साम्ब पुराण (श्री एस. एन. खण्डेलवाल हिन्दी व्याख्या सहित)
Samba Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास (व्याख्याकार: श्री एस. एन. खण्डेलवाल) द्वारा
स्रोत: Sri Samba Purana with Hindi Commentary by Sri S. N. Khandelwal (उद्गम)
पृष्ठ 60, कुल 424 में से
संदर्भ में पढ़ें५० श्रीसाम्बपुराणम्
एको भूत्वा महामेघः पृथक्त्वेनावतिष्ठते।
वर्णतो रूपतश्चैव यथा गुणवशानुगः॥४८॥
जैसे महामेघ एक होने पर भी गुणवशात् वर्ण तथा रूपभेद से पृथक्-पृथक् रूप से अवस्थित रहता है, वैसे ही एक स्वयम्भु सूर्य गुणवशतः पृथक्-पृथक् रूप से प्रतीत होते हैं॥४८॥
नभसः पतितः तोयं याति तोयान्तरं यथा।
भूमे रसविशेषेण तथा गुणवशात्तु सः॥४९॥
जैसे आकाश से पतित जल भूमि तथा विशेष रस के साथ युक्त होकर अन्न-जलरूप में प्रतीत होता है, वैसे ही वे गुणवशात् पृथक् रूप में प्रतीत होते हैं॥४९॥
यथा दिव्यविशेषाद्वा वायुरेकः पृथग् भवेत्।
दुर्गन्धो वा सुगन्धो वा तथा गुणवशात्तु सः॥५०॥
जैसे आकाश में अविशेष एक वायु दुर्गन्ध अथवा सुगन्धभेद से पृथक् होती है, वैसे ही गुणवशात् वह सूर्य पृथक् रूपेण प्रतिभात होता है॥५०॥
यथा वा गार्हपत्योऽग्निरन्यत्संज्ञान्तरं व्रजेत्।
दक्षिणााहवनीयादि ब्रह्मादिषु तथा ह्यसौ॥५१॥
जैसे एक गार्हपत्य अग्नि दक्षिण, आहवानीयादि भेद से पृथक् संज्ञायुक्त हो जाती है, वैसे ही एक सूर्य ब्रह्मादि विविध नाम से अभिहित होते हैं॥५१॥
एकत्वे च पृथक्त्वे च प्रोक्तमेतन्निदर्शनम्।
तस्माद्भक्तिः परा कार्या देवे ह्यस्मिन् दिवाकरे॥५२॥
एकत्व तथा पृथक्त्व का यही कारण है। अतएव दिवाकर की परम भक्ति करना ही उचित है॥५२॥
एष ब्रह्मा च विष्णुश्च एष एव महेश्वरः।
एष वेदाश्च यज्ञाश्च स्वर्गश्चैव न संशयः॥५३॥
ये ही ब्रह्मा, विष्णु तथा महेश्वर हैं। ये ही समस्त वेद, यज्ञ तथा स्वर्गलोक हैं, इसमें कोई संदेह नहीं है॥५३॥
सूर्यव्याप्तमिदं विश्वं जगत् स्थावरजङ्गमम्।
अद्यते पीयते चैव अन्नपानात्मको रविः॥५४॥
स्थावर-जङ्गमात्मक यह समस्त विश्व सूर्य से ही व्याप्त है। ये ही भक्षित तथा पीत होते हैं। अन्नपानात्मक रवि यही हैं॥५४॥