साम्ब पुराण (श्री एस. एन. खण्डेलवाल हिन्दी व्याख्या सहित)
Samba Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास (व्याख्याकार: श्री एस. एन. खण्डेलवाल) द्वारा
स्रोत: Sri Samba Purana with Hindi Commentary by Sri S. N. Khandelwal (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें३६ श्रीसाम्बपुराणम्
सहस्रशीर्षा पुरुषः प्राङ्मया य उदाहृतः।
तेजसस्तस्य गोलस्य स तु मध्ये व्यवस्थितः॥३६॥
पहले जिन सहस्रशीर्षा पुरुष की कथा इस ग्रन्थ में कही गयी है, इस तेजोमय गोला के मध्य में वे स्थित हैं॥३६॥
आदित्यः स तपत्येष वियन्नापो गभस्तिभिः।
सहस्रपादस्त्वेषोऽग्निर्वृत्तकुम्भनिभः स्मृतः॥३७॥
आदत्ते स तु रश्मीनां सहस्रेण समन्ततः।
आपो नदीसमुद्रेभ्यो हृदकूपेभ्य एव च॥३८॥
प्रभा सौरी तु पादेन ह्यस्तं याति दिवाकरे।
अग्निमाविशते रात्रौ तस्माद् दूरात् प्रकाशते॥३९॥
वह आदित्य अपनी किरणों से द्युलोक तथा जलाशयों को ताप प्रदान करते हैं। वे वृत्ताकार कुम्भतुल्य सहस्रपाद युक्त अग्नि कहे जाते हैं। ये चारो ओर हजारों-हजारों रश्मियों द्वारा नदी, समुद्र, हृद तथा कूप से जल का आहरण करते हैं।
दिवाकर का सूर्यास्त होने पर रात्रि में सूर्य की प्रभा का एक पाद अग्नि में प्रवेश करता है, तब दूर से सूर्यप्रभा प्रकाशित होती है॥३७-३९॥
उदिते च पुनः सूर्यो चौष्ण्यमाग्नेयमाविशत्।
पादेन तेजसश्चाग्नेस्तथा तत्तपते दिवा॥४०॥
प्रकाशं च तथौष्ण्यञ्च सौर्याग्नेये च तेजसि।
परस्परानुप्रवेशादाप्यायेते दिवानिशम्॥४१॥
सूर्य के पुनः उदित होने पर उसमें अग्नि की उष्णता प्रवेश करती है। ऐसे ही अग्नि का तेज एक पाद से दिन में ताप देता है। सूर्य तथा अग्नि के दो तेज हैं—प्रकाशक धर्म तथा उष्णत्व अर्थात् सूर्य का तेज है—प्रकाशक धर्म तथा अग्नि का तेज है—उष्णत्व धर्म। ये परस्पर अनुप्रवेश द्वारा दिवा-रात्रि को प्रकाशित करते हैं॥४०-४१॥
नारद उवाच
व्यापकत्वं च रश्मीनां नामानि च निबोध मे।
हेतयः किरणा गावो रश्मयोऽथ गभस्तयः॥४२॥
अभीषवो वनान्युस्रा घृणयोऽथ मरीचयः।
नाड्यो दीधितयः साध्या मयूखा भानवोंऽशवः॥४३॥
सप्तर्षयः सुपर्णांश्च कराः पादास्तथैव च।
एवं नाम्ना तु पर्यायाः रश्मीनां विंशतिः स्मृता॥४४॥