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रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)

Rasatarangini of Sadananda Sharma with Prasadani Commentary

by सदानन्द शर्मा (टीकाकार: पं. हरिदत्त शास्त्री)

DevanagariHindipublished799 pages
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अष्टादशस्तरङ्गः ४५१ द्वितीयो निर्माणप्रकारः वंगं सूर्यमितं द्रुतं रसमितं सूतञ्च सम्पेपयेत् प्रक्षाल्याम्लरसैः क्षिपेद् बुधवरो नागोन्मितं गन्धकम्। वंगांशं नवसादरञ्च विमलं सम्पेष्य यत्नात्पचेत् कूपीस्थं सिकताख्ययन्त्रविधिना कूपीं ततस्त्व्राहरेत् ॥७७॥ कूपीं विभिद्य यत्नेन रसयन्त्रविचक्षणः। स्वर्णारम्यं स्त्रर्णवर्णं स्वर्णवंगं समाहरेत् ॥ ७८ ॥ आयुर्वेदमहाम्भोधिकर्णधारधुरन्धरैः। मित्रवंशावतंसैस्तु गुरुवर्यमहोदयैः ॥ ७९ ॥ श्रीमन्नरेन्द्रनाथाख्यैस्त्वयमाविष्कृतो विधिः। प्रकाशितः खलु मया लोकानुग्रहकाम्यया ॥ ८० ॥ द्वितीयो निर्माणप्रकारोऽल्पव्ययो बहुफलश्चेति। सूर्यमितं द्वादशभागिकं द्रुतं वंगं, रसमितं षडभागिकं सूतं सम्मेल्य सम्पेपयेत्। नागोन्मितं अष्टभा- गिकं गन्धकम्। तच्च प्रागुक्तपञ्चमविधिविशुद्धं ग्राह्यम्। अंगांशं षड्भागिकञ्च नवसादरं दत्त्वा सम्पेष्य कुप्यां निधाय पचेत्। अन्यत् सर्वं समानं पूर्वेण। अत्र च पूर्वयोगापेक्षयोत्कृष्टवर्णो स्वर्णवंगं भवति इति। अत्र च वंगपारदा- दिमानतारतम्यं मित्रवंशावतंसैराविष्कृतमिति विशेषः ॥७७-८०॥ भा.टी.—शुद्धवंग बारह भाग लेकर उसको करछी में पिघला कर उसमें छः भाग शुद्ध पारद मिलाकर तत्काल खरल में डालकर खूब रगड़ें। अब इसको नींबू रस आदि किसी अम्लरस द्रव से अच्छी तरह धोकर उसमें आठ भाग शुद्ध गन्धक और छः भाग नौसादर मिलाकर अच्छी तरह मर्दन करके कज्जली-सी बना लें। अब इस कज्जली को एक कपड़मिट्टी की हुई कांच की शीशी में भरकर उसे पूर्वोक्त विधि से बालुकायन्त्र में पकायें। ठीक पक जाने पर शीशी को निकाल उसमें से सोने के समान सुन्दर वर्णवाले स्वर्णवंग को निकाल लें। इस विधि से भी उत्तम स्वर्णवंग बनता है ॥ ७७-८० ॥ अस्य गुणाः सुवर्णवंगं शिशिरञ्च रूक्षं सरं सतिक्तं लवणञ्च साम्लम्। रसायनं मेहहरञ्च मेध्यं बल्यञ्च नेत्र्यं परमं प्रदिष्टम् ॥८१॥ लावण्यदं वह्निविवर्धनञ्च श्लेष्मामयघ्नं परमञ्च वृष्यम्। मेदोहरं शुक्रकरं निकामं सुवर्णवंगं कथितं रसज्ञैः ॥८२॥

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४५२ रसतरङ्गिणी अस्य गुणा:—शिशिरं गन्धमारितमपि क्षारसंयोगात् शीतवीर्यम्। लवणं सङ्घारत्वात्। नेत्र्यं प्रदिष्टं कैश्चित् ॥ ८१, ८२ ॥ भा.टी.—स्वर्णवंग शीतवीर्य शीतगुण, रूक्ष, सर, तिक्त, लवण और अम्ल- रस होता है। यह सब शरीर को बल देने के कारण रसायन, प्रमेहहर, बुद्धि- वर्धक, बल्य और नेत्रों के लिये परम लाभदायक है। इसको कुछ काल सेवन करने से शारीरिक शोभा बढ़ जाती है और भूख लगने लगती है। ऊर्ध्वजत्रु तथा श्वास नली आदि स्थानों में होनेवाले कफप्रकोपजन्य रोग दूर होते हैं और उत्पादक अंगों के लिए उत्तम बल्य (वृष्य) है। इसके सेवन से मेदो- विकार नष्ट हो जाते हैं और शरीर में शुक्र धातु की उत्पत्ति होती है॥८१, ८२॥ अस्य मात्रानिरूपणम् गुञ्जैकतः समारभ्य गुञ्जा द्वितयसंमितम् । सुवर्णवंगं युञ्जीत बलकालाद्यपेक्षया ॥ ८३ ॥ मात्रादिकं वंगभस्मवत् सर्वम् ॥ ८३ ॥ भा.टी.—रोग तथा रोगी का बल तथा काल आयु आदि का विचार करके एक रत्ती से दो रत्ती तक मात्रा में स्वर्णवंग का सेवन किया जा सकता है ॥८३॥ अस्य आमयिकः प्रयोगः स्वर्णवंगं विशेषेण वंगोक्तेरनुपानकैः । तत्तद्रोगेषु नियतं प्रयुंजीत भिषग्वरः ॥ ८४ ॥ [ गीतिका ] बहुलारजोविमिश्रं त्वपि नागकेसराह्वयम् । यशदोत्थभूतियुक्तं सुविभं सुवर्णवंगम् ॥ ८५ ॥ परिशीलितं सपथ्यं दिनसप्तकं प्रयत्नान् । विनिवारयेद्धि शुक्लप्रदरोत्थितां तु बाधाम् ॥ ८६ ॥ परिशीलितं तथेदं खलु मासमात्रयोगात् । विनिहन्ति शुक्रमेहं सुचिरोत्थितं प्रकामम् ॥ ८७ ॥ सममाधवोचिताढ्यं सुविभं सुवर्णवंगम । परिशीलितं द्विगुञ्जं व्रणमेहहत्प्रदिष्टम् ॥ ८८ ॥ मधुना सुवर्णवंगं रजनीरप्रगाढम् । अशितं ह्यमोघशस्त्रं व्रणमेहनाशनाय ॥ ८६ ॥

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अष्टादशस्तरङ्गः ४५३ सितसारिवास्टतेन ह्यशितं सुवर्णवंगम् । व्रणमेहमुग्रवेगं खलु नाशयेन्निकामम् ॥ ६० ॥ ससुरप्रियोत्थचूर्णं ह्यशितं सुवर्णवंगम् । विनिवारयेद्विशेषात् द्रुतमेव रात्रिमेहम् ॥ ६१ ॥ लघुशाल्मलीशिफाया रजसा समन्वितन्तु । ह्यशितं सुवर्णवंगं बलवीर्यदं प्रदिष्टम् ॥ ६२ ॥ अपि च— प्रतनुमधुविमिश्रं मासमेकं सपथ्यं मृतयशदसमेतं शीलितं स्वर्णवंगम् । अपनयति विशेषाच्छुक्रतारल्यमारा- ज्जनयति बलवृद्धिं भूयसीं भावुकानाम् ॥ ६३ ॥ समभागिकसिन्दूररससम्मिश्रितं तथा । सुवर्णवंगं मधुना वासरे तु द्विवारकम् ॥ ६४ ॥ सततं मासमात्रेण शीलितं पथ्यभोजिभिः । अवश्यं नाशयत्याशु शुक्रदौर्बल्यमुल्बणम् ॥ ६५ ॥ बहुला स्थूलैला, सुविमं शोभनचाकचक्यम्, सपथ्यं पथ्यरक्षायुक्तं यथा स्या- त्तथा । माधवोचितं कङ्कोलम्, शीतलचीनी इति हिन्दीभाषायाम् । “कङ्कोलंकं कृतफलं कोलकं कटुकं फलम् । चूर्णं कन्दफलं द्वीपं मारीचं माधवोचितम्।” इति धन्वन्तरीयनिघण्टुः । सुरप्रियं कङ्कोलम् । सपथ्यं पथ्यभोजनयुक्तम् । आरात् सत्वरमेवेत्यर्थः ॥ ८४-६५ ॥ भा.टी—स्वर्णवङ्ग को वङ्गभस्म के अनुपानों के साथ भिन्न-भिन्न रोगों में सेवन करने से वङ्गभस्म के समान ही गुण देखे जाते हैं । उत्तम स्वर्णवंग को, जटामांसीचूर्णं और यशद ( जस्ता ) भस्म के साथ मिलाकर अशोकक्वाथ अथवा खरेंटीकषायानुपान से सात दिन तक पथ्यपूर्वक सेवन करने से श्वेतप्रदररोग का कष्ट निश्चित दूर हो जाता है । यदि इसी वंग योग को नियमपूर्वक पथ्य के साथ एक मास तक निरन्तर सेवन किया जाय तो बहुत दिनों का पुराना शुक्रमेह रोग नष्ट हो जाता है । व्रणमेह (सुजाक) को दूर करने के लिये दो रत्ती उत्तम स्वर्णवंग को समभाग शीतलचीनीचूर्णं में मिला- कर शीतल जल अथवा बलास्वरस अनुपान से सेवन किया जाता है । स्वर्णवंग को दो रत्ती मात्रा में लेकर उसमें कच्ची हल्दी का स्वरस और शहद मिलाकर सेवन

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४५४ रसतरङ्गिणी कराना व्रणमेह की अचूक औषधि है। नूतन उग्रवेग व्रणमेह को नष्ट करने के लिये स्वर्णवंग को श्वेतसारिवा (अनन्तमूल) के शीत कषाय के साथ सेवन कराने से शीघ्र लाभ होता है। रात्रिमेह (स्वप्नदोष) को दूर करने के लिये स्वर्ण वंग को शीतलचीनीचूर्ण के साथ मिलाकर सेवन कराना चाहिये। शरीर में बल और वीर्यशक्ति बढ़ाने के लिये स्वर्णवंग को छोटे सेमर की जड़ के चूर्ण के साथ कुछ दिन सेवन कराना चाहिये। स्वर्णवंग को यशदभस्म में मिलाकर शहद के साथ पथ्य पूर्वक एक मास तक नियम पूर्वक सेवन करने से शुक्रतारल्य (वीर्य का पतला होना) नष्ट होकर शरीर में अत्यन्त बलवृद्धि होती है। शुक्र की दुर्बलता (अल्प-परिमाण होना, गठीला दुर्गन्धित आदि दोष युक्त होने से सन्तानोत्पादन में असमर्थता) को दूर करने के लिये स्वर्णवंग एक रत्ती, रससिन्दूर एक रत्ती; दोनों को एकत्र पीसकर इसको शहद के साथ सुबह चाटें और इसी तरह शाम को एक मास तक चाटने से और पथ्य पूर्वक रहने से शुक्र की दुर्बलता शीघ्र ही दूर हो जाती है ॥८४-६५॥ अथ सुवर्णवंगपञ्चकरसायनम् सुवर्णवंगमुज्ज्वलं तु तोलकद्वयोन्मितम् । विशोधितं शिलामयं सुवर्णवंगसंमितम् ॥ ६६ ॥ मृतं तु तीक्ष्णलोहकं शिलामयार्द्धभागिकम् । सुशोभनं तथाभ्रकं मतं तु तोलकार्द्धकम् ॥ ६७ ॥ स्मरध्वजाङ्कपूर्वकं ध्वजाह्वयं तथा रसम् । विमर्द्य खल्वके भृशं वटीं त्रिगुञ्जसंमिताम् ॥ ६८ ॥ विधाय काचकूपके न्यसेत्ततो भिषग्वरः । यथानुपानयोगतो द्विवारमेकवासरे ॥ ६९ ॥ प्रयोजयेद्विशेषविद्वलाबलाचपेक्षया । रसायनं मतं त्विदं सुवर्णवंगपञ्चकम् ॥ १०० ॥ वंगीयैः श्रीरमानाथसेनवैद्यमहोदयैः । विचार्याविष्कृतमिदं सुरम्यन्तु रसायनम् ॥ १०१ ! प्रकाशितं खलु मया लोकानुग्रहकाम्यया । अमोघास्त्रमिदं ख्यातं शुक्रमेहस्य नाशने ॥ १०२ ॥ बलवर्णकरं वृष्यं परं बुद्धिविवर्द्धनम् । समाख्यातं विशेषेण शुक्रतारल्यनाशनम् ॥ १०३ ।:

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एकोनविंशस्तरङ्गः ४५५ सितासराज्यसंयुक्तं प्रतप्तदुग्धयोगतः । सुवर्णवङ्गपञ्चकं निषेवितं द्विमासकम् ॥ १०४ ॥ निहन्ति वै चिरोत्थितं तु शुक्रमेहमुल्बणम् । तथा करोति कामिनीमदापनाशनक्षमम् ॥ १०५ ॥ सुवर्णवंगपञ्चकरसायनम्—शिलामयं, शिलाजतु । स्मरः कामदेवस्तस्य ध्वजाङ्को ध्वजचिह्नं मकरः, तत्पूर्वकं मकरपूर्वकं ध्वजाह्वयं रसं मकरध्वजसंज्ञकं रसम् अभ्रतुल्यं दद्यादिति शेषः । सिता खण्डम्, सरः सन्तानिका ॥६६-१०५॥ इति वंगविज्ञानीयो नाम अष्टादशस्तरङ्गः भा.टी.—उत्तम स्वर्णवंग दो तोला, अच्छी तरह शुद्ध किया हुआ सूर्य- तापी शिलाजीत दो तोला, तीक्ष्णलोह ( फौलाद ) भस्म एक तोला, उत्तम वज्राभ्रक भस्म आधा तोला और उत्तम षड्गुणबलिजारित मकरध्वजरस आधा तोला लेकर सबको खरल में एकत्र जल के साथ मर्दन करके तीन-तीन रत्ती की गोली बना लें । इनको सुखाकर काँच की शीशी में रख लें । अब इन गोलियों में एक गोली सुबह और एक शाम को बल काल आदि का पूर्ण विचार कर दिन में दो बार योग्य अनुपान से सेवन करना चाहिये । इस योग को सुवर्णवंगपञ्चक रसायन कहते हैं । शुक्रमेह रोग को नष्ट करने में यह एक अचूक शस्त्र है । इसके सेवन से शरीर में बल और वर्ण की वृद्धि होती है, उत्पादक अंग सबल होते हैं, बुद्धिशक्ति बढ़ने लगती है शुक्र की तरलता को दूर करने में यह विशेष रूप से लाभदायक है । स्वर्णवंग को दो मास तक घी और मिश्री मिश्रित मलाईवाले गरम दूध के साथ सेवन किया जाय तो भयंकर शुक्रमेह दूर हो जाता है ॥ ६६-१०५ ॥ यह वङ्गविज्ञानीय नाम अष्टादशतरङ्ग समाप्त हुआ । —०— अथ सीसकादिविज्ञानीय एकोनविंशस्तरङ्गः अथ सीसकस्य नामानि सीसकं शीषकं सीसं नागकं नागनामकम् । कुवङ्गकं कुरङ्गञ्च तथा सिन्दूरकारणम् ॥ १ ॥ क्रमप्राप्तसीसकनामानि तन्त्रे व्यवहारार्थम् । सिन्दूरकारणं सिन्दूरहेतुत्वात् नागस्य, सिन्दूरं हि नागसम्भवमिति ॥ १ ॥

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४५६ रसतरङ्गिणी भा.टी.—सीसक, शीपक, सीस, नागक, सर्प के नाम—भुजंग, फणि, आशीविष, सर्प आदि, कुवङ्गक, कुरंग तथा सिन्दूरकारण, ये सब नाम सीसा धातु के कहे जाते हैं। क्योंकि इसमें से सिन्दूर प्राप्त किया जाता है, अतः इसको सिन्दूरयोनि लिखा है ॥ १ ॥ वक्तव्य—सीसक नैसर्गिक तौर से सीसकगन्धित (Lead sulphide) के रूप में मिलता है। काले सुरमे में सीसा अधिक पाया जाता है। सीसक की कच्ची धातु (सीसकगन्धित) को भूनकर उसमें से इसको पृथक् किया जाता है। यह चमकीली नीली भूरी-सी धातु है। स्पर्श में कोमल घिसने पर कागज पर लिखती है। खुली हवा में रखने से इसमें जंग नहीं लगता है, किन्तु गीली हवा में लग जाता है। सीसक काँर्बानित् होता है। सीसक को खूब तपाकर श्वेत कर दिया जाय तो इसका उर्ध्वपातन भी हो जाता है। भभके से शुद्ध किये हुए जल का सीसक पर कोई प्रभाव नहीं होता है, क्योंकि इसमें हवा नहीं होती। परन्तु अन्य कोमल जल जैसे वर्षाजल का इस पर शीघ्र प्रभाव होता है। वर्षा- जल में घुली हुई हवा की ओषजन सीसे के साथ मिलकर सीसे का ओषित् (oxide) बना देती है, यह ओषित् जल में घुलकर सीसक का उद्रित (Hybrate) बन जाती है। यद्यपि यह उद्रित बहुत थोड़ी होती है, तथापि इससे जल का स्वाद तथा प्रभाव बिगड़ जाता है। इसीलिए वर्षाजल को सीसे की बाल्टियों तथा टबों में नहीं रखा जाता है। नदी तथा कुओं के कठोर जल पर इसका बिलकुल प्रभाव नहीं होता है। सीसे का आपेक्षिक गुरुत्व 11.34 से लेकर 11.37 तक है। Atomic भार 207.22 है, सीसक 325°c तापांश पर उबलने लगता है। ग्राह्यसीसकस्य स्वरूपम् सुगौरवं मृदु स्निग्धं छेदने मलिनोज्ज्वलम् । बहिःश्यामं द्रुतद्रावं सीसकं जात्यमादिशेत् ॥ २ ॥ ग्राह्यसीसकस्वरूपं सुगौरवंमिति—मलिनोज्ज्वलं मलिनं कृष्णं, उज्ज्वलं किचक्ययुतम् । तथाऽतो विपरीतं हेयसीसकमिति ॥ २ ॥ भा.टी.—अच्छा वजनदार, कोमल, स्निग्ध, छैनी से काटने पर कुछ मलिन साफ (चमकदार), बाहर से देखने पर श्यामवर्ण, अन्य धातुओं की अपेक्षा अग्नि पर रखने से शीघ्र पिघलनेवाले सीसे को उत्तम समझना चाहिये ॥२॥

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एकोनविंशस्तरङ्गः ४५७ अग्राह्यसीसकस्य स्वरूपम् बहिः शुक्लं भारहीनं रूक्षं छेदे च निष्प्रभम् । समलं कठिनद्रावं सीसकं हेयमादिशेत् ॥ ३ ॥ भा.टो.—बाहर से देखने पर सफेद, अल्पभार, खुश्क, काटने पर चमक- रहित, धात्वन्तरयोगयुक्त और देर में पिघलनेवाला सीसक औषधि-कार्य में अग्राह्य समझना चाहिये ॥ ३ ॥ सीसकशोधनस्य प्रयोजनम् सीसं निहन्ति विमलां तु शरीरशोभां कुष्ठं किलासकमलं जनयेच्च नूनम् । सन्धीन् प्रपीडयति पक्षवधं प्रकुर्यात् संशुद्धिहीनमिह चेत् खलु मारितं स्यात् ॥ ४ ॥ शुद्धिपाकविहीनन्तु सीसकं परिशीलितम् । गुल्मं प्रमेहमानाहं श्वयथुञ्च भगन्दरम् ॥ ५ ॥ वह्निमान्द्यं त्वंसशोथं बाह्रोर्निश्चेष्टतां तथा । शूलं क्षयादिकान् रोगान् जनयेदविकल्पतः ॥ ६ ॥ सीसकशोधनप्रयोजनम्—स्पष्टप्रायम् । अंसशोथबाहुनिश्चेष्टतादि प्राचीना- नुक्तमपि स्फुटप्रतीयमानत्वादुक्तम् । अविकल्पतः सन्देहराहित्येन आवश्यक- मित्यर्थः । पाकविहीनमिति दोषाश्चैते मनःशिलातालगन्धकमन्तरा मारितनाग- सेवनादप्युपजायन्त इति ज्ञेयम् ॥ ४–६ ॥ भा.टी.—बिना शुद्ध किये सीसक की भस्म का सेवन करने से शरीर में रक्त विकृत होने से सारे शरीर की शोभा नष्ट हो जाती है और शरीर में सफेद कोढ़ तथा त्वक्रोग उत्पन्न हों जाते हैं । इसके सेवन से सन्धियों में कष्ट हो जाता है और पक्षाघात रोग हो जाता है । इसी तरह अशुद्ध सीसकभस्म सेवन से गुल्म, प्रमेह, आनाह, शोथ, भगन्दर, अग्निमान्द्य, अंस (कन्धा) शोथ, भुजाओं में अकर्मण्यता, उदरशूल तथा क्षय आदि अनेक रोग उत्पन्न हो जाते हैं । अतः सीसक को अवश्य ही अच्छी प्रकार से शुद्ध कर भस्म करना चाहिये ॥ ४–६ ॥ सीसकस्य प्रथमः शोधनप्रकारः सीसकं दर्विकासंस्थं चुल्लिकायां निधापयेत् । विद्रुतञ्चाथ विज्ञाय रसतन्त्रविचक्षणः ॥ ७ ॥

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४५८ रसतरङ्गिणी सिन्दुवारशिफाजातस्वरसापूरितोदरे । क्षिपेद् घटे तु सच्छिद्रपिधानपिहितास्यके ॥ ८ ॥ निर्वापयेत्सप्तवारं विधानज्ञो भिषग्वरः । इत्थं विशोधितं सीसं मारणाय प्रयोजयेत् ॥ ९ ॥ सीसकस्य प्रथमः शोधनप्रकारः — निर्गुण्डीमूलद्रवे परिषेचनं सप्तधा विधाय सम्पाद्यः ॥ ७-९ ॥ भा.टी.—उत्तम सीसे को एक लोहे की करछी में डालकर इसको चूल्हे के ऊपर कोयलों या लकड़ी की अग्नि में तपायें, जब शीशा पिघल जाय तो इसे एक पात्र में भरे हुए निर्गुण्डीमूलस्वरस में बुझा दें, परन्तु इस निर्गुण्डीमूलस्वरसवाले पात्र के मुख पर बीच में छिद्रयुक्त एक सिकोरा रखा हुआ होना चाहिए। इसी पात्रमुख पर रखे हुए सिकोरे के छिद्र से पिघले हुए सीसक को निर्गुण्डीस्वरस में डालना चाहिये । इस प्रकार सात बार निर्गुण्डीस्वरस में बुझाने से सीसक शुद्ध हो जाता है । इसी शुद्ध सीसक को भस्म करने के काम में लाना चाहिये ॥७-९॥ द्वितीयः शोधनप्रकारः सीसकं द्रावयेल्लोहदर्वीगतं स्वच्छचूर्णोदके चाथ निर्वापयेत् । पूर्वमार्गेण वै शेषकर्माचरेत् सीसकं सत्वरं याति शुद्धिं पराम् ॥ १० ॥ द्वितीयः प्रकारः चूर्णोदके निर्वापणादुक्तः । पूर्वमार्गेण अव्यवहितप्रदर्शितेन सीसकशोधनोक्तप्रथममार्गेण शेषकर्म कुम्भे स्वच्छचूर्णोदकस्य प्रक्षेपणाम्, सच्छिद्र- सुदृढपिधानेन कुम्भमुखस्याच्छादनमित्यादिकमिहानुक्तं कर्म समाचरेदिति भावः । केचित्तु अर्कदुग्धे त्रिधा निर्वापणादपि शुद्धयति इत्याहुः ॥ १० ॥ भा.टी.—सीसक को लोहे की करछी में डाल अग्नि में तपाकर पिघलाने के बाद इसको उक्त विधि से स्वच्छ चूने के जल में सात बार बुझा देने से सीसक उत्तम रूप से शुद्ध हो जाता है ॥ १० ॥ वक्तव्य—कई वैद्य आक के दूध में बुझाकर शुद्ध कर लेने को कहते हैं । कई वैद्य निर्गुण्डीस्वरस में एक बार रेणुकाचूर्ण, दूसरी बार में हरिद्राचूर्ण और तीसरी बार में अर्कमूलचूर्ण मिलाकर उसमें सीसक बुझाने से शुद्ध कर लेते हैं । अथ सीसकस्य प्रथमो मारणप्रकारः सीसकं शुद्धमादाय कटाहे गालयेद्भिषक् । विशुष्काश्वत्थवल्कोत्थं समं चूर्णं विनिक्षिपेत् ॥ ११ ॥

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स्वल्पं स्वल्पं मुहुश्चाथ लोहदर्व्या प्रचालयेत् । सीसभस्म भवेद्यावच्चूर्णं तावत्समापयेत् ॥ १२ ॥ राशीकृत्य ततो भस्म शरावेण पिधापयेत् । ज्वलदङ्गारवर्णं स्यात्सीसभस्म यथा चिरम् ॥ १३ ॥ स्वाङ्गशीतं ततो ज्ञात्वा मृतं सीसं समाहरेत् । बहुशः क्षालयेत्तोयैः क्षारहीनं यथा भवेत् ॥ १४ ॥ सीसतुल्यां रोगशिलां विमलां तत्र निक्षिपेत् । निम्बूकवारिणा वापि काञ्जिकेनाथ पेषयेत् ॥ १५ ॥ सम्पुटस्थं ततः कृत्वा पुटयेदतियत्नतः । इत्थं त्रिभिः पुटैरेव सीसकं मृतिमाप्नुयात् ॥ १६ ॥ द्वितीयादिपुटे वैद्यस्तुल्यामेव शिलां क्षिपेत् । इत्थं मृतं सीसकन्तु वीतशङ्कः प्रयोजयेत् ॥ १७ ॥ भस्म सञ्जायते श्लक्ष्णं विशदं कज्जलप्रभम् । पक्षाघातादिकान् नागदोषान् नैव करोति च ॥ १८ ॥ अथास्य मारणप्रकारः प्रथमः । अश्वत्थवल्कलचूर्णप्रक्षेपात् प्रथमं सीसक- मारणम् । ततो दोषनिरासाय मनःशिलया त्रिधा पुटनमिति । पुटनञ्च मध्यपुटै- रेव न महापुटैः । अन्यथा गलितो नागो दुर्बिनश्यतीति अनुसन्धेयम् । भस्म चास्य श्लक्ष्णमपि तु पिच्छिलम् । वर्णतस्तु कज्जलप्रभम् । पक्षाघातादिकान् दोषान् न करोति च मनःशिलायाः पक्वत्वादिति शेषः ॥ १२-१८ ॥ भा.टी.-उक्त विधि से शुद्ध सीसा लेकर उसको एक लोहे की कड़ाही में डालकर चूल्हे पर रखकर पिघलायें। जब सीसा पिघल जाय तो उसमें थोड़ा- थोड़ा करके पीपलवृक्ष की शुष्क त्वचा का चूर्ण सीसकसमभाग डालते जायें और लोहे की करछी से इसे चलाते जायें। जब तक सीसे की भस्म न हो जाय तब तक थोड़ा-थोड़ा करके चूर्ण डालते जायें और चलाते जायें। जब सीसे की भस्म हो जाय तो उसे उसी कड़ाही के बीच में इकट्ठा करके एक मिट्टी के सिकोरे से अच्छी तरह ढक दें और तीव्र अग्नि से तब तक पकायें जब तक कि सीसकभस्म जलते हुए लाल अंगारों की भाँति न हो जाय। अग्नि देना बन्द करके स्वांगशीत होने पर सीसकभस्म को कड़ाही से निकाल लें। इस भस्म को फिर जल से अच्छी तरह तब तक धोयें जब तक क्षार का अंश बिल्कुल न रहे। अब उस क्षारहीन सीसकभस्म में समभाग शुद्ध मैनसिल मिलाकर नींबू के रस से

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४६० रसतरङ्गिणी अथवा कांजी से खूब अच्छी तरह मर्दन करके सुखा लें और सम्पुट में बन्दकर पुट में फूँक दें। इस प्रकार मैनसिल के साथ तीन पुट देने से सीसक की भस्म हो जाती है। दूसरे और तीसरे पुट में भी समभाग मैनसिल डालनी चाहिये। इस प्रकार भस्म किये हुए सीसक को निःशंक होकर व्यवहार में ला सकते हैं। उक्त विधि से बनायी हुई सीसकभस्म, कज्जल के सदृश श्लक्ष्ण और विशद होती है। इसके सेवन से पक्षाघात, शूल आदि नागविकार उत्पन्न नहीं होते हैं ॥ ११-१८ ॥ द्वितीयो मारणप्रकारः विशुद्धं सीसमादाय कटाहे तु निधापयेत् । चुल्लिकायां निधायाथ वह्निं प्रज्वाल्य गालयेत् ॥ १९ ॥ सीसकं विद्रुतं ज्ञात्वा स्वल्पं स्वल्पं मुहुर्मुहुः । विशुद्धकुनटीचूर्णं तुल्यं दत्त्वा विमर्दयेत् ॥ २० ॥ सीसभस्म भवेद् यावच्चूर्णं तावत्समापयेत् । स्वतः शीतं ततो ज्ञात्वा सीसभस्म समाहरेत् ॥ २१ ॥ भस्मतुल्यं बलिं दत्त्वा निम्बूनीरेण मर्दयेत् । घर्म विशोष्य यत्नेन संपुटस्थं ततः पुटेत् ॥ २२ ॥ इत्थं त्रिभिः पुटैरेव सीसकं मृतिमाप्नुयात् । इत्थं मृतं सीसकन्तु वीतशङ्कः प्रयोजयेत् ॥ २३ ॥ द्वितीयः प्रकारो मनःशिलाप्रलेपसाध्यो गन्धकेन त्रिधा पुटनात् सम्पादनीयश्च वीतशङ्कः नागदोषभयरहितः ॥ ॥ १६-२३ ॥ भा.टी.-शुद्ध सीसे को लेकर एक लोहे की कड़ाही में डालें और कड़ाही को चूल्हे पर रखकर अग्नि जला दें और सीसे को पिघलने पर उसमें समभाग शुद्ध मैनसिल थोड़ा-थोड़ा करके तब तक डालकर करछी से रगड़ते जायँ जब तक कि सीसे की भस्म न हो जाय । कड़ाही के स्वतःशीत होने पर सीसे की भस्म को निकाल खरल में डालें और उसमें समभाग शुद्ध गन्धक मिलाकर नींबू के रस से मर्दन करें और अन्त में धूप में सुखा दें। अब इस शुष्कचूर्ण को सम्पुट में बन्द करके पुट में फूँक दें। इस प्रकार तीन पुट देने से सीसे की उत्तम भस्म हो जाती है ॥ १६-२३ ॥ तृतीयो मारणप्रकारः नागं विशुद्धन्तु कटाहसंस्थं प्रद्रावयेत्तीव्रतरानलेन । द्रुतन्तु विज्ञाय भिषग्वरेण्यो मयूरचूर्णं क्रमशः क्षिपेद्वै ॥२४॥

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एकोनविंशस्तरङ्गः ४६१ वासां विशुष्कां च समान्तु दत्त्वा सञ्चालयेद्वै वृषदण्डदर्व्या । सुचूर्णितञ्चाथ विलोक्य वैद्यः प्रक्षालयेदच्छजलेन कामम् ॥ २५ ॥ चूर्णं समादाय ततो रसङ्गं तुल्यां मनोज्ञां विमलां तु दत्त्वा । वासारसेनाथ विमर्द्य सम्यक् पुटेत् त्रिवारं रसतन्त्रवैद्यः ॥ २६ ॥ भस्म संजायते श्लक्ष्णं विशदं कज्जलप्रभम् । पक्षाघातादिकान् नागदोषान् नैव करोति च ॥ २७ ॥ सुचिरं सेवनेनापि विकारान्नैव दर्शयेत् । अतो रसायनाचार्यो वीतशङ्कः प्रयोजयेत् ॥ २८ ॥ तृतीयः प्रकारः— मयूरचूर्णं अपामार्गचूर्णम्, वृषदण्डदर्व्या वासकस्यार्द्र- काण्डमेव दर्वी तया ॥ २४-२८ ॥ भा.टी.—शुद्ध सीसक को कड़ाही में रख उसको चूल्हे पर रखकर तेज अग्नि से सीसक को पिघलायें । जब कड़ाही में सीसा पिघल जाय तो उसमें समभाग अपामार्गचूर्ण और समभाग शुष्क वासा (अडूसा) चूर्ण थोड़ा-थोड़ा करके डालते जायें और अडूसे की गीली लकड़ी की करछी से चलाते जायें। जब अपामार्गचूर्ण तथा वासाचूर्ण प्रक्षेप के साथ चलाते हुए सीसे की भस्म हो जाय तो उसे उतार ठंडा करके भस्म को निकाल लें और स्वच्छ जल से क्षारांश रहित होने तक अच्छी तरह धो लें । अब इस धुले और शुष्क सीसक चूर्ण में समभाग शुद्ध मैनसिल मिलाकर अडूसे के स्वरस के साथ अच्छी तरह मर्दन करके सुखा लें और सम्पुट में बन्द करके पुट में फूँक दें । इस विधि को तीन बार दुहराने से सीसक की श्लक्ष्ण विशद और कज्जलसदृश भस्म हो जाती है। इसके सेवन से पक्षाघात आदि नागदोष उत्पन्न नहीं होने पाते हैं। यदि इस भस्म को चिरकाल तक भी सेवन किया जाय तो भी कोई विकार नहीं होने पाता है । अतः इसे निःशंक होकर व्यवहार में लाना चाहिये ॥ २४-२८ ॥ चतुर्थो मारणप्रकारः नागं विशुद्धं तु निधाय दर्व्यां प्रद्रावयेत्तीव्रतरानलेन । द्रुतं समालोक्य भिषग्वरेण्यः पादांशमीशं द्रुमेतव दद्याद् ॥ २६ ॥ द्रुतन्तु भूमाववतार्य खल्वे सम्पेपयेत्सत्वरमेव यत्नात् । प्रक्षाल्य साम्लेन जलेन नूनं बिशोष्य नीरं विदधीत चूर्णम् ॥ ३० ॥ निक्षिप्य सीसाद् द्विगुणन्तु गन्धं सम्पेपयेद्यामयुगं प्रयत्नात् । विलोक्य चूर्णं खलु कज्जलाभं निधापयेद्वैद्यवरः शरावे ॥ ३१ ॥

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शरावसम्पुटस्थितं पुटेल्लघौ पुटे ततः। स्वतः सुशीततां गते शरावमाहरेद्भिषक् ॥ ३२ ॥ विभिद्य सम्पुटात्ततः शुभं सुकज्जप्रभम् । मृतन्तु सीसमाहरेद्रसायनागमार्यमा ॥ ३३ ॥ चतुर्थः प्रकारः पारदगन्धकयोगसाध्यः। अत्र त्रिवारं गन्धकेन पुटनं कार्यम्। रसायनस्यागमः शास्त्रं तत्र अर्यमा सूर्यः रसायनशास्त्रान्धकारापसारणकर्मा अनुभवतीत्यर्थः ॥ २६-३३ ॥ भा.टी.—शुद्ध सीसे को एक लोहे की चम्मच में डाल तीव्र अग्नि में तपायें। जब सीसा पिघल जाय तो उसमें समभाग शुद्ध पारद डालकर शीघ्र ही करछी को नीचे उतार लें और सीसक तथा पारद को खरल में डालकर तत्काल शीघ्रता से पीस लें। जब वह कुछ पीठी वा गीला-चूर्ण हो जाय तो किसी अम्ल जल से अच्छी तरह धोकर सुखा लें। अब इस चूर्ण में सीसे से द्विगुण शुद्धगन्धकचूर्ण डालकर छः घण्टे तक मर्दन करें। जब यह काजल के समान चमकीला काला हो जाय तो इसे एक शरावसम्पुट में बन्द करके लघुपुट में फूंक दें। पुट के स्वांगशीत होने पर सम्पुट में से सुन्दर कज्जलसदृश वर्ण की सीसक भस्म को निकाल लें ॥ २६-३३ ॥ पञ्चमो मारणप्रकारः चूर्णैर्मयूरादिसमुत्थितैस्तु चूर्णीकृतं सीसकमग्नियोगात् । प्रक्षाल्य च क्षारहतिं विधाय सीसार्द्धमानं विमलाक्षचूर्णम् ॥ ३४ ॥ दत्त्वाथ सम्पेक्ष्य शरावसंस्थं पुटेत्प्रमाणाह्वपुटै रसज्ञः । स्वतः सुशीतन्तु विलोक्य विद्वान् समाहरेत्सम्पुटकं प्रयत्नात् ॥ ३५ ॥ रीत्यानया नातिचिरेण नूनमनुत्तमां याति मृतिन्तु सीसम् । विलुप्तशङ्को भिषजां वरेण्यः प्रयोजयेद् भूतिमिमां रसेषु ॥ ३६ ॥ पञ्चमः प्रकारः—क्षारहतिं प्रक्षालनेन क्षारांशविनाशम्। सोऽयं तालकद्वारा निर्मातव्य इति विशेषः, समानमन्यत्पूर्वेण ॥ ३४-३६ ॥ भा. टी.—सीसे को कड़ाही में डाल अग्नि पर गरम करके पिघलायें और उसमें उक्त विधि से अपामार्गचूर्ण वासाचूर्ण, अथवा पिप्पलत्वक्चूर्ण आदि डाल कर भस्म बना लें। अब इस भस्म में सीसे से आधा भाग शुद्ध हरतालचूर्ण मिला अच्छी तरह घोंट कर सम्पुट में बन्द करके लघुपुट में फूंक देवें। इस विधि को दो तीन बार दुहराने से सीसक की उत्तम भस्म बन जाती है ॥ ३४-३६ ॥

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एकोनविंशस्तरङ्गः ४६३ षष्ठो मारणप्रकारः नागं कटाहनिहितं द्रावयेद् वह्नियोगतः । ततः शुद्धशिलाचूर्णं स्वल्पं स्वल्पं मुहुर्मुहुः ॥ ३७ ॥ समांशेन तु निक्षिप्य लोहदर्ज्या प्रचालयेत् । नागभस्म भवेद्यावच्चूर्णं तावत्समापयेत् ॥ ३८ ॥ ततः सीसोन्मितां शुद्धां शिलां दत्त्वा भिषग्वरः । रविदुग्धेन सम्पेष्य पुटयेदृतियत्नतः ॥ ३९ ॥ एवं नातिचिरादेव नागकं मृतिमाप्नुयात् । इत्थं मृतं नागकन्तु सर्वयोगेषु योजयेत् ॥ ४० ॥ षष्ठः प्रकारः—शिलार्कदुग्धाभ्यां निर्माणोयः समानः पूर्वेण ॥ ३७–४० ॥ भा.टी.—शुद्ध सीसे को कड़ाही में डालकर अग्निताप से पिघलायें, जब सीसा पिघल जाय तो उसमें समभाग शुद्ध मैनसिलचूर्ण थोड़ा-थोड़ा करके तब तक डालें और लोहे की करछी से चलाते जायँ जबतक कि सीसे की भस्म (राख) न हो जाय । अब इस भस्म को कड़ाही से निकाल खरल में डालकर उसमें समभाग शुद्ध मैनसिलचूर्ण मिला लें और आक के दूध के साथ मर्दन करें । जब भस्म धूप में सूखकर चूर्ण रूप में हो जाय तो उसे शरावसम्पुट में बन्द करके पुट में फूँक देवें । इस विधि से बहुत शीघ्र ही सीसे की भस्म हो जाती है । इस विधि से बनायी नागभस्म को सब योगों में काम में ला सकते हैं ॥ ३७–४० ॥ सप्तमो मारणप्रकारः सीसकं द्रावयेत्सत्कटाहस्थितं विद्रुतं वीक्ष्य वै वैद्यविचक्षणः । निक्षिपेच्चूर्णितं शुद्धसौगन्धिकं सीसकं सर्वथा याति यावन्मृतिम् ॥४१॥ वीक्ष्य सम्यङ् मृतं सीसकं कोविदः स्वाङ्गशीते सति त्वाददीत द्रुतम् । सीसमेवं मृतं वीतशङ्को भिषग्योजयेत्सर्वथा बाह्ययोगेऽनिशम् ॥४२॥ सप्तमः प्रकारः केवलगन्धकलेपसाध्यो भक्षणयोग्यो मनःशिलादिप्रयोगसह- योगाभावात्, अत उक्तं बाह्ययोगे इति । यथा बाह्यप्रयोगे प्रयुज्यते विदरेऽर्शःसु च नवनीतेन सह ॥ ४२ ॥ भा.टी.—शुद्ध सीसे को लोहे की कड़ाही में डालकर अग्नि पर तपायें । जब सीसा पीघल जाय तो उसमें थोड़ा-थोड़ा करके शुद्ध गन्धक का चूर्ण तब तक

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४६४ रसतरङ्गिणी डालें और लोहे की चम्मच से चलाते जायें जब तक कि सीसक भस्म न हो जाय। अच्छी तरह सीसक भस्म हो जाने पर इसको स्वांगशीत करके भस्म को निकालें। इस विधि से बनी हुई सीसभस्म को बाह्यप्रयोग में काम ला सकते हैं ॥ अथ मृतसीसकस्य गुणाः मृतन्तु सीसं मधुरञ्च तिक्तं स्निग्धं तथोष्णं गुरु लेखनञ्च। सरं तथा वह्निविवर्द्धनञ्च रसागमज्ञैः खलु सम्प्रदिष्टम् ॥ ४३ ॥ अपि च— प्रमेहकरिकेशरी पवनरोगकालानलः। ग्रहयतिनिशारुणः खलु गुदाङ्कुरेभाङ्कुशः। बलासगदतस्करो व्रणगणौकसङ्कर्षणः परं विजयतेतरां गदहरो भुजङ्गो मृतः ॥ ४४ ॥ अपि च— नागस्तु नागसमतां द्रुतमातनोति गुल्मद्विपं दलयतीह चिरप्रमत्तम्। घोरं हरेत्प्रदरमाशु हि रक्तपूर्व्वं तूर्णन्तु रोगनिवहान् विनिहन्ति नूनम् ॥४५॥ मृतनागगुणा—उष्णमिति यद्यपि तन्त्रान्तरीयाः सीसकं स्पर्शशीतमालोक्य शीतवीर्यमाहुः यद्यपि च वङ्गस्येवास्यापि क्षारयोगात् शैत्यं गन्धादियोगादौष्ण्यं संभवति, तथापि मनःशिलादियोगाभावेन सिद्धस्य नागस्य भक्षणायोगात् शीतता- ऽनुपयोगादुष्णत्वमेवास्योक्तमाचार्यदेशीयैः, अपि च प्राचीनपरिभाषास्वपि नाग- स्यांष्णता प्रतिज्ञातेति। प्रमेहकरिकेसरीत्यादिना रूपकेण प्रमेहरोगदिविनाशो मृतनागेन विशेषत उक्तः। नागसमतां हस्तितुल्यबलताम्, रक्तपूर्व्वं प्रदरं रक्त- प्रदरम्, तूर्णं शीघ्रं, रोगनिवहान् रोगसङ्घान्। नूनम् निश्चयेन ॥ ४३–४५ ॥ भा. टी.—उत्तम विधि से बनायी हुई सीसे की भस्म मधुर और तिक्तरस, स्निग्ध उष्ण, गुरु तथा लेखन गुण युक्त होती है। यह आंतों की प्रेरक गति को बढ़ाती है और अग्निवर्धक होती है। सीसे की भस्म प्रमेहरूपी हाथी के लिए शेर के सामन घातक है, वातिक रोगों की संहारक है। संग्रहणीरूपी घोर रात्रि के लिए सूर्य के समान, और बवासीर के मस्से रूपी हाथी को वश में करने के लिए अंकुश है। कफप्रकोपजन्य रोगों को नष्ट करती है और शरीर में होनेवाले विविध

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३० एकोनविंशस्तरङ्गः ४६५ प्रकार के व्रणों को मिटाने में अद्वितीय औषधि है । शास्त्रों में लिखा है कि सीसे की भस्म शरीर में नाग ( हाथी ) के समान बल उत्पन्न करती है और पुरातन गुल्मरोगरूपी हाथी को नष्ट करती है । इसके प्रयोग से भयंकर रक्तप्रदर का रोगी शीघ्र ही अच्छा हो जाता है । इस तरह यह भस्म सभी रोगों को शीघ्र ही नष्ट करती है ॥ ४३-४५ ॥ वक्तव्य—मुख्यतः सीसकभस्म अन्तःप्रयोग में शरीर से होनेवाले मूत्र, रक्त, स्वेद आदि स्रावों को कम करती है । अतएव नागभस्म प्रमेह की उत्तम औषधि मानी जाती है । सम्भवतः वृक्कों के लिए बल्य होने के कारण नाग- भस्म में यह गुण पाया जाता है । नाड़ीसंस्थान के लिये भी नाग उत्तम बल्य होता है, क्योंकि यह नाड़ी संस्थान, वृक्क, यकृत् और अस्थियों में सञ्चित पाया जाता है । सम्भवतः इन अंगों पर नाग का बल्य प्रभाव होता है । इसके सेवन से ग्रहणी की धारणात्मक शक्ति बढ़ जाती है, अतः नागभस्म पुरातन अती- सार और संग्रहणी में अत्यन्त लाभदायक होती है । श्वास्रोग, आमवात आदि श्लैष्मिक रोगों में इसका श्लेष्महर प्रभाव होता है । आँतों की शोथ दूर करने के लिए यह मुख्य औषधि मानी जाती है, क्योंकि आन्त्रशोथ, ग्रन्थि आदि रोगों में श्लेष्मसञ्चय मुख्य कारण होता है । यह संस्थान ( आँतों ) के लिए बल्य होने से वहाँ पर सञ्चित होनेवाले दोष को मिटा देती है । वंग की अपेक्षा उत्तम जीवाणुहर विशेषतः आन्त्रिक रोग जीवाणुहर होने से यह आन्त्रक्षय में विशेष लाभदायक होती है । गर्भाशय आदि अंगों पर भी नागभस्म का ग्राही प्रभाव होता है जिससे वहाँ से होनेवाला रक्तस्राव, व्रणस्राव और शोथस्राव सूख जाता है और उसके रोगकारक जीवाणु भी नष्ट हो जाते हैं । यह ग्राही होने के कारण आमाशयविस्तृति तथा तज्जन्य अम्लपित्त में भी विशेष लाभ- कारी सिद्ध होती है । कण्ठमाला तथा अपची आदि की ग्रन्थियों को संकुचित करने के कारण यह इन रोगों में बहुधा प्रयुक्त होती है । आन्त्रशूल, विशेषतः रंग के कारखाने में काम करनेवालों के उदरशूल में यह उत्तम गुण रखती है । मधुमेह की अन्तिम अवस्था में होनेवाली मूर्च्छा के लिये यह उत्तम औषधि मानी जाती है । निष्क्रमण—नाग का निष्क्रमण मूत्र, पित्त, स्वेद, स्तन्य (छाती का दूध) और आँतों में से मल के द्वारा होता है । अतः इन अवयवों पर इसका ग्राही प्रभाव होता है ।

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४६६ | रसतरङ्गिणी मृतसीसकस्य मात्रा पादांशतो रक्तिकाया रक्तिकैकमितं शुभम् । मृतं सीसं प्रयुञ्जीत बलकालाद्यपेक्षया ॥ ४६ ॥ मृतसीसकमात्रा देशकालापेक्षयावधानीयेति प्राह-पादांशतो रक्तिकायाः, इत्यादिना ॥ ४६ ॥ आ.टी.- रोग और रोगी के बल, दोष, काल आदि का सम्यक विचार करके चौथाई रत्ती से एक रत्ती तक सीसकभस्म प्रयोग की जाती है ॥४६ ॥ अथ मृतसीसकस्य आमयिकः प्रयोगः गुञ्जैकप्रमितं सीसं निशामलकसंयुक्तम् । मधुना शीलितं तूर्णं प्रमेहं विनिवारयेत् ॥ ४७ ॥ अशोकक्वाथसंयुक्तं मृतं सीसन्तु शीलितम् । अचिरादेव चिरजं रक्तप्रदरमुद्धरेत् ॥ ४८ ॥ गुञ्जैकप्रमितं सीसं नागकेशरसंयुतम् । रक्ताशसं निहन्त्याशु वृत्तमिन्र्दाशनिर्यथा ॥४६॥ गुडूचिकासत्त्वरजोभिर्मिश्र मृतन्तु सीसं मधुनावलीढम् । विनाशयेन्नातिचिरेण नूनं बलासवातप्रभवन्तु मेहम् ॥५०॥ सुवर्णरससिन्दूरताम्राढ्यं खलु सीसकम् । शीलितं विनिहन्त्याशु त्वन्त्रशोथं सुदारुणम् ॥ ५१ ॥ आत्मगुप्ताबलामूलमांसीक्वाथेन सीसकम् । वृक्षशाथसमुद्भूतमाक्षेपं नाशयत्यलम् ॥ ५२ ॥ रससिन्दूरताम्राढ्य सीसकं परिशीलितम् । सर्वाङ्गकम्पनारब्धं हन्ति पक्षवधामयम् ॥ ५३ ॥ प्रसारणीबलारास्नाकपिकच्छूकषायतः । सतारं यशदं सीसं सुमृतं परिशीलितम् ॥ ५४ ॥ अङ्गप्रसारिणीपेशीगतदोषसमुत्थितम् । विनिहन्ति विशेषेण पक्षाघातं सुदारुणम् ॥ ५५ ॥ रोगयोग्यः प्रयोगः--निशा हरिद्रा । बलासवातप्रभवमिति बलासः कफः, ततश्च कफवातजातमित्यर्थः । अन्त्रशोथवृकसमुद्भूताक्षेपादिनिवारकोऽस्य गुणः प्राचीनार्पारभाषितोऽप्यनुभवादुक्तः अङ्गप्रसारिणीपेशीगतो दोषो वातसंस्थानदुष्टि- हेतुः, तस्माज्जातं पक्षाघातम् ॥ ४७-५५ ॥

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एकानविंशस्तरङ्गः ४६७ भा.टी.—एक रत्ती उत्तम सीसकभस्म में हरिद्राचूर्ण और आमलों का चूर्ण दो रत्ती मिलाकर शहद के साथ चटाने से बहुत शीघ्र प्रमेह रोग में आराम आता है । सीसकभस्म को अशोकत्वक्‌कषाय के साथ कुछ दिन सेवन करने से शीघ्र ही पुरातन रक्तप्रदर रोग में आराम आ जाता है । एक रत्ती सीसकभस्म में ४ रत्ती नागकेसरचूर्ण मिला सेवन करने से रक्तार्श रोग नष्ट हो जाता है । गुडूचीसत्त्व में सीसकभस्म मिलाकर शहद के साथ चाटने से कुछ दिनों में वात- प्रकोपजन्य प्रमेह रोग शीघ्र ही नष्ट हो जाता है । सीसकभस्म में स्वर्णभस्म, रससिन्दूर तथा ताम्रभस्म मिलाकर उचित अनुपान के साथ सेवन करने से आन्त्रशोथ (आन्त्रक्षय) में शीघ्र ही आराम आता है । वृक्कों में शोथ के कारण उत्पन्न विष द्वारा होनेवाले आक्षेप में सीसकभस्म का कौंच के बीज, बलामूल तथा जटामांसी कषाय के साथ सेवन करने से अवश्य आराम आता है । सर्वांग में कम्पन के साथ उत्पन्न होनेवाले पक्षाघात (लकवा) में सीसकभस्म को रस- सिन्दूर तथा ताम्रभस्म मिलाकर सेवन करने से आराम आता है । प्रसारिणी बला (करैंटी), रास्ना और कौंच के बीज या मूल के कषाय अनुपान से सीसक- भस्म में रजत तथा यशदभस्म मिलाकर सेवन करने से हस्तपाद आदि अंगों की प्रसारक मांसपेशीगत विकार के कारण उत्पन्न भयानक पक्षाघात में विशेषरूप से आराम आता है ॥ ४७-५५ ॥ अन्त्रशोषान्तकरः शिलया निहतं सीसं तोलकद्वयसंमितम् । कान्तपाषाणमसितं सीसकप्रमितं शुभम् ॥ ५६ ॥ निश्चन्द्रिकं सुवर्णं तु तथा यशदकारणम् । गगनं रविलोहं च पृथक् तोलकसंमितम् ॥ ५७ ॥ सर्वार्द्धं गन्धकं दत्त्वा पेषयेत्कन्यकाम्भसा । त्रिधा वराहाख्यपुटे पुटयेद्भिषजां वरः ॥ ५८ ॥ खल्वे सञ्चूर्ण्य च ततः काचकूप्यां तु विन्यसेत् । समाख्यातो रसोऽयं तु ह्यन्त्रशोषान्तकाभिधः ॥ ५९ ॥ श्रीमद्भिर्गुरुवर्यैस्तु ह्ययमाविष्कृतो रसः । प्रकाशितः खलु मया लोकानुग्रहकाम्यया ॥ ६० ॥ अन्त्रशोषान्तकरसो नवाविष्कृतः—यशदकारणं खर्परम् । रविलोहं ताम्रम् निगदव्याख्यातमन्यत् ॥ ५६-६० ॥

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४६८ रसतरङ्गिणी भा.टी.—शुद्ध मैनसिल द्वारा बनायी हुई उत्तम सीसकभस्म दो तोला, कान्तपाषाणभस्म दो तोला, चन्द्रिका रहित स्वर्णभस्म, खर्परभस्म, अभ्रकभस्म, ताम्रभस्म, प्रत्येक एक तोला और सबसे आधा भाग अर्थात् चार तोला शुद्ध- गन्धक लेकर सबको एकत्र खरल में घीकुआर के गूदे से मर्दन कर गोला-सा बना शरावसम्पुट में बन्द करके वराहपुट में फूँक दें। स्वांगशीत होने पर सम्पुट से द्रव को निकाल पुनः घीकुआर के गूदे में घोटकर सम्पुट में बन्द करके वराह- पुट में फूँक दें। पुनः तीसरी बार भी उक्त विधि से वराहपुट में फूँक दें। अन्त में सम्पुट से औषधि को निकाल खरल में पीस कर कांच की शीशी में रख लें। इसको अन्त्रशोषान्तक रस कहा जाता है। इस रस का आविष्कार श्री स्व० गुरुवर कविराज नरेन्द्रनाथ मित्रजी ने किया और यह अत्यन्त उपयोगी रस है ॥ ५६–६० ॥ अस्य गुणाः अन्त्रशोषापहरणो ग्रहणीविनिवारणः । जीर्णाजीर्णप्रहरणो यक्ष्मलक्ष्मनिबर्हणः ॥ ६१ ॥ अरोचकाद्युपगतं दारुणं दीर्घकालजम् । अतीसारं निहन्त्याशु कामं यक्ष्मसमाश्रयम् ॥ ६२ ॥ आध्मानापहमत्यन्तं गुल्मप्लीहनिषूदनम् । जीर्णज्वरप्रशमनं बलसञ्जननं परम् ॥ ६३ ॥ गुञ्जार्द्धतः समारभ्य गुञ्जैकप्रमितं परम् । प्राणाचार्यः प्रयुञ्जीत बलकालाद्यपेक्षया ॥ ६४ ॥ अस्य गुणाः—जीर्णाजीर्णं पुराणमजीर्णम्, तस्य प्रहरणो नाशक इत्यर्थः । यक्ष्मणोक्ष्म लक्षणं तस्य निबर्हणो नाशकः । स्पष्टमन्यत् ॥ ६१–६४ ॥ भा.टी.—उक्त अन्त्रशोषान्तक रस आन्त्रशोथ (क्षय) को नष्ट करता है और ग्रहणी रोग को मिटाता है। इसके कुछ दिन सेवन से पुरातन अजीर्ण रोग मिट जाता है और यह राजयक्ष्मा के लक्षणों को नष्ट करता है। राजयक्ष्मा रोग में होनेवाले दीर्घकालीन अरुचि आदि अनेक उपद्रव युक्त अतीसार में इससे शीघ्र ही आराम आता है। वातप्रकोपजन्य उदराध्मान तथा गुल्म और प्लीहा- रोग को नष्ट करता है। जीर्णज्वरनाशक और शरीरबल वर्धक है। इस रस को रोग तथा रोगी का बल देखकर काल आयु प्रकृति आदि का विचार करके आधी रत्ती से एक रत्ती तक की मात्रा में प्रयोग करना चाहिये ॥ ६१–६४ ॥

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एकोनविंशस्तरङ्गः ४६६ अथ आरनालीयसीसकस्य नामानि काञ्जिकाम्‍लीयसीसञ्च त्वारनालीयसीसकम् । तदेव च समाख्यात काञ्जिकाम्‍लीयनागकम् ॥ ६५ ॥ आरनालीयसीसकस्य निर्माणप्रकारः चत्वारिंशद्भागिकन्तु सुतीव्रं काञ्जिकाम्‍लकम् । परिस्रुतञ्च विमलं जलं विंशतिभागिकम् ॥ ६६ ॥ मृदारशृङ्गचूर्णन्तु चतुर्विंशतिभागिकम् । काचपात्रे सुविमले स्थापयेद्भिषजां वरः ॥ ६७ ॥ चुल्लिकायां निधायाथ कामं मन्दाग्निना पचेत् । द्रवीभूतं ततो ज्ञात्वा चुल्लीतस्त्ववतारयेत् ॥ ६८ ॥ ततः सारकपत्रेण स्रावयेदतियत्नतः । पुनर्मन्दानलेनैव स्रावितं सलिलं पचेत् ॥ ६९ ॥ किञ्चिज्जलांशशेषे च पात्रमाश्र्ववतारयेत् । स्वाङ्गशोतं समालोक्य ततः पात्रतलस्थितान् ॥ ७० ॥ आरनालीयसीसस्य हिमकुन्देन्दुसन्निभान् । सूक्ष्मान् कणान् निपतितान् गृह्णीयाद्भिषजांवरः ॥७१ ॥ अथ नवीनपरिभाषित आरनालीयसीसकनिर्माणप्रकारः—तत्रादौ आरना- लीयसीसकनामानि काञ्जिकाम्‍लीयसीसकमित्यादिना। सुतीव्रं काञ्जिकाम्‍लकं अनुपपदं वक्ष्यमाणप्रकारम् । मन्दाग्निना पाको मृद्दारशृंगान्तर्गतनागभागद्रव- सम्पादनार्थः, उक्तमानञ्चित्पजलशेषे हि यथा नागभागद्रुतिर्जायेत, न च प्रागेव नागद्रवात् जलांशशोपः स्यादिति भावः । अतियत्नतः सारणञ्च सारितजल- स्यात्यन्तनिर्मलतातत्पर्य्येणोक्तम् ॥ ६५–७१ ॥ भा.टो.—काञ्जिकाम्‍लीयसीसा, आरनालीयसीसा, काञ्जिकाम्‍लीयनाग, यह आरनालीयसीसक का पर्याय नाम है । चालीस भाग तीव्र सिरकाम्ल में बीस भाग शुद्ध परिस्रुत जल और चौबीस भाग मुरदासंग चूर्ण मिलाकर एक कांच के पात्र में चूल्हे अथवा सुरा प्रदीप पर मन्द-मन्द अग्नि देकर पकायें । जब मुरदासंग जल में घुल जाय तो पात्र को चूल्हे से नीचे उतार लें और इस घोल को सारक पत्र (फिल्टर

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४७० रस्तरङ्गिणी पेपर ) से छान लें। अब इस छने हुए जल को एक काँच पात्र में डालकर पुनः अग्नि पर पकायें। जब कुछ जलांश शेष रहे तो पात्र को नीचे उतार ठंडा होने को रख दें। पात्र के शीतल होने पर पात्र के तल प्रदेश में जमे हुए सीसक सिरकित् के चन्द्रमा के समान श्वेत वर्ण के छोटे-छोटे कणों (Cristals) को एकत्र कर लें। यह सीसक सिरकित् बनाने की विधि है॥६५-७१॥ वक्तव्य—उक्त विधि से बनाया हुआ सीसक सिरकित् मधुररस और ग्राही चूर्ण होता है जो ढाई गुने जल में घुल जाता है। इसकी मात्रा १ ग्रेन ( ३/४ रत्ती ) से ५ ग्रेन तक होती है। अथ आरनालीयसीसकद्रवस्य निर्माणप्रकारः आरनालीयसीसकंतु निर्मलं शरभागिकम् । सार्द्धत्रिभागकञ्चैव शुद्धं मृद्दारशृङ्गकम् ॥ ७२ ॥ परिस्रुतञ्च विमलं जलं विंशतिभागिकम् । सम्मेल्य काचपात्रे च चुल्लिकायां निधापयेत् ॥ ७३ ॥ पचेन्मन्दाग्निना तावत् यावदेति द्रुतिं पराम् । यावज्जलं प्रशुष्येत द्रुतिपर्यन्तमग्निना ॥ ७४ ॥ विनिक्षिपेज्जलं तावद्रसतन्त्रविचक्षणः । काचकूप्यां निधायाथ भिषग्रत्नः प्रयोजयेत् ॥ ७५ ॥ अथारनालीयसीसकद्रवस्य निर्माणम्—आरनालीयक इत्यत्र “अल्पार्थे कन्” इत्यल्पार्थे कन्–प्रत्ययो विहितः। तेनांग्लभाषाप्रसिद्ध “Sub” इत्युपसर्गप्रत्या- यक इत्यवनेयम् । आरनालीयसीसं पूर्वोक्तसाधनं पञ्चभागिकम्, मृद्दारशृंगं जलधौतपिष्टं शुद्धं सार्धत्रिभागिकम्, परिस्रुतजलस्य २० भागाः। मन्दाग्नौ द्राव- येत् । द्रुतौ सत्यां परिस्रुतजलस्य यावानंशो वह्निना शुष्कस्तावदेवान्यत् जलं तत्र द्रुतौ क्षेप्यम् इत्याशयः ततः काचकूप्यां निधानमिति ॥ ७२–७५ ॥ भा.टी.—आरनालीय सीसक चूर्ण पाँच भाग, शुद्ध मुरदासँग साढ़े तीन भाग, शुद्धपरिस्रुत जल बीस भाग लेकर सब को एक कांचपात्र में मिला चूल्हे पर रखें और मन्द-मन्द अग्नि से मुरदासँग के घुलने तक पकायें । मुरदासँग के जल में घुलने में जितना जल सूख जाय उतना शुद्ध परिस्रुत जल उसमें फिर मिला दें। और नीचे उतारकर इस द्रव को एक कांच की शीशी में रख लें । इसको Sublead acitate lotion कहते हैं ॥ ७२–७५ ॥