संक्षिप्त योगवासिष्ठ
Sankshipt Yoga Vasistha
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें९४ * अविच्छिन्नचिदात्मकः पुमानस्तीह नेतरत् * [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ
अवलोकनमें दीपकके प्रकाशमात्रके अतिरिक्त उसके पात्र, तेल और बत्ती आदि किसीका भी उपयोग नहीं होता। केवल एकदेशके सादृश्यं, उपमान उपमेयका ज्ञान करा देता है। जैसे 'मणिदीप इव' इस दृष्टान्तमें उपमान दीपक केवल प्रकाशसे उपमेय मणिका बोधक होता है। दृष्टान्तके अंशमात्रसे ज्ञेय तत्त्वका ज्ञान हो जानेपर 'तत्त्वमसि' आदि महावाक्योंके अर्थका निश्चय उपादेयरूपसे ग्रहण करना चाहिये। कुतार्किकताका आश्रय लेकर अनुभवविरुद्ध अपवित्र विकल्पोंद्वारा प्रबुद्धताका नाश नहीं करना चाहिये।
श्रीराम ! दृष्टान्तके द्वारा अद्वितीय आत्मज्ञानस्वरूप शास्त्रार्थके ज्ञानसे महावाक्यार्थभूत ब्रह्मस्वरूपसे सम्यक् प्रकारसे सिद्ध हुई शान्तिको ही निर्वाण कहा जाता है। इसलिये दृष्टान्त और दाष्ट्रान्तके विविध विकल्पोंके पचड़ेसे कोई प्रयोजन नहीं है। किंतु जिस किसी भी युक्तिसे महावाक्यार्थका भलीभाँति आश्रय लेना चाहिये। राघव ! तुम शान्तिको ही परम श्रेय जानो, अतः उसकी प्राप्तिके लिये यत्नशील हो जाओ; क्योंकि शान्ति और शास्त्र-ज्ञानसे विभूषित विचारपरायण पुरुषको दृष्टान्त एवं शास्त्रोपदेश, सौजन्य, उत्तम बुद्धि और शास्त्रज्ञ पुरुषोंके समागमद्वारा यत्नका आश्रय लेकर उत्तम परम पदको प्राप्त करना चाहिये। विद्वान् पुरुषको तबतक विचार करते रहना चाहिये, जबतक पुनः नष्ट न होनेवाली तुर्यपद नामक शान्तिमयी आत्मविश्रान्ति प्राप्त न हो जाय। जो पुरुष तुर्यपद नामक शान्तिसे युक्त होकर भवसागरसे पार हो गया है, वह गृहस्थ हो या संन्यासी, उसका जीने या न जीनेसे अथवा कर्म करने या न करनेसे कोई प्रयोजन नहीं रह जाता। जैसे सम्पूर्ण जलोंका अधिष्ठान समुद्र है, उसी तरह सारे प्रमाणोंकी सत्ताका प्रमाण एकमात्र प्रत्यक्ष ही है; अतः अब तुम उसके विषयमें श्रवण करो। श्रेष्ठ पुरुष सारी इन्द्रियोंके सारभूत ज्ञानको प्रत्यक्ष कहते हैं। जिस इन्द्रियके प्रति जो ज्ञान सिद्ध होता है, वही प्रत्यक्ष कहा जाता है। अनुभूति, वेदन और प्रतिपत्तिके नामानुसार इस शास्त्रमें उसीका प्रत्यक्ष नाम रखा गया है। वही हमलोगोंका जीव है, वही संवित् है, वही 'अहंता' की प्रतीतिका विषयभूत साक्षी पुरुष है। वह जब संवित्के सहयोगसे उदित होता है, तब उसे पदार्थ कहा जाता है। जैसे जल तरङ्ग आदिके रूपमें दृष्टिगोचर होता है, उसी प्रकार वह परमात्मा संकल्प-विकल्प आदि नाना प्रकारके भ्रमोंके कारण जगद्रूपसे प्रकाशित होता है। सृष्टिके पूर्व जो कारणरहित था, वही सृष्टिके आरम्भमें सृष्टिलीलावश स्वयं ही अपनेमें स्फुरित होकर प्रत्यक्ष कारण हुआ। जीवका अज्ञानजनित कारण यद्यपि असत् है, तथापि वह सत्-सा प्रतीत होता है। वही इस प्रकृतिमें जगद्रूपसे व्यक्त हुआ है। विचार तो स्वयं ही स्वकर्मा-नुसार प्राप्त हुए अपने शरीरका नाश करके शीघ्र ही महान् परम पदको प्रकट कर देता है । विचारवान् पुरुष जब परमात्माको प्राप्त कर लेता है, तब उसका विचार भी उसीमें विलीन हो जाता है, उस समय वर्णनातीत केवल परमात्मा ही अवशिष्ट रह जाता है।
इस प्रकार प्रपञ्चका अभाव हो जानेके कारण अपने बुद्धि, इन्द्रिय और कर्मोंद्वारा मनके इच्छारहित अतएव शान्त हो जानेपर उसका न तो कर्म करनेसे कोई प्रयोजन रहता है और न न करनेसे ही। फिर तो जैसे संचालकके द्वारा बिना चलाया हुआ यन्त्र काम नहीं देता, उसी तरह इच्छारहित मनके शान्त हो जानेपर कर्मेन्द्रियाँ कर्म आदिमें प्रवृत्त ही नहीं होतीं। बाह्य इन्द्रियोंद्वारा विषय-ग्रहण एवं मनद्वारा विषयानुसंधान-रूप पदार्थोंसे समाकुल यह जगत् विचारके अन्तर्गत विद्यमान है—ठीक उसी तरह, जैसे स्पन्दन वायुके भीतर ही होता है। शुद्ध सर्वात्मविषयक विचार जिस प्रकार कर्मानुसार भोगके लिये प्रकट होता है, तदनुरूप ही वह दिशा, काल तथा बाह्य एवं आन्तर पदार्थोंके