संक्षिप्त योगवासिष्ठ
Sankshipt Yoga Vasistha
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१०४ * अविच्छिन्नचिदात्मैकः पुमानस्तीह नेतरत् * [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ
अब मैं बहुत-सी युक्तियोंद्वारा इस विषयका कुछ विस्तारके साथ इस तरह प्रतिपादन करूँगा, जिससे अबाधित (परमार्थ) तत्त्वका स्वयं ही अनुभव हो जाता है। जो पहले (सृष्टिके आरम्भमें) ही उत्पन्न नहीं हुआ, उसका यहाँ अस्तित्व कैसे हो सकता है। मरुभूमिमें जलपूर्ण नदीकी सत्ता कैसे सम्भव है। भ्रमसे प्रतीत होनेवाले द्वितीय चन्द्रमामें ग्रहभाव कैसे हो सकता है। जैसे वन्ध्याका पुत्र नहीं होता, जैसे मरुभूमिमें जलकी सरिता नहीं बहती और जैसे आकाशमें वृक्ष नहीं होता, उसी तरह जगत्-रूप भ्रमकी भी कहीं सत्ता नहीं है। श्रीराम! यह जो कुछ दिखायी देता है, वह सब रोग-शोकसे रहित ब्रह्म ही है। इस विषयका मैं आगे चलकर केवल वाणीद्वारा ही नहीं, युक्तियोंसे भी प्रतिपादन करूँगा। उदारबुद्धि रघुनन्दन! तत्त्वज्ञ पुरुष जिस विषयका युक्तियोद्वारा वर्णन करते हैं, उसकी अवहेलना करना कदापि उचित नहीं है। जो मूढ़बुद्धि मानव युक्तियुक्त वस्तुका अनादर करके कष्टसाध्य (युक्तिशून्य) वस्तुमें आग्रह रखता है, उसे विद्वान् लोग अज्ञानी ही समझते हैं।
श्रीरामचन्द्रजीने पूछा—भगवन्! यह किस युक्तिसे जाना जाता है कि यह दृश्यमान जगत् ब्रह्म ही है? यह बात कैसे सिद्ध होती है? यदि युक्तियोंद्वारा इस विषयका अनुभव हो जाय, तब तो फिर जाननेयोग्य कुछ भी शेष नहीं रह जाता।
श्रीवसिष्ठजीने कहा—रघुनन्दन! यह मिथ्याज्ञान-रूपिणी विषूचिका चिरकालसे दृढमूल हो गयी है। इसीका नाम जगत् है और इसीको अविचार कहते हैं। यह ज्ञानके बिना निवृत्त नहीं होती। जो जिस पदार्थको पाना चाहता है और उसके लिये पूरा प्रयत्न करता है, वह उस पदार्थको अवश्य प्राप्त कर लेता है। परंतु यह बात तभी सम्भव होती है, जब वह बीचमें ही थककर या ऊबकर प्रयत्नसे मुँह न मोड़ ले।
श्रीरामजीने पूछा—शास्त्रवेत्ताओंमें श्रेष्ठ गुरुदेव! आत्मज्ञानकी प्राप्ति करानेके लिये कौन-सा शास्त्र मुख्य है, जिसका ज्ञान प्राप्त कर लेनेपर मनुष्यको फिर कभी शोक नहीं होता?
श्रीवसिष्ठजीने कहा—महामते! जिन शास्त्रोंमें मुख्यतः आत्मज्ञानका ही प्रतिपादन हुआ है, उनमें यह महारामायण नामक शास्त्र ही सबमें श्रेष्ठ और शुभ है। इस उत्तम इतिहासका श्रवण करनेसे बोध प्राप्त हो जाता है। इसे समस्त इतिहासोंका सार कहा गया है। इस वाङ्मय (शास्त्र) का श्रवण कर लेनेपर कभी क्षीण न होनेवाली जीवन्मुक्ति स्वयं ही प्रकट हो जाती है। इसलिये यही सबकी अपेक्षा अत्यन्त पावन है। जैसे स्वप्न आदिके रहते हुए ही यह स्वप्न है, ऐसा ज्ञान हो जानेपर उस स्वप्नके सच्चे होनेकी भावना नष्ट हो जाती है, उसी प्रकार इस शास्त्रका विचार करनेसे जब यह समझमें आ जाता है कि सारा जगत् स्वप्नके समान मिथ्या है, तब यह दृश्य-जगत् ज्यों-का-त्यों स्थित रहकर भी ज्ञानीकी दृष्टिमें अस्तको प्राप्त हो जाता है। आत्मज्ञानके लिये अपेक्षित जो-जो युक्तियाँ इस शास्त्रमें हैं, वे ही दूसरे ग्रन्थोंमें भी उपलब्ध होती हैं। इसीलिये विद्वान् पुरुष इस महारामायणको सम्पूर्ण विज्ञान-शास्त्ररूपी धनका कोष (खजाना) मानते हैं। जो पुरुष प्रतिदिन इस महारामायणका श्रवण करता है, उसमें उत्कृष्ट चमत्कार आ जाता है। उसकी बुद्धि अन्य ग्रन्थोंके स्वाध्यायसे उत्पन्न हुए बोधकी अपेक्षा उत्तम बोधको प्राप्त कर लेती है, इसमें संशय नहीं। किसी दुष्कर्मके फलका उदय होनेके कारण जिसकी इस ग्रन्थके प्रति रुचि अथवा श्रद्धा नहीं है, जिसे यह शास्त्र नहीं रुचता, वह दूसरे किसी ज्ञानप्रधान सत्-शास्त्रका विचार करे (उससे हमारा कोई द्वेष नहीं है)। जैसे उत्तम औषधका पान करनेपर स्वयं ही नीरोगता प्राप्त हो जाती है, उसी तरह इस योगवासिष्ठ महारामायणका श्रवण कर लेनेपर जीवन्मुक्तिका स्वयं अनुभव होने लगता है।
(सर्ग ७-८)