संक्षिप्त योगवासिष्ठ
Sankshipt Yoga Vasistha
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
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स्थित है, उसी प्रकार ये तीनों लोक परब्रह्म परमात्मा ही हैं।
श्रीरामचन्द्रजीने कहा—मुने ! जिस युक्तिसे इस दृश्य-जगत्के अत्यन्ताभावका बोध होकर मुक्तिका उदय हो, उस उत्तम युक्तिका आप मुझे उपदेश कीजिये। द्वैतका अभाव होनेपर ही निर्वाण सुलभ होता है, इसलिये जिस प्रकार इस दृश्य-जगत्की अत्यन्त असत्ता सिद्ध हो और इसके रूपमें स्वभावनिष्ठ ब्रह्म ही विराजमान है—यह बोध हो जाय, वैसा ही उपदेश मुझे दीजिये। महर्षे ! किस युक्तिसे इस बातका ज्ञान होता है और कैसे यह बात सिद्ध होती है ? इस ज्ञानके सिद्ध हो जानेपर तो फिर कुछ साध्य (कर्तव्य) शेष नहीं रह जायगा।
श्रीवसिष्ठजीने कहा—रघुनन्दन ! यह मिथ्याज्ञान-रूपिणी विषूचिका चिरकालसे दृढमूल हो गयी है। निश्चय ही विचाररूपी मन्त्रसे इसका समूल नाश हो जाता है। सब प्रकारकी वस्तुओंसे युक्त तथा देवता, असुर और किंनर आदिसहित यह जो कुछ भी स्थावर-जङ्गमस्वरूप सारा जगत् दिखायी देता है, वह महाप्रलय-कालमें असत् एवं अदृश्यरूप होकर न जाने कहाँ चला जाता और नष्ट हो जाता है। तदनन्तर नाम और रूपसे रहित, शान्त, गम्भीर एवं अनिर्वचनीय 'सत्' अवशिष्ट रहता है। वह न तो तेज है न फैला हुआ अन्धकार है; न शून्य है न आकारवान् है; न दृश्य है न दर्शन है और न भूतों तथा भौतिक पदार्थोंका समूह ही है। वह विलक्षण सद्वस्तु अनन्तरूपसे स्थित है। नाम-रूपसे रहित होनेके कारण ही उसके स्वरूपका विशेषरूपसे वर्णन नहीं किया जा सकता। उसका स्वरूप पूर्णसे भी पूर्णतर है। वह दृश्य-शून्य, चिन्मात्र, असीम, अजर, शिव, आदि, मध्य और अन्तसे रहित, कारणशून्य तथा रोग-शोक आदिसे रहित है। उसके न कान हैं न जीभ, न नासिका है न त्वचा है और न नेत्र ही हैं; तथापि वह सदा सभी जगह सुनता है, रसका आस्वादन करता है, सूँघता है, स्पर्श करता है और देखता है। जिस प्रकाशसे पूर्वोक्त सदसत्-स्वरूप प्रपञ्च दिखायी देता है, वह चैतन्यमय प्रकाश भी वही है। विविध सृष्टियोंसे विचित्ररूप धारण करनेवाला भी वही है। आदि-अन्तसे शून्य स्वरूपको पाकर सर्वत्र प्रकाशित होनेवाला नित्य चेतन ब्रह्म भी वही है।
जो सामान्यतः तो सर्वत्र प्रकाशित होते हैं, परंतु अन्त:करणमें विशेषरूपसे निरन्तर प्रकाशित होते हुए विद्यमान रहते हैं, जो चिन्मय दीप हैं तथा जिनके ही प्रकाशसे तीनों लोक प्रकाशित होते हैं, जिनके बिना ये सूर्य आदि सारे प्रकाश अन्धकारके तुल्य हैं, जिनके रहनेपर ही त्रिभुवनरूपी मृग-तृष्णाकी प्रवृत्ति होती है (अर्थात् जैसे सूर्यकी किरणोंके प्रकाशित होनेपर ही उनमें मृग-तृष्णाके जलकी प्रतीति होती है, उसी प्रकार जिन चिन्मय परमात्मामें ही त्रिलोकीरूपी भ्रमका उदय होता है), जगत्की सृष्टि और संहार जिनके विलास हैं, जो सबसे महान् और व्यापक हैं, स्पन्द और अस्पन्द (चल और अचल) जिनके स्वरूप हैं, जिनका स्वभाव निर्मल और अविनाशी है, वायुके समान जिनकी गतिशील और गतिहीन सर्वव्यापीनी सत्ता व्यवहारवश केवल नामसे ही भिन्न है, वास्तवमें भिन्न नहीं है, वही चिन्मय परमात्मा है।
जो सदा ही जगा हुआ है, सर्वदा ही सोया हुआ है तथा जो सर्वत्र और सदा ही न तो सोया है और न जगा ही हुआ है, जिसका स्पन्दरहित (निश्चल) रूप कल्याणस्वरूप और शान्त है, जिसका स्पन्दनशील स्वरूप ही तीनों लोकोंकी स्थिति है, स्पन्द और अस्पन्दका विलास ही जिसका स्वरूप है; जो अद्वितीय एवं परिपूर्णस्वरूप है, फूलोंमें सुगन्धकी भाँति सब पदार्थोंमें साररूपसे स्थित है, विनाशशील वस्तुओंमें भी अविनाशी रूपसे विद्यमान है, सम्पूर्ण वस्तुओंका प्रत्यक्ष करनेवाली वृत्तियोंमें प्रकाश-रूपसे स्थित होकर भी जो श्वेतवस्त्रमें स्थित श्वेतताकी भाँति अग्राह्य है, जो वाग् आदि इन्द्रियोंसे रहित होनेके कारण गूँगेके समान होता हुआ भी सबकी वाणीकी