भारतकोश
संक्षिप्त योगवासिष्ठ

संक्षिप्त योगवासिष्ठ

Sankshipt Yoga Vasistha

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

DevanagariHindipublished750 पृष्ठ

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उत्पत्ति-प्रकरण] * भेदके निराकरणपूर्वक एकमात्र ब्रह्मकी ही अखण्ड सत्ताका वर्णन * १११


भिन्न नहीं होता, उसी प्रकार किसी भी देश या कालमें यह सृष्टि परमात्मासे भिन्न नहीं है । इस प्रकार यह सृष्टि भ्रमसे ही प्रौढ ( सुदृढ या घनीभूत ) प्रतीत होती है । वास्तवमें यह विषमतारहित परमात्मा ही इसके रूपमें स्थित है । जो ब्रह्माण्ड प्रतीत होता है, वह अत्यन्त निर्मल चिन्मय ब्रह्म ही है ( उससे भिन्न दूसरी कोई वस्तु नहीं है )। इसी तरह यह दृश्य-जगत्, जो आत्मामें सर्वथा कल्पित भ्रमरूप है, शान्त, आधाररहित, आधेय-शून्य, अद्वैत तथा एकत्वके व्यवहारसे भी शून्य ब्रह्मरूप ही है । यद्यपि इस जगत् रूपी भ्रमकी प्रतीति होती है, तथापि उसके रूपमें कोई वस्तु उत्पन्न नहीं हुई है । चारों ओरसे शून्य जो निर्मल चेतनाकाश ( ब्रह्म ) प्रतिष्ठित है, वही सदा सर्वत्र अपने स्वरूपसे स्थित है । उसमें न सम्पूर्ण संसार है, न उसका कोई आधार है, न आधेय है; न दृश्य है न उसमें द्रष्टापन है; न ब्रह्माण्ड है न ब्रह्मा है और न कहीं कोई वितण्डावाद ही है । न जगत् है न पृथ्वी है । यह सम्पूर्ण दृश्य शान्तस्वरूप निर्मल ब्रह्म ही है । इस प्रकार परब्रह्म परमात्मा ही अपनेमें अपनेसे विकासको प्राप्त होता है ।

जैसे तरल होनेके कारण जल ही अपनेमें आवर्त रूपसे प्रतीत होता है, उसी प्रकार चित्-रूप होनेके कारण आत्मा ही अपनेमें जगत्-सा प्रतीत होता है । जगत् इससे कोई भिन्न पदार्थ नहीं है । असत् होता हुआ ही यह प्रतीतिका विषय होता और यहाँ सत्-सा अनुभवमें आता है । अन्तमें ( महाप्रलयके समय ) यह असत् होता हुआ ही नष्ट होता है । जैसे स्वप्नमें जो अपना मरण दिखायी देता है, वह जाग्रत्कालमें असत् ही सिद्ध होता है, उसी प्रकार अज्ञान अवस्थामें प्रतीत होनेवाला यह दृश्य-प्रपञ्च ज्ञान होनेपर असत् ही सिद्ध होता है । ( अथवा प्रलयकालमें जो इसका संहार होता है, वह स्वप्नावस्थामें प्रतीत होनेवाले अपने ही मरणके समान मिथ्या है । ) अथवा ब्रह्मका अपना ही स्वरूप होनेके कारण यह दृश्य-प्रपञ्च सन्मात्र, अनामय, अखण्डित ( परिपूर्ण ), अनादि, अनन्त तथा चेतन आकाशरूप ब्रह्म ही है । ( उससे अतिरिक्त इसकी सत्ता ही नहीं है । ) (सर्ग १२-१३)


भेदके निराकरणपूर्वक एकमात्र ब्रह्मकी ही अखण्ड सत्ताका वर्णन तथा जगत्की पृथक् सत्ताका खण्डन

श्रीवसिष्ठजी कहते हैं—रघुनन्दन ! इस प्रकार अहंता आदि दृश्यसमूहभूत जगत् वास्तवमें कोई वस्तु नहीं है । कभी उत्पन्न न होनेके कारण इसका अस्तित्व है ही नहीं और जिसका अस्तित्व है, वह तो परब्रह्म परमात्मा ही है । यदि स्वप्नमें दिखायी देनेवाला पर्वत अविनाशी हो तो यह जगत् उसीके समान अविनाशी है । यदि स्वप्नमें प्रतीत होनेवाला नगर स्थिर हो तो उसी तरह यह जगत् भी स्थिर है । ( तात्पर्य यह कि जैसे वे अविनाशी और स्थिर नहीं हैं, वही दशा इस जगत्की भी है ।) यदि चित्रकारका चित्त स्थिर हो और उसमें वासनामय स्थिर चित्र बने तो उस चित्रमें कल्पनाद्वारा अङ्कित सेनाके समान ही इस जगत्की आकृति है अर्थात् जैसे उस चित्रमें अङ्कित सेना अस्थिर एवं असत्य है, उसी तरह यह जगत् भी है । आदि-प्रजापतिकी भी, जो स्वयंभू नामसे पहले-पहल विख्यात हुआ, कोई कारण नहीं है; क्योंकि उसके पूर्वजन्मके कर्म शेष नहीं हैं । महाप्रलय होनेपर पूर्वकालके सभी प्रजापति मुक्त हो जाते हैं, अतः उनमें पूर्वजन्मका कर्म कैसे रह सकता है । ब्रह्म ही सबसे प्रथम होनेवाला हिरण्यगर्भ है । वही विराट् है और विराट् ही सृष्टिरूप है । इस तरह वह चिन्मय परमात्मा ही जीवाकाशरूपसे स्थित है, जिससे पृथ्वी आदि सत् प्रपञ्चकी उत्पत्ति होती है । ( तात्पर्य यह कि समस्त जगत् ब्रह्म ही है, ब्रह्मसे भिन्न दूसरी कोई वस्तु नहीं । )