भारतकोश
सामवेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

सामवेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Samaveda Samhita with Hindi Translation

डा. रेखा व्यास द्वारा

स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished310 पृष्ठ

पृष्ठ 3, कुल 310 में से

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अपनी बात आमतौर पर सामवेद को ऋग्वेद के मंत्रों का संग्रह माना जाता है. छांदोग्य उपनिषद् में कहा भी गया है—'या ऋक् तत् साम' अर्थात् जो ऋक् है, वह साम है. इस का यह अर्थ कदापि नहीं है कि सामवेद में समस्त छंद ऋग्वेद से ही लिए गए हैं. सामवेद की अनेक ऋचाएं ऋग्वेद से भिन्न हैं. कुछ स्थलों पर सामवेद की ऋचाओं में ऋग्वेद की ऋचाओं से आंशिक साम्य दिखाई देता है. इसे पाठभेद के रूप में भी स्वीकार नहीं किया जा सकता है. यदि यह पाठभेद होता तो ऋचाएं उसी रूप और क्रम में ली गई होतीं, जिस रूप और क्रम में वे ऋग्वेद में ली गई हैं. दूसरी बात यह है कि यदि ऋग्वेद से केवल गायन के लिए ऋचाओं का सामवेद के रूप में संग्रह किया गया होता तो केवल गेय मंत्रों का ही संग्रह होना चाहिए था, जबकि उपलब्ध सामवेद में लगभग ४५० मंत्र पूरी तरह गेय नहीं हैं. तीसरी बात यह है कि अगर सामवेद के मंत्र ऋग्वेद से उद्धृत माने जाएं, तो उन के रूप और स्वर निर्देश ऋग्वेद से भिन्न हैं. ऋग्वेदीय मंत्रों में उदात्त, अनुदात्त और स्वरित स्वर पाए जाते हैं, जबकि सामवेदीय मंत्रों में सप्त स्वर विधान है. इन दृष्टिकोणों से देखने पर स्पष्ट प्रतीत होता है कि सामवेद के मंत्र ऋग्वेद से ऋण स्वरूप नहीं लिए गए हैं. उन की अपनी स्वतंत्र सत्ता है. वे उतने ही स्वतंत्र हैं, जितने ऋग्वेद के मंत्र. हां, एक बात अवश्य है कि ऋग्वेद और सामवेद के मंत्रों में वर्ण्य विषयगत अंतःसंबंध है. ऋग्वेद के समान सामवेद में भी अग्नि, इंद्र, सोम, अश्विनीकुमारों आदि की स्तुति की गई है. इसी माध्यम से उन का स्वरूप निर्धारित करने का प्रयास किया गया है. ऋग्वेद के समान सामवेद से भी तत्कालीन उन्नत समाज का पता चलता है. चूंकि सामवेद ऋग्वेद के बाद की रचना है, इसलिए उक्त संदर्भ में सामवेद का अध्ययन रोचक ही नहीं, ज्ञानवर्द्धक भी हो सकता है. इतना ही नहीं, सामवेद का अध्ययन ऋग्वेद काल के पश्चात विकसित लोककला और संस्कृति को भी रेखांकित करता है. इस प्रकार सामवेद को ऋग्वेद का पूरक कहा जा सकता है. इस की महत्ता ऋग्वेद से किसी भी रूप में कम नहीं मानी जा सकती है. इसीलिए यह वेदत्रयी (ऋक्, यजु और सामवेद) में गिना जाता है. गीता में उपदेशक कृष्ण ने ‘वेदानां सामवेदो ऽ स्मि’ कह कर सामवेद की विशिष्टता की ओर ही संकेत किया है. ebook converter DEMO Watermarks*