भारतकोश
ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Rigveda Samhita with Hindi Translation

डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा

स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,855 पृष्ठ

पृष्ठ 535, कुल 1855 में से

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अन्नस्वामी बृहस्पति ने प्रदान किया है. स्तोता एवं यजमान दोनों प्रकार के मनुष्य ध्यानमग्न होकर उस धन को भोगते हैं. (१०) योऽवरे वृजने विश्वथा विभुर्महामु रण्वः शवसा ववक्षिथ. स देवो देवान्प्रति पप्रथे पृथु विश्वेदु ता परिभूर्ब्रह्मणस्पतिः.. (११) सब प्रकार व्याप्त एवं स्तुतियोग्य बृहस्पति अति बलवान् एवं निर्बल दोनों प्रकार के स्तोताओं की रक्षा अपनी शक्ति से करते हैं. वे समस्त देवों के प्रतिनिधि रूप में परम प्रसिद्ध हैं एवं सबके स्वामी हैं. (११) विश्वं सत्यं मघवाना युवोरिदापश्न प्र मिनन्ति व्रतं वाम्. अच्छेन्द्राब्रह्मणस्पती हविर्नोऽन्नं युजेव वाजिना जिगातम्.. (१२) हे धनस्वामी इंद्र एवं बृहस्पति! तुम्हारी सभी स्तुतियां सत्य हैं. तुम्हारे व्रत को जल नष्ट नहीं कर सकता, रथ में जुते हुए घोड़े जिस प्रकार घास की ओर दौड़ते हैं, उसी प्रकार तुम हमारे हवि के सम्मुख आओ. (१२) उताशिष्ठा अनु शृण्वन्ति वह्नयः सभेयो विप्रो भरते मती धना. वीळुद्वेषा अनु वश ऋणमाददिः स ह वाजी समिथे ब्रह्मणस्पतिः.. (१३) ब्रह्मणस्पति के शीघ्रगामी घोड़े हमारे स्तोत्र को सुनते हैं. सभ्य एवं बुद्धिमान् अध्वर्यु सुंदर स्तोत्रों द्वारा हव्य प्रदान करते हैं. वह प्रबल राक्षसों से द्वेष करने वाले, अपनी इच्छा से ऋण स्वीकार करने एवं अन्न के स्वामी हैं. वे युद्ध में हमारा हव्य स्वीकार करें. (१३) ब्रह्मणस्पतेरभवद्यथावशं सत्यो मन्युर्महि कर्मा करिष्यतः. यो गा उदाजत्स दिवे वि चाभजन्महीव रीतिः शवसासरात्पृथक्.. (१४) महान् कर्म करने वाले ब्रह्मणस्पति का मंत्र उनकी इच्छा के अनुसार सत्य होता है. उन्होंने गायों को बाहर करके आकाश का विभाग किया है. जिस प्रकार नदियों का जल विभिन्न धाराओं में नीचे की ओर बहता है, उसी प्रकार गाएं अपनी शक्ति के अनुसार विभिन्न देवों के घर गईं. (१४) ब्रह्मणस्पते सुयमस्य विश्वहा रायः स्याम रथ्यो३ वयस्वतः. वीरेषु वीराँ उप पृङ्धि नस्त्वं यदीशानो ब्रह्मणा वेषि मे हवम्.. (१५) हे ब्रह्मणस्पति! हम ऐसे धन के स्वामी बनें जो सदा नियंत्रित एवं अन्नयुक्त हो. तुम सबके ईश्वर हो, इसलिए हमारे वीर पुत्रों को पौत्रयुक्त करो. तुम हवि एवं अन्न के साथ-साथ हमारी स्तुति को जानो. (१५) ब्रह्मणस्पते त्वमस्य यन्ता सूक्तस्य बोधि तनयं च जिन्व. ebook converter DEMO Watermarks*