भारतकोश
रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)

रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)

Rasendra Sara Sangraha of Gopalakrishna with Commentary

गोपालकृष्ण भट्ट (टीकाकार: पं. रामप्रसाद वैद्य) द्वारा

DevanagariHindipublished584 पृष्ठ

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समर्पणम् । (७) जिसे वह निर्दोष प्रेम प्राप्त हो। दयालो ! मै क्या समर्पण करूं मेरा तो किसी वस्तुपर अधिकार ही नहीं, यहां तो अपना मन भी अपने वश नहीं, वश तो तब हो जो अपना हो यह तो कुछ विचित्र चक्र है इसका पारा- वार आपही जानते होंगे अथवा कोई आपका ही जन जानता होगा । हूं तो मैं भी आपका परंतु मुझमें न तो यथार्थ आपका होजानेका ज्ञान ही है, न मुझसे वह परिश्रम ही हो सका । तो नाथ ! अब क्या करूं प्रयत्न तो आपसे विमुख होनेका कर रहा हूं, इच्छा है आपके प्रेमकी । यह तो बडा ही टेढा चक्र है अब कलम भी रुकती है ! प्रभो ! स्वयं अपनानेकी कृपा कीजिये यह तो जो है आपसे छिपाही नहीं, दिन रात्रिके २४ घण्टे होते हैं ३६ कामोंकी उलझन गलेमें डालनेमें सुख समझता हूं फिर आपके मार्ग जानेकी इच्छा करता हूं ऐसे चक्रमें बताइये सिवाय सच्ची अथवा झूठी रीतिसे आपके शरण जानेके और मेरा कौन आश्रय हो सकता है । तो क्या मैं इस अंटसंट अनुवाद ( टीका ) को समर्पण करनेके लिये आपका अवलंबन चाहता हूं । नहीं नाथ ! नहीं, समर्पण तो यह अपने इस चंचल चित्तको करने आया है इसका समर्पण विना आपकी कृपा नहीं हो सकती । यदि हो सकती है तो स्वीकार कीजिये, यह आपका जन प्रार्थना करता है इसके चित्तको संसारके झंझटोंसे हटा अपनी शरणमें लीजिये ॥ हृदय सदा यादवतः पापाटव्या दुरासदायादवतः । अरिसमुदायादवतस्त्रिजगन्मा गाः स्मरेण दायादवतः ॥ आपका- रामप्रसाद.