ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Rigveda Samhita with Hindi Translation
डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा
स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)
पृष्ठ 327, कुल 1855 में से
संदर्भ में पढ़ेंगणरूप में वर्तमान यज्ञ में बिछे हुए कुशों पर तृप्त बनो. (९) मादयस्व हरिभिर्ये त इन्द्र वि ष्यस्व शिप्र वि सृजस्व धेने. आ त्वा सुशिप्र हरयो वहन्तूशनहव्यानि प्रति नो जुषस्व.. (१०) हे इंद्र! अपने घोड़ों के साथ प्रसन्न बनो, सोमपान के निमित्त अपने जबड़ों, जिह्वा एवं उपजिह्वा को खोलो. हे सुंदर ठोड़ी वाले इंद्र! घोड़े तुम्हें यहां लावें. तुम हमारी कामना करते हुए हमारा हव्य ग्रहण करो. (१०) मरुत्स्तोत्रस्य वृजनस्य गोपा वयमिन्द्रेण सनुयाम वाजम्. तन्नो मित्रो वरुणो मामहन्तामदितिः सिन्धुः पृथिवी उत द्यौः.. (११) मरुतों के साथ स्तुति किए जाने वाले एवं शत्रुहंता इंद्र के द्वारा सुरक्षित हम उनसे अन्न प्राप्त करें. मित्र, वरुण, अदिति, सिंधु, पृथ्वी और आकाश उस अन्न की पूजा करें. (११) सूक्त—१०२ देवता—इंद्र इमां ते धियं प्र भरे महो महीमस्य स्तोत्रे धिषणा यत्त आनजे. तमुत्सवे च प्रसवे च सासहिमिन्द्रं देवासः शवसामदन्ननु.. (१) हे इंद्र! तुझ महान् के उद्देश्य से मैं यह महती स्तुति कर रहा हूं, क्योंकि तुम्हारी अनुग्रह बुद्धि मेरे स्तोत्र पर ही आधारित है. ऋत्विजों ने अभिवृद्धि एवं धन पाने के लिए शत्रु पराभवकारी इंद्र को स्तुतियों द्वारा प्रसन्न किया है. (१) अस्य श्रवो नद्यः सप्त बिभ्रति द्यावाक्षामा पृथिवी दर्शतं वपुः. अस्मे सूर्याचन्द्रमसाभिचक्षे श्रद्धे कमिन्द्र चरतो वितर्तुरम्.. (२) गंगा आदि सात सरिताएं इंद्र की कीर्ति एवं आकाश, पृथ्वी तथा अंतरिक्ष इंद्र का दर्शनीय रूप धारण करते हैं. हे इंद्र! पदार्थों को हमारे सामने प्रकाशित करने एवं हमारी श्रद्धा उत्पन्न करने के लिए सूर्य और चंद्र बारीबारी से बार-बार घूमते हैं. (२) तं स्म रथं मघवन्प्राव सातये जैत्रं यं ते अनुमदाम संगमे. आजा न इन्द्र मनसा पुरुष्टुत त्वायद्भ्यो मघवञ्छर्म यच्छ नः.. (३) हे हमारी बुद्धि द्वारा अनेक बार स्तुति किए गए इंद्र! तुम्हारे जिस जयशील रथ को शत्रुओं के साथ होने वाले संग्राम में देखकर हम प्रसन्न होते हैं, हे धनस्वामी इंद्र! हमें धन देने के लिए उसी रथ को चलाओ एवं अपने अभिलाषी हम लोगों को सुख दो. (३) वयं जयेम त्वया युजा वृतमस्माकमंशमुदवा भरेभरे. अस्मभ्यमिन्द्र वरिवः सुगं कृधि प्र शत्रूणां मघवन्वृष्ण्या रुज.. (४)