भारतकोश
श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani

स्वामी रामसुखदास द्वारा

स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)

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स्थिति; जैसे—'यत्रोपरमते चित्तं निरुद्धं योगसेवया' (६।२०) आदि।

(३) 'युजु संयमने' धातुसे बना 'योग' शब्द, जिसका अर्थ है—संयमन, सामर्थ्य, प्रभाव; जैसे—'पश्य मे योगमेश्वरम्' (९।५) आदि।

गीतामें जहाँ कहीं 'योग' शब्द आया है, उसमें उपर्युक्त तीनोंमेंसे एक अर्थकी मुख्यता और शेष दो अर्थोंकी गौणता है; जैसे—'युजिर् योगे' वाले 'योग' शब्दमें समता-(सम्बन्ध-) की मुख्यता है, पर समता आनेपर स्थिरता और सामर्थ्य१ भी स्वतः आ जाती है। 'युजु समाधी' वाले 'योग' शब्दमें स्थिरताकी मुख्यता है, पर स्थिरता आनेपर समता और सामर्थ्य भी स्वतः आ जाती है। 'युजु संयमने' वाले 'योग' शब्दमें सामर्थ्यकी मुख्यता है, पर सामर्थ्य आनेपर समता और स्थिरता भी स्वतः आ जाती है। अतः गीताका 'योग' शब्द बड़ा व्यापक और गम्भीरार्थक है।

पातंजलयोगदर्शनमें चित्तवृत्तियोंके निरोधको 'योग' नामसे कहा गया है—'योगश्चित्तवृत्तिनिरोधः' (१।२) और उस योगका परिणाम बताया है—द्रष्टाकी स्वरूपमें स्थिति हो जाना—'तदा द्रष्टुः स्वरूपेऽवस्थानम्' (१।३)। इस प्रकार पातंजलयोगदर्शनमें योगका जो परिणाम बताया गया है, उसीको गीतामें 'योग' नामसे कहा गया है (दूसरे अध्यायका अड़तालीसवाँ और छठे अध्यायका तेईसवाँ श्लोक)। तात्पर्य है कि गीता चित्तवृत्तियोंसे सर्वथा सम्बन्ध-विच्छेदपूर्वक स्वतःसिद्ध सम-स्वरूपमें स्वाभाविक स्थितिको योग कहती है। उस समतामें स्थिति (नित्ययोग) होनेपर फिर कभी उससे वियोग नहीं होता, कभी वृत्तिरूपता नहीं होती, कभी व्युत्थान नहीं होता। वृत्तियोंका निरोध होनेपर तो 'निर्विकल्प अवस्था' होती है, पर समतामें स्थिति होनेपर 'निर्विकल्प बोध' होता है। 'निर्विकल्प बोध'

१-भगवान्में संसारमात्रकी उत्पत्ति, स्थिति, प्रलय आदिकी जो सामर्थ्य है, वह सामर्थ्य योगीमें नहीं आती—'जगदव्यापारवर्जम्' (ब्रह्मसूत्र ४।४।१७)। योगीमें जो सामर्थ्य आती है, उससे वह संसारमात्रपर विजय प्राप्त कर लेता है (गीता ५।१९) अर्थात् कैसी ही अनुकूल-प्रतिकूल परिस्थिति आनेपर भी उसपर कोई असर नहीं पड़ता।

२-श्रीमद्भागवतमें भगवान्को कहा है—

योगास्त्रयो मया प्रोक्ता नृणां श्रेयोविधितस्या। ज्ञानं कर्म च भक्तिश्च नोपायोऽन्योऽस्तु कुत्रचित् ॥ (११।२०।६)

'अपना कल्याण चाहनेवाले मनुष्योंके लिये मैंने तीन योग-मार्ग बताये हैं—ज्ञानयोग, कर्मयोग और भक्तियोग। इन तीनोंके सिवा दूसरा कोई कल्याणका मार्ग नहीं है।'

यही बात अध्यात्मरामायण और देवीभागवतमें भी आयी है—

(क) मार्गस्त्रयो मया प्रोक्ताः पुरा मोक्षापित्साधकाः। कर्मयोगो ज्ञानयोगो भक्तियोगश्च शाश्वतः ॥ (अध्यात्म ७।७।५९)

(ख) मार्गस्त्रयो मे विख्याता मोक्षप्राप्ती नगाधिप। कर्मयोगो ज्ञानयोगो भक्तियोगश्च सत्तम ॥ (देवी ७।३७।३)

अवस्थातीत और सम्पूर्ण अवस्थाओंका प्रकाशक है।

समता अर्थात् नित्ययोगका अनुभव करानेके लिये गीतामें तीन योग-मार्गोंका वर्णन किया गया है—कर्मयोग, ज्ञानयोग और भक्तियोग। स्थूल, सूक्ष्म और कारण—इन तीनों शरीरोंका संसारके साथ अभिन्ना सम्बन्ध है। अतः इन तीनोंको दूसरोंकी सेवामें लगा दे—यह कर्मयोग हुआ; स्वयं इनसे असंग होकर अपने स्वरूपमें स्थित हो जाय—यह ज्ञानयोग हुआ; और स्वयं भगवान्के समर्पित हो जाय—यह भक्तियोग हुआ। इन तीनों योगोंको सिद्ध करनेके लिये अर्थात् अपना उद्धार करनेके लिये मनुष्यको तीन शक्तियाँ प्राप्त हैं—(१) करनेकी शक्ति (बल), (२) जाननेकी शक्ति (ज्ञान) और (३) माननेकी शक्ति (विश्वास)। करनेकी शक्ति निःस्वार्थभावसे संसारकी सेवा करनेके लिये है, जो कर्मयोग है; जाननेकी शक्ति अपने स्वरूपको जाननेके लिये है, जो ज्ञानयोग है और माननेकी शक्ति भगवान्को अपना तथा अपनेको भगवान्का मानकर सर्वथा भगवान्के समर्पित होनेके लिये है, जो भक्तियोग है। जिसमें करनेकी रुचि अधिक है, वह कर्मयोगका अधिकारी है। जिसमें अपने-आपको जाननेकी जिज्ञासा अधिक है, वह ज्ञानयोगका अधिकारी है। जिसका भगवान्पर श्रद्धा-विश्वास अधिक है, वह भक्तियोगका अधिकारी है। ये तीनों ही योग-मार्ग परमात्मप्राप्तिके स्वतन्त्र साधन हैं। अन्य सभी साधन इन तीनोंके ही अन्तर्गत आ जाते हैं१।

सभी साधनोंका खास काम है—जड़तासे सम्बन्ध-विच्छेद करना। अतः जड़तासे सम्बन्ध-विच्छेद करनेकी प्रणालियों-(साधनों- ) में तो फरक रहता है, पर जड़तासे सम्बन्ध-विच्छेद होनेपर सभी साधन एक हो जाते हैं अर्थात् अन्तमें सभी साधनोंसे एक ही समरूप परमात्मतत्त्वकी प्राप्ति होती है। इस समरूप परमात्मतत्त्वकी