भारतकोश
संक्षिप्त योगवासिष्ठ

संक्षिप्त योगवासिष्ठ

Sankshipt Yoga Vasistha

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

DevanagariHindipublished750 पृष्ठ

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उत्पत्ति-प्रकरण ] * जगत्‌की ब्रह्मसे अभिन्नता तथा परमार्थ-तत्त्वका लक्षण * १०७

प्रवृत्तिमें कारण होनेसे गूँगा नहीं है; जो मननरूप विकारसे रहित होनेके कारण पाषाणके समान होता हुआ भी मननशील है, नित्यतृप्त होता हुआ भी भोक्ता है और अकिंचन (क्रिया आदिसे रहित) होता हुआ भी कर्ता है; जो अङ्गरहित है तथापि सम्पूर्ण लोकोंके अङ्ग जिसके अपने ही अङ्ग हैं; जो सहस्रों भुजाओं और नेत्रोंसे युक्त है, अकिंचनरूपसे स्थित होनेपर भी जिसने सम्पूर्ण जगत्‌को व्याप्त कर रक्खा है; जो इन्द्रिय-ग्राससे हीन है तो भी जिससे सम्पूर्ण इन्द्रियोंके व्यापार होते रहते हैं; जो मननशून्य है तथापि जिससे ये मनोनिर्माणकी रीतियाँ प्रकट होती हैं; जिसका साक्षात्कार न होनेसे भ्रान्तिजनित संसाररूपी सर्पका भय बना रहता है तथा जिसका दर्शन (ज्ञान) हो जानेपर सारी आशाएँ और सम्पूर्ण भय सब ओर भाग जाते हैं; जैसे समुद्रसे छोटी-छोटी लहरोंके समूहसे युक्त चञ्चल उत्ताल तरङ्ग प्रकट होती रहती हैं, उसी तरह जिससे घट-पट आदिके रूपमें सैकड़ों पदार्थोंकी श्रेणियाँ प्रादुर्भूत होती हैं; जैसे कड़े, बाजूबंद, बहूँटा और नूपुर आदिके रूपमें सुवर्ण ही अन्य-सा प्रतीत होता है, उसी प्रकार शत-शत घटादि पदार्थोंके भ्रमसे जो अन्य-सा भासित होता है; जैसे जलमें प्रतिक्षण नष्ट होनेवाली तरङ्गमाला प्रकट होती रहती है, उसी प्रकार जिससे अन्य-सी, अतिरिक्त-सी, पहले-जैसे और नूतन-सी क्षणभङ्गुर दृश्यपरम्परा स्फुरित होती है, उसे चिन्मय परमात्मा ही समझो।

रघुनन्दन ! तुम जिस रूपमें स्थित होकर क्रिया, रूप, रस, गन्ध, स्पर्श और चेतनको जानते हो, वह प्रमाता चेतन भी वही है और जिससे जानते हो, वह भी परमात्मदेव ही है। साधो ! द्रष्टा, दर्शन और दृश्यके मध्यमें साक्षी-रूपसे जिसका दर्शन होता है, उसे तुम एकाग्रचित्त होकर अपना आत्मा ही समझो। श्रीराम ! वह परब्रह्म परमात्मा अजन्मा, अजर, अनादि, सनातन, नित्य, कल्याणमय, निर्मल, अमोघ, सबका परम वन्दनीय, अनित्य, समस्त कल्पनाओंसे शून्य, कारणोंका भी कारण, अनुभव-रूप, अवेद्य, ज्ञानस्वरूप, विश्वरूप तथा अन्तर्यामी है।

(सर्ग ९)


जगत्‌की ब्रह्मसे अभिन्नता, परमार्थ-तत्त्वका लक्षण, महाप्रलयकालमें जगत्‌के अधिष्ठानका विचार तथा जगत्‌की ब्रह्मरूपताका प्रतिपादन

श्रीवसिष्ठजी कहते हैं-रघुनन्दन ! यह जगत् न तो कभी परब्रह्मसे उत्पन्न होता है और न उसमें लीन ही होता है। इस प्रकार केवल यह सद्ब्रह्म ही सदा अपने आपमें प्रतिष्ठित है। ब्रह्ममें जो शून्य-शब्दार्थकी कल्पना की गयी है अर्थात् उसे जो शून्य कहा गया है, वह अशून्यकी अपेक्षासे है। वास्तवमें ब्रह्म अशून्यरूप (सत्) है। उसमें शून्यता और अशून्यताकी कल्पनाएँ कैसे सम्भव हैं। चेतन आकाशरूप इस ब्रह्मका प्रकाश केवल अपने अनुभवका ही विषय है। जो बुद्धि आदिके भीतर अन्तर्यामीरूपसे स्थित है, उसका वही अनुभव करता है, दूसरा नहीं (क्योंकि वह स्वानुभवैकवेद्य है)। निष्कल होनेके कारण सौम्य (शान्त) आकारवाले महासागरके जलमें जिस प्रकार बड़ी-बड़ी लहरें विद्यमान होती हैं, उसी प्रकार निराकार ब्रह्ममें उसीके समान यह विश्व स्थित है। पूर्णसे पूर्णका ही प्रसार होता है; जो पूर्णमें स्थित है, वह पूर्ण ही है। अतः विश्व कभी उत्पन्न ही नहीं हुआ और जो उत्पन्न हुआ है, वह तत्स्वरूप (ब्रह्मरूप) ही है। वह परमाणुसे भी अधिक सूक्ष्म, अत्यन्त अणुसे भी अधिक अणु, परम शुद्ध, सूक्ष्म, शान्त और आकाशके मध्यभागसे भी बढ़कर निर्मल है। दिशा, काल और परिमाणसे उसका स्वरूप सीमित नहीं है; अतएव वह अत्यन्त विस्तृत (सर्वव्यापक) है। उसका

सं० यो० व० अं० ५-

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