सामवेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Samaveda Samhita with Hindi Translation
डा. रेखा व्यास द्वारा
स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)
पृष्ठ 288, कुल 310 में से
संदर्भ में पढ़ेंहे अश्विनीकुमारो! आप सोने के रथ वाले, शत्रुनाशी, धनधारी, धनधान्य वाले व यज्ञ प्रेमी हैं. आप हमारे यज्ञ में पधारिए और प्रतिष्ठित होइए. आप हमारी प्रार्थनाओं को सुनने की कृपा कीजिए. (९) चौथा खंड अबोध्यग्निः समिधा जनानां प्रति धेनुमिवायतीमुषासम्. यह्वा इव प्र वयामुज्जिहानाः प्र भानवः सस्रते नाकमच्छ.. (१) हे अग्नि! आप लोगों (यजमानों) की समिधा से प्रदीप्त होते हैं. नींद से उठ कर गौएं जैसे जाग्रत होती हैं, वैसे ही आप जाग्रत हैं. पेड़ों की शाखाएं जैसे आकाश की ओर फैलती हैं, वैसे ही आप की लपटें स्वर्ग की ओर फैलती हैं. (१) अबोधि होता यजथाय देवानूर्ध्वो अग्निः सुमनाः प्रातरस्थात्. समिद्धस्य रुशददर्शि पाजो महान् देवस्तमसो निरमोचि.. (२) हे अग्नि! आप यज्ञ के प्रबल आधार हैं. देवों के लिए (हवि पहुंचाने हेतु) आप को प्रज्वलित किया जाता है. आप ऊर्ध्वगामी हैं व सुबह अच्छे मन से ऊपर की ओर जाते हैं. आप महान हैं. आप को हम प्रत्यक्ष देख सकते हैं. आप देवताओं व संसार को अंधकार से दूर करते हैं. (२) यदीं गणस्य रशनामजीगः शुचिरङ्क्ते शुचिभिर्गोभिरग्निः. आदक्षिणा युज्यते वाजयंत्युत्तानामूर्ध्वो अधयज्जुहूभिः.. (३) हे अग्नि! आप बाधाएं व अंधेरे को दूर करते हैं. आप संसार को प्रकाशमान व यजमान घी की आहुतियों से बलवान बनाते हैं. आप ऊर्ध्वगामी हो कर उस घी वाली आहुतियों को स्वीकारते हैं. (३) इद ॐ श्रेष्ठं ज्योतिषां ज्योतिरागाच्चित्रः प्रकेतो अजनिष्ट विश्वा. यथा प्रसूता सवितुः सवायैवा रात्र्युषसे योनिमारैक्.. (४) हे उषा! आप सभी ज्योतियों से श्रेष्ठ ज्योति वाली हैं. आप की ज्योति सर्वत्र फैलती है. सभी वस्तुओं को ज्योतिर्मय बना देती हैं. सविता के अस्त होने के बाद रात्रि उषा को उत्पन्न होने के लिए जगह देती हैं. (४) रुशद्वत्सा रुशती श्वेत्यागादारैगु कृष्णा सदनान्यस्याः. समानबन्धू अमृते अनूची द्यावा वर्णं चरत आमिनाने.. (५) हे उषा! आप सूर्य का चमकीला स्वरूप ले कर पैदा हुई और रात्रि काले रंग का. सूर्य दोनों के समान रूप से बंधु हैं, दोनों अमर हैं. स्वर्गलोक में एक के बाद एक आतीजाती हैं. दोनों एकदूसरे का प्रभाव समाप्त करती हैं. (५) ebook converter DEMO Watermarks*