संक्षिप्त योगवासिष्ठ
Sankshipt Yoga Vasistha
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
पृष्ठ 136, कुल 750 में से
संदर्भ में पढ़ेंउत्पत्ति-प्रकरण ] * परमात्माके ज्ञानकी महिमा और उसके स्वरूपका विवेचन * १०३
परमात्माके ज्ञानकी महिमा, उसके स्वरूपका विवेचन, दृश्य-जगत्के अत्यन्ताभाव एवं ब्रह्मरूपताका निरूपण तथा आत्मज्ञानकी प्राप्तिके लिये योगवासिष्ठ ही सर्वोत्तम शास्त्र है—इसका प्रतिपादन
श्रीवसिष्ठजी कहते हैं—रघुनन्दन ! जिन परमात्म-देवकी चर्चा की गयी है, ये कहीं दूर नहीं रहते, सदा शरीरमें ही स्थित हैं और चिन्मय ( चेतन ) रूपसे विख्यात हैं। ये ही चिन्मय चन्द्रशेखर शिव हैं। ये ही चिन्मय गरुड़वाहन विष्णु हैं। ये ही चिन्मय सूर्य हैं तथा ये ही चिन्मय ब्रह्मा हैं। कार्य-कारणरूप इन परब्रह्म परमात्माका साक्षात्कार हो जानेपर इस साधन-परायणके हृदयकी गाँठ ( चिजडग्रन्थि ) खुल जाती है, सम्पूर्ण संशय छिन्न-भिन्न हो जाते हैं और सम्पूर्ण शुभाशुभ कर्म नष्ट हो जाते हैं।
श्रीराम ! जब परमात्माका ज्ञान हो जाता है, तब विषके वेगके शान्त होनेपर जैसे विषूचिका मिट जाती है, उसी प्रकार सम्पूर्ण दुःखोंकी परम्परा नष्ट हो जाती है।
श्रीरामजीने पूछा—ब्रह्मन् ! जिनका ज्ञान या साक्षात्कार होनेपर मन सम्पूर्ण मोह-महासागरके पार हो जायगा, उन परब्रह्म परमात्माका यथार्थ स्वरूप कैसा है ? इसका मेरे समक्ष वर्णन कीजिये ।
श्रीवसिष्ठजीने कहा—रघुनन्दन ! जिस ज्ञानरूपी महासागरमें नाश आदि विकारके बिना ही ज्यों-के-त्यों स्थित हुए इस संसारका अत्यन्त अभाव ही सिद्ध होता है, वही परमात्माका स्वरूप है। जो परम चिन्मय होनेके कारण अत्यन्त सूक्ष्म होकर भी अज्ञानी जनोंकी दृष्टिमें विशाल पाषाणकी भाँति स्थूलरूपसे स्थित प्रतीत होता है तथा अजड ( चिन्मय ) होता हुआ भी मूढ मनुष्योंके अन्तःकरणमें जडके तुल्य ही जान पड़ता है, वह परमात्माका स्वरूप है।
श्रीरामचन्द्रजीने पूछा—मुने ! परमात्मा सत् है, यह कैसे जाना जाता है ? तथा इतने बड़े इस जगत् नामक दृश्यको असत् कैसे समझा जाता है ? आप कहते हैं इसकी उत्पत्ति हुई ही नहीं, यह बिना हुए ही प्रतीत हो रहा है; यह बात कैसे समझमें आये ?
श्रीवसिष्ठजीने कहा—रघुनन्दन ! जैसे रूपहीन आकाशमें भ्रमवश नील, पीत आदि वर्णोंकी प्रतीति होती है, उसी प्रकार सच्चिदानन्दमय ब्रह्ममें यह जगत्-सम्बन्धी भ्रम उत्पन्न हुआ है। इस भ्रमके अत्यन्ताभावके ज्ञानमें यदि पूरी दृढ़ता हो जाय, तभी ब्रह्मका स्वरूप ज्ञात होता है, दूसरे किसी कर्मसे नहीं। दृश्यके अत्यन्ताभावके सिवा दूसरी कोई शुभ गति नहीं है। ज्यों-के-त्यों स्थित हुए इस दृश्य-जगत्के अत्यन्ताभावका निश्चय हो जानेपर जो शेष रह जाता है, उसी परमार्थ वस्तुका बोध होता है। जिसका बोध होता है, वह परमात्मा उस जाननेवाले पुरुषका आत्मा ही हो जाता है। जबतक इस जगत् नामक दृश्यकी अपनी सत्ताका अत्यन्ताभाव अथवा मिथ्यात्व सिद्ध नहीं हो जाता, तबतक परम तत्त्वरूप परमात्माको कभी कोई जान नहीं सकता। असत् पदार्थकी सत्ता नहीं होती और सत् वस्तुका कभी अभाव नहीं होता। जो वस्तु स्वभावसे है ही नहीं, उसके निवारणमें— उसे मिथ्या समझकर त्याग देनेमें कौन-सी कठिनाई है ? यह जो विस्तृत जगत् दिखायी देता है, पहले उत्पन्न नहीं हुआ था। यह चिन्मात्र होनेके कारण निर्मल आत्मामें ही कल्पित है, अतः ब्रह्मरूप ही है। उससे अतिरिक्त इसकी कोई सत्ता नहीं है। जगत् नामसे न यह कभी उत्पन्न हुआ, न है और न दिखायी ही देता है। जैसे सुवर्णमें कल्पित कटक-कुण्डल आदिका सुवर्ण-दृष्टिसे अभाव ही है, उसी प्रकार ब्रह्ममें कल्पित जगत्का ब्रह्मदृष्टिसे अभाव ही सिद्ध होता है। अतः इसके परिमार्जनमें— इसे असत् समझ लेनेमें क्या परिश्रम है !