ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Rigveda Samhita with Hindi Translation
डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा
स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)
पृष्ठ 537, कुल 1855 में से
संदर्भ में पढ़ेंतस्मा इद्विश्वे धुनयन्त सिन्धवोऽच्छिद्रा शर्म दधिरे पुरूणि. देवानां सुप्रे सुभगः स एधते यंयं युजं कृणुते ब्रह्मणस्पतिः.. (५) उसी की ओर सभी नदियां बहती हैं, वह अविच्छिन्न रूप से समस्त सुख प्राप्त करता है एवं सौभाग्यशाली देवों द्वारा प्रदत्त सुख पाकर बढ़ता है. जिसे ब्रह्मणस्पति मित्र कहकर स्वीकार कर लेते हैं. (५) सूक्त—२६ देवता—ब्रह्मणस्पति ऋजुरिच्छंसो वनवद्वनुष्यतो देवयन्निददेवयन्तमभ्यसत्. सुप्रावीरिद्वनवत्पृत्सु दुष्टरं यज्छेदयज्योर्वि भजाति भोजनम्.. (१) ब्रह्मणस्पति का सरल चित्त स्तोता के शत्रुओं का विनाश करे. देवों का वह भक्त देवविरोधियों को पराजित करे. ब्रह्मणस्पति को तृप्त करने वाला याज्ञिक युद्ध में अदमनीय शत्रुओं का नाश करके यज्ञविरोधियों के धन का उपभोग करे. (१) यजस्व वीर प्र विहि मनायतो भद्रं मनः कृणुष्व वृत्रतूर्ये. हविष्कृणुष्व सुभगो यथाससि ब्रह्मणस्पतेरव आ वृणीमहे.. (२) हे वीर! ब्रह्मणस्पति की स्तुति करो. अभिमानी शत्रुओं के प्रति युद्ध के लिए प्रस्थान करो एवं शत्रुनाशक संग्राम में अपना मन दृढ़ करो. ब्रह्मणस्पति के निमित्त हव्य तैयार करो. इससे तुम्हें सौभाग्य मिलेगा. हम उनसे रक्षा की याचना करते हैं. (२) स इज्जनेन स विशा स जन्मना स पुत्रैर्वाजं भरते धना नृभिः. देवानां यः पितरमाविवासति श्रद्धामना हविषा ब्रह्मणस्पतिम्.. (३) जो श्रद्धालु यजमान देवों के पालक ब्रह्मणस्पति की सेवा हव्य द्वारा करता है, वह अपने आत्मीयजनों, पुत्रों एवं परिचारकों सहित अन्न और धन प्राप्त करता है. (३) यो अस्मै इव्यैर्घृतवद्भिर्विधत्प्र तं प्राचा नयति ब्रह्मणस्पतिः. उरुष्यतीमंहसो रक्षती रिषोंऽहोश्चिदस्मा उरुचक्रिरद्भुतः.. (४) जो यजमान घृतयुक्त हव्यों से ब्रह्मणस्पति की सेवा करता है, उसे वे प्राचीन सरल मार्ग से ले जाते हैं, पाप, शत्रुओं तथा दरिद्रता से रक्षा करते हैं और अद्भुत उपकार करते हैं. (४) सूक्त—२७ देवता—आदित्यगण इमा गिर आदित्येभ्यो घृतस्नूः सनाद्राजभ्यो जुह्वा जुहोमि. शृणोतु मित्रो अर्यमा भगो नस्तुविजातो वरुणो दक्षो अंशः.. (१) ebook converter DEMO Watermarks*