ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Rigveda Samhita with Hindi Translation
डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा
स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)
पृष्ठ 317, कुल 1855 में से
संदर्भ में पढ़ेंत्रीणि जाना परि भूषन्त्यस्य समुद्र एकं दिव्येकमप्सु. पूर्वामनु प्र दिशं पार्थिवानामृतून्प्रशासद्वि दधावनुष्ठु.. (३) समुद्र, आकाश और अंतरिक्ष—ये अग्नि के तीन जन्मस्थान हैं. सूर्यरूप अग्नि ने ऋतुओं को विभक्त करके बताते हुए पृथ्वी पर रहने वाले समस्त प्राणियों के निमित्त पूर्व दिशा को अनुक्रम से बनाया. (३) क इमं वो निण्यमा चिकेत वत्सो मातॄर्जनयत स्वधाभिः. बह्वीनां गर्भो अपसामुपस्थान्महान्कविर्निश्नरति स्वधावान्.. (४) हे यजमानो! जल, वन आदि में गर्भरूप से स्थित अग्नि को तुम में से कौन जानता है? अर्थात् कोई नहीं. यह पुत्र होकर भी अपनी जलरूपी माताओं को हव्य द्वारा जन्म देता है. यह प्रौढ़ तेज वाला, क्रांतदर्शी एवं हवि रूप अन्न से युक्त अग्नि अनेक प्रकार के जलों को उत्पन्न करने का कारण बनकर समुद्र से सूर्य रूप में निकलता है. (४) आविष्ट्यो वर्धते चारुरासु जिह्मानासूर्ध्वः स्वयशा उपस्थे. उभे त्वष्टुर्बिभ्यतुर्जायमानात्प्रतीची सिंहं प्रति जोषयेते.. (५) मेघों में तिरछे रहने वाले जल की गोद में रहकर भी ऊपर की ओर जलता हुआ अग्नि शोभन दीप्ति वाला बनकर चमकता एवं बढ़ता है. त्वष्टा से उत्पन्न अग्नि से धरती और आकाश दोनों डरते हैं एवं सहनशील अग्नि के समीप आकर सेवा करते हैं. (५) उभे भद्रे जोषयेते न मेने गावो न वाश्रा उप तस्थुरैवैः. स दक्षाणां दक्षपतिर्बभूवाज्जन्ति यं दक्षिणतो हविर्भिः.. (६) रात और दिन दोनों शोभन स्त्रियों के समान अग्नि की सेवा करते एवं रंभाती हुई गायों के समान पास में आकर ठहरते हैं. आह्वानीय अग्नि के दक्षिण भाग में स्थित होकर ऋत्विज् हव्य द्वारा जिस अग्नि को तृप्त करते हैं, वह समस्त बलों का स्वामी बनता है. (६) उद्यंयमीति सवितेव बाहू उभे सिचौ यतते भीम ऋञ्जन्. उच्छुक्रमत्कमजते सिमस्मान्नवा मातृभ्यो वसना जहाति.. (७) भयंकर अग्नि सूर्य की भुजा रूपी किरणों के समान अपने तेज को विस्तृत करते एवं धरती-आकाश दोनों को अलंकृत करके उनके काम में लगाते हैं तथा समस्त पदार्थों से तेजस्वी एवं साररूप रस ग्रहण करते हैं. वे अपनी माता रूप जल से सारे संसार को ढकने वाला नवीन तेज बनाते हैं. (७) त्वेषं रूपं कृणुत उत्तरं यत्संपृञ्चानः सदने गोभिरद्भिः. कविर्बुध्नं परि मर्मृज्यते धीः सा देवताता समितिर्बभूव.. (८) ebook converter DEMO Watermarks*