भारतकोश
ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Rigveda Samhita with Hindi Translation

डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा

स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,855 पृष्ठ

पृष्ठ 314, कुल 1855 में से

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पृष्ठ 314

त्वमादित्याँ आ वह तान्ह्यु१ श्मस्यग्ने सख्ये मा रिषामा वयं तव.. (३) हे अग्नि! हम तुम्हें भली प्रकार ज्वलित कर सकें एवं तुम हमारे यज्ञों को पूरा करो, क्योंकि ऋत्विजों द्वारा तुम में डाला गया हव्य देवगण भक्षण करते हैं. तुम अदितिपुत्रों अर्थात् देवों को यहां ले आओ, क्योंकि हम उनकी कामना करते हैं. तुम्हारी मित्रता प्राप्त कर लेने पर कोई हमारी हिंसा न करे. (३) भरामेध्मं कृणवामा हवींषि ते चितयन्तः पर्वणापर्वणा वयम्. जीवातवे प्रतरं साधया धियोऽग्ने सख्ये मा रिषामा वयं तव.. (४) हे अग्नि! हम तुम्हारे यज्ञ के लिए ईंधन एकत्र करते हैं एवं प्रति पर्व पर दर्शपौर्णमास यज्ञ करते हुए तुम्हें ज्ञान कराकर हव्य देते हैं. तुम हमारे जीवनकाल को बढ़ाने के लिए यज्ञ पूर्ण कराओ. तुम हमारे मित्र बन गए हो, अब कोई हमारी हिंसा न करे. (४) विशां गोपा अस्य चरन्ति जन्तवो द्विपच्च यदुत चतुष्पदक्तुभिः. चित्रः प्रकेत उषसो महाँ अस्यग्ने सख्ये मा रिषामा वयं तव.. (५) इसकी किरणें समस्त प्राणियों की रक्षा करती हुईं विचरण करती हैं. दो पैरों और चार पैरों वाले जंतु इसकी किरणों से युक्त हो जाते हैं. हे अग्नि, तुम विचित्र दीप्तिसंपन्न, सबका ज्ञान कराने वाले एवं उषा से भी महान् हो. तुम्हारी मित्रता प्राप्त करके हम किसी के द्वारा हिंसित न हों. (५) त्वमध्वर्युस्त होतासि पूर्व्यः प्रशास्ता पोता जनुषा पुरोहितः. विश्वा विद्वाँ आर्त्विज्या धीर पुष्यस्यग्ने सख्ये मा रिषामा वयं तव.. (६) हे अग्नि! तुम यज्ञों को देवों के प्रति पहुंचाने वाले, अध्वर्यु, होता, प्रशास्ता, यज्ञ के शोधक अर्थात् पोता एवं जन्म से ही पुरोहित हो. तुम ऋत्विज् के समस्त कर्मों को जानते हो, इसलिए हमारा यज्ञ पूरा करो. तुम्हारी मित्रता प्राप्त करके हम किसी के द्वारा हिंसित न हों. (६) यो विश्वतः सुप्रतीकः सद्ङ्डसि दूरे चित्सन्तळिदिवाति रोचसे. रात्र्याश्चिदन्धो अति देव पश्यस्यग्ने सख्ये मा रिषामा वयं तव.. (७) हे अग्नि! तुम शोभन-अंग वाले होते हुए भी सबके समान हो एवं दूर रहकर भी समीप दिखाई देते हो. हे देव! तुम रात के अंधकार का नाश करके चमकते हो. तुम्हारी मित्रता प्राप्त करके हम किसी के द्वारा हिंसित न हों. (७) पूर्वो देवा भवतु सुन्वतो रथोऽस्माकं शंसो अभ्यस्तु दूढ्यः. तदा जानीतोत पुष्यता वचोऽग्ने सख्ये मा रिषामा वयं तव.. (८) ebook converter DEMO Watermarks*