रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)
Rasendra Sara Sangraha of Gopalakrishna with Commentary
गोपालकृष्ण भट्ट (टीकाकार: पं. रामप्रसाद वैद्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें॥ श्रीः ॥ समर्पणम् । संसारसंपातनिपातितानां मोहप्रमादेन विमोहितानाम् । दुःखार्णवप्लावितजीवितानां त्वमेव नस्तत्परमावलंबनम् ॥ प्रभो ! दयालो ! शरणागतवत्सल ! वह संसारमें कौनसा पदार्थ है जिसे अपना समझ आपके चरणकमलोंमें समर्पण करनेका साहस करूं ? नाथ ! समर्पण करना तो अलग रहा यहां तो अवस्था ही और है, संसारके संपातोंसे बार बार पातित होनेपर मोहरूपी उन्मादसे ज्ञानशून्य अवस्था इस जीवनको दुःख समुद्रकी डुबकियें खाते देख समर्पणकी किसे सूझ सकती है । जगदाधार ! अपने बचावकी इच्छासे या आपके चरणोंका आश्रय लेनेकी इच्छासे कोई महात्मा अपने मनको आपकी शरणमें भेजनेका प्रयत्न करे यह बात अलग है किन्तु समर्पणकी इच्छासे कौन महापुरुष है जो आपकी शरण जाय । ऐसा प्रायः सब लोग कहते हैं कि जिसे आपका यथार्थ ज्ञान है वह संसारके सब झंझट पर लात मार अनन्य प्रेमके मार्ग जाकर जिस वस्तुको वह अपना माना हुआ हो उसे आपके चरणोंमें समर्पण कर देता है ? परन्तु नाथ ! आपका ज्ञान और आपका प्रेम प्राप्त किसे हो सकता है यहां तो और प्रकारके ही प्रेम देखनेमें आते हैं । कोई अपने पुत्र कलत्रादिकमें मोहित रहनेको प्रेम कहते हैं, कोई किसीके स्वरूपपर मस्त हो जानेको ही प्रेम माने हुए हैं, कोई स्वार्थवश किसीकी सेवा करनेको प्रेम कहते हैं एवं कोई बडी लम्बी चौडी पूजापाठ या माला तिलकको प्रेम माने हुए हैं, अब नये ढंगकी व्याख्यानबाजी भी एक प्रेमका अंग मानी जाने लगी परंतु क्या प्रभो ! इन सम्पातोंका नाम प्रेम है ? दयालो ! आपका प्रेम किसको प्राप्त हो सकता है ? प्राप्त हो भी कैसे, उसका अधिकारी ही कौन है, नाथ ! वह ज्ञान और वह प्रेम तो उसे ही मिलता है जिसे आप स्वयंही अपने दयालु नामको सार्थक करनेके लिये अपना लें । अहो नाथ ! जिसे आप अपना लें वह धन्ध है, उसके चरणरजसे यह वसुंधरा भी धन्य है, प्रभो ! समर्पण भी वही कर सकता है