भारतकोश
साम्ब पुराण (श्री एस. एन. खण्डेलवाल हिन्दी व्याख्या सहित)

साम्ब पुराण (श्री एस. एन. खण्डेलवाल हिन्दी व्याख्या सहित)

Samba Purana Hindi

महर्षि वेदव्यास (व्याख्याकार: श्री एस. एन. खण्डेलवाल) द्वारा

स्रोत: Sri Samba Purana with Hindi Commentary by Sri S. N. Khandelwal (उद्गम)

DevanagariHindipublished424 पृष्ठ

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४६ श्रीसाम्बपुराणम्

कहते हैं। अदिति के पुत्र इस अर्थ में अपत्यार्थ ‘ण्य’ प्रत्यय के योग से इनका नाम आदित्य कहा गया है॥१५-१७॥

स्रवन्ति स्यन्दनार्थे च धातुरेषा निपात्यते।
स्रवणात्तेजसोऽब्द्वा च तेनासौ सविता स्मृतः॥१८॥
शश्वच्च जायते यस्माच्छश्वत् संतिष्ठते यतः।
तस्मात् सर्वैः स्मृतः सूर्यो निगमज्ञैर्मनीषिभिः॥१९॥

प्रसव करना तथा क्षरित होना अर्थ में (सू) धातु निपातन से एवं साक्षात् तेज के क्षरणार्थ इन्हें सविता कहते हैं। जिससे निरन्तर प्राणिगण उत्पन्न होते हैं और जिनके कारण जीवगण अवस्थान करते हैं; अतः सभी वेदज्ञों ने इन्हें सूर्य कहा है॥१८-१९॥

नुदिति प्रेरणे धातुर्भादीप्तौ चैव कीर्त्तितः।
नोदनात् कारणादासां भानुरित्यभिधीयते॥२०॥

‘नु’ शब्द के प्रेरण एवं ‘भा’ धातु के ‘दीप्ति पाना’ अर्थ से, रश्मिसमूह का प्रेरण तथा दीप्ति प्राप्त करने के कारण इन्हें भानु कहा गया है॥२०॥

चित्रा हि भानवो यस्य वर्णैः शुक्लादिभिर्यतः।
भानवो रश्मयः प्रोक्ताश्चित्रभानुस्ततः स्मृतः॥२१॥
भास्वतस्तु करा ह्यस्य भासोऽत्यर्थं करोति च।
भासृ दीप्तौ स्मृतो धातुर्भास्करस्तेन स स्मृतः॥२२॥

चित्र अर्थात् जिनकी शुक्लादि अनेक वर्ण की रश्मियाँ हैं, (यहाँ भानु शब्द से रश्मि का तात्पर्य है) इसलिये उन्हें चित्रभानु कहते हैं। जिनके किरणसमूह उज्ज्वल हैं, जो अत्यन्त दीप्ति प्रदान करते हैं। ‘भा’ धातु का दीप्ति अर्थ है; अतः इन्हें भास्कर शब्द से कहा जाता॥२१-२२॥

भा दीप्तावित्ययं धातुश्चोपसर्गेण योजितः।
भास्करोति प्रकर्षेण यस्मात्तस्मात् प्रभाकरः॥२३॥
दिवेति चाव्ययं लिङ्गं पठ्यते सूरिभिः सदा।
दिवा करोति यस्माच्च तस्मादेव दिवाकरः॥२४॥

‘भा’ धातु दीप्ति अर्थ में उपसर्ग के साथ युक्त है। प्रकर्षरूपेण जो दीप्ति दान करते हैं, अतः सूर्य का नाम प्रभाकर नाम है। दिवा शब्द को पण्डितगण अव्यय लिङ्ग में कहते हैं; क्योंकि दिन करते हैं, इसलिये वे दिवाकर हैं॥२३-२४॥

अवति त्रीनिमांल्लोकान् यस्मादेष परिभ्रमन्।
अवेति रक्षणे धातुरवनात् सविता स्मृतः॥२५॥