भारतकोश
ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Rigveda Samhita with Hindi Translation

डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा

स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,855 पृष्ठ

पृष्ठ 534, कुल 1855 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 534

सिंचन किया. (४) सना ता का चिद्भवना भवीत्वा माद्भिः शरद्भिरुद्नरो वरन्त वः. अयतन्ता चरतो अन्यदन्यदिद्या चकार वयुना ब्रह्मणस्पतिः.. (५) हे ऋत्विजो! तुम्हारे कल्याण के लिए ही बृहस्पति ने नित्य एवं विचित्र ज्ञान से प्रतिमान और प्रतिवर्ष होने वाली जलवर्षा का द्वार भिन्न किया था. बृहस्पति ने इस ज्ञान को मंत्र का विषय बनाया, जिससे धरती और आकाश एक-दूसरे को प्रसन्न करते रहें. (५) अभिनक्षन्तो अभि ये तमानशुर्निधिं पणीनां परमं गुहा हितम्. ते विद्वांसः प्रतिचक्ष्यानृता पुनर्यत उ आयन्तदुदीयुरराविशम्.. (६) अंगिरागोत्रीय विद्वान् ऋषियों ने चारों ओर घूमते हुए पणियों द्वारा गुफा में छिपाए हुए गोरूपी धन को प्राप्त किया. वे असुरों की माया को देखकर जिस स्थान से निकले थे, वहीं प्रवेश कर गए. (६) ऋतावानः प्रतिचक्ष्यानृता पुनरात आ तस्थुः कवयो महस्पथः. ते बाहुभ्यां धमितमग्निमश्मनि नकिः षो अस्त्यरणो जहुर्हि तम्.. (७) सत्यवादी एवं क्रांतदर्शी अंगिरागोत्रीय ऋषि राक्षसों की माया को देखकर वहां आने की इच्छा से फिर प्रधान मार्ग पर पहुंच गए. उन्होंने हाथों द्वारा प्रज्वलित अग्नि को पर्वत पर फेंका. इससे पहले वे अग्नि वहां नहीं थे. (७) ऋतज्येन क्षिप्रेण ब्रह्मणस्पतिर्यत्र वष्टि प्र तदश्नोति धन्वना. तस्य साध्वीरिषवो याभिरस्यति नृचक्षसो दृशये कर्णयोनयः.. (८) ब्रह्मणस्पति सत्यरूप ज्या वाले धनुष से जो चाहते हैं, वही पा लेते हैं. वे कान से उत्पन्न, दर्शनीय एवं कार्य साधन में कुशल बाणों को फेंकते हैं. (८) स संनयः स विनयः पुरोहितः स सुष्टुतः स युधि ब्रह्मणस्पतिः. चाक्ष्मो यद्वाजं भरते मती धनादित्सूर्यस्तपति तप्यतुर्वृथा.. (९) देवों द्वारा आगे स्थापित बृहस्पति अलग-अलग पदार्थों को मिलाते और मिले हुए को भिन्न-भिन्न करते हैं एवं युद्ध में प्रकट होते हैं. वे सर्वद्रष्टा जिस समय अन्न एवं धन धारण करते हैं, उस समय सूर्य अनायास ही चमक उठते हैं. (९) विभु प्रभु प्रथमं मेहनावतो बृहस्पतेः सुविद्त्राणि राध्या. इमा सातानि वेन्यस्य वाजिनो येन जना उभये भुञ्जते विशः.. (१०) वर्षा करने वाले बृहस्पति का धन व्याप्त, प्रौढ़, मुख्य एवं सुलभ है. यह धन सुंदर एवं eBook converter DEMO Watermarks*