको खरल में एकत्र कर