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श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani

स्वामी रामसुखदास द्वारा

स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)

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प्राप्त कर सकता है; युद्ध-जैसी घोर परिस्थितिमें भी अपना कल्याण कर सकता है—इस प्रकार व्यवहारमात्रमें परमार्थकी कला गीतामें सिखायी गयी है। अतः इसके जोड़ेका दूसरा कोई ग्रन्थ देखनेमें नहीं आता।

गीता एक प्रासादिक ग्रन्थ है। इसका आश्रय लेकर पाठ करनेमात्रसे बड़े विचित्र, अलौकिक और शान्तिदायक भाव स्फुरित होते हैं। इसका मन लगाकर पाठ करनेमात्रसे बड़ी शान्ति मिलती है। इसकी एक विधि यह है कि पहले गीताके पूरे श्लोक अर्थसहित कण्ठस्थ कर लिये जायें, फिर एकान्तमें बैठकर गीताके अन्तिम श्लोक ‘यत्र

गीताका खास लक्ष्य

गीता किसी वादको लेकर नहीं चली है अर्थात् द्वैत, अद्वैत, विशिष्टाद्वैत, द्वैताद्वैत, विशुद्धाद्वैत, अचिन्त्यभेदाभेद आदि किसी भी वादको, किसी एक सम्प्रदायके किसी एक सिद्धान्तको लेकर नहीं चली है। गीताका मुख्य लक्ष्य यह है कि मनुष्य किसी भी वाद, मत, सिद्धान्तको माननेवाला क्यों न हो, उसका प्रत्येक परिस्थितिमें कल्याण हो जाय, वह किसी भी परिस्थितिमें परमात्मप्राप्तिसे वंचित न रहे; क्योंकि जीवमात्रका मनुष्ययोनियें जन्म केवल अपने कल्याणके लिये ही हुआ है। संसारमें ऐसी कोई भी परिस्थिति नहीं है, जिसमें मनुष्यका कल्याण न हो सकता हो। कारण कि परमात्मतत्त्व प्रत्येक परिस्थितिमें समानरूपसे विद्यमान है। अतः साधकके सामने कोई भी और कैसी भी परिस्थिति आये, उसका केवल सदुपयोग करना है। सदुपयोग करनेका अर्थ है—दुःखदायी परिस्थिति आनेपर सुखकी इच्छाका त्याग करना; और सुखदायी परिस्थिति आनेपर सुखभोगका तथा ‘वह बनी रहे’ ऐसी इच्छाका त्याग करना और उसको दूसरोंकी सेवामें लगाना। इस प्रकार सदुपयोग करनेसे मनुष्य दुःखदायी और सुखदायी—दोनों परिस्थितियोंसे ऊँचा उठ जाता है अर्थात् उसका कल्याण हो जाता है।

सुष्टिसे पूर्व परमात्मामें ‘मैं एक ही अनेक रूपोंमें हो जाऊँ’ ऐसा संकल्प हुआ। इस संकल्पसे एक ही परमात्मा प्रेमवृद्धिकी लीलाके लिये, प्रेमका आदान-प्रदान करनेके लिये स्वयं ही श्रीकृष्ण और श्रीजी (श्रीराधा)—इन दो

गीताका योग

गीतामें ‘योग’ शब्दके बड़े विचित्र-विचित्र अर्थ हैं। उनके हम तीन विभाग कर सकते हैं—(१) ‘युजिर् योगे’ धातुसे बना ‘योग’ शब्द, जिसका अर्थ है—समरूप परमात्माके साथ

योगेश्वरः कृष्णः.....’—यहाँसे लेकर गीताके पहले श्लोक ‘धर्मक्षेत्रे कुरुक्षेत्रे.....’—यहाँतक बिना पुस्तकके उलटा पाठ किया जाय तो बड़ी शान्ति मिलती है। यदि प्रतिदिन पूरी गीताका एक या अनेक बार पाठ किया जाय तो इससे गीताके विशेष अर्थ स्फुरित होते हैं। मनमें कोई शंका होती है तो पाठ करते-करते उसका समाधान हो जाता है।

वास्तवमें इस ग्रन्थकी महिमाका वर्णन करनेमें कोई भी समर्थ नहीं है। अनन्तमहिमाशाली ग्रन्थकी महिमाका वर्णन कर ही कौन सकता है ?

रूपोंमें प्रकट हो गये। उन दोनोंपर स्पष्ट लीला करनेके लिये एक खेल रचा। उस खेलके लिये प्रभुके संकल्पसे अनन्त जीवोंकी (जो कि अनादिकालसे थे) और खेलके पदार्थों—(शरीरादि—) की सृष्टि हुई। खेल तभी होता है, जब दोनों तरफके खिलाड़ी स्वतन्त्र हों। इसलिये भगवान्ने जीवोंको स्वतन्त्रता प्रदान की। उस खेलमें श्रीजीका तो केवल भगवान्की तरफ ही आकर्षण रहा, खेलमें उनसे भूल नहीं हुई। अतः श्रीजी और भगवान्में प्रेमवृद्धिकी लीला हुई। परन्तु दूसरे जितने जीव थे, उन सबने भूलसे संयोगजन्य सुखके लिये खेलके पदार्थों—(उत्पत्ति-विनाशशील प्रकृतिजन्य पदार्थों—)के साथ अपना सम्बन्ध मान लिया, जिससे वे जन्म-मरणके चक्करमें पड़ गये।

खेलके पदार्थ केवल खेलके लिये ही होते हैं, किसीके व्यक्तिगत नहीं होते। परन्तु वे जीव खेल खेलना तो भूल गये और मिली हुई स्वतन्त्रताका दुरुपयोग करके खेलके पदार्थोंको अर्थात् शरीरादिको व्यक्तिगत मानने लग गये। इसलिये वे उन पदार्थोंमें फँस गये और भगवान्से सर्वथा विमुख हो गये। अब अगर वे जीव शरीरादि उत्पत्ति-विनाशशील पदार्थोंसे विमुख होकर भगवान्के सम्मुख हो जायें, तो वे जन्म-मरणरूप महान् दुःखसे सदाके लिये छूट जायें। अतः जीव संसारसे विमुख होकर भगवान्के सम्मुख हो जायें और भगवान्के साथ अपने नित्ययोग—(नित्य सम्बन्ध—)को पहचान लें—इसीके लिये भगवद्गीताका अवतार हुआ है।

नित्यसम्बन्ध; जैसे—‘समत्वं योग उच्यते’ (२।४८) आदि। यही अर्थ गीतामें मुख्यतासे आया है।

(२) ‘युज् समाधी’ धातुसे बना ‘योग’ शब्द, जिसका अर्थ है—चित्तकी स्थिरता अर्थात् समाधिमें