भारतकोश
संक्षिप्त योगवासिष्ठ

संक्षिप्त योगवासिष्ठ

Sankshipt Yoga Vasistha

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

DevanagariHindipublished750 पृष्ठ

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११२ * अविच्छिन्नचिदात्मकः पुमानस्तीह नेतरत् * [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ

केवल एकमात्र शुद्ध चिद्धन निर्मल एवं सर्वव्यापक ब्रह्म ही सदा सर्वत्र विराजमान है। वह सर्वशक्तिमान् होनेसे जिन-जिन कौशलपूर्ण कल्पनाओंकी भावना करता है, उन्हें स्वयं ही प्राप्त करता है—स्वयं तद्रूप हो जाता है। जैसे हाथमें दीपक लेकर ढूँढ़ा जाय या देखा जाय तो अन्धकार अदृश्य हो जाता है, उसका कहीं पता नहीं लगता, उसी प्रकार ज्ञानका प्रकाश छा जानेपर अज्ञानरूपी अन्धकारका तत्त्व ज्ञात नहीं होता—उसका पता ही नहीं चलता। इसी प्रकार अखण्ड, व्यवधानशून्य, अनादि, अनन्त तथा सर्वशक्तिमान् जीवात्मा जो कभी बाधित न होनेवाले महाचैतन्यरूपी सारभूत अंशसे रूपवान् प्रतीत होता है, ब्रह्म ही है---उससे भिन्न नहीं है। वह ब्रह्म सब प्रकारसे महान् है—देश, काल और परिणामसे परिच्छिन्न नहीं है। इसलिये कहीं उसमें भेद-की कल्पना नहीं है और जो भेदकी कल्पना होती है, वह भी ब्रह्म ही है, उससे भिन्न नहीं; क्योंकि सर्वत्र ऐसा ही अनुभव होता है। चेतनकी जो यह आकाशसे भी सूक्ष्म शक्ति सब ओर फैली है, वह स्वभावसे ही पहले इस अहंता (अहंकार) का दर्शन (अनुसंधान) करती है। जैसे जल अपने आपमें स्वयं ही बुद्बुद और तरङ्ग आदिके रूपमें स्फुरित होता है, उसी प्रकार जब आत्मा अपने आपमें स्वयं ही स्फुरणशील होता है, तब उस चेतन आत्माकी यह चिच्छक्ति उस सूक्ष्म अहंताका दर्शन (अनुसंधान) करती है, जो उत्तरोत्तर स्थूलताको प्राप्त होती हुई अन्तमें ब्रह्माण्डका आकार धारण कर लेती है। चेतनकी चमत्कारकारिणी जो चितिशक्ति है, वह स्वयं अपने आपमें जिस सुन्दर चमत्कारकी सृष्टि करती है, उसीका नाम जगत् रख दिया गया है। रघुनन्दन ! चेत्य (दृश्य) भूत जो अहंकार है, उसकी कल्पना चैतन्यके अधीन है अर्थात् चैतन्यकी ही वह कल्पना है। तथा तन्मात्रा आदि जो जगत् है, उसकी कल्पना अहंकारके अधीन है, इस प्रकार अहंकार और जगत् चैतन्यरूप ही हैं। फिर उस चैतन्यमें द्वैत और अद्वैत कहाँ रहे।

ईहा अर्थात् मनकी चेष्टा (संकल्प)-रूप जो सारा सूक्ष्म जगत् है, वह शून्य ही है तथा इन्द्रिय और उनके अधिष्ठाता देवताओंका निवासभूत जो साकार एवं स्थूल विश्व है, वह भी शून्य ही है; क्योंकि दोनों ही चैतन्य-के चमत्काररूप (चैतन्य ही) हैं। इसलिये वे चैतन्यसे भिन्न नहीं हैं। जो वस्तु जिस वस्तुका विलास होती है, वह उससे कभी भी भिन्न नहीं होती। अवयवयुक्त जल आदिके विलासभूत तरङ्ग आदिमें भी ऐसा देखा गया है। फिर अवयवरहित चेतनके विलासमें अभिन्नता हो, इसके लिये तो कहना ही क्या है। सदा अचेत्य (अदृश्य अथवा रूपसे रहित), नामरहित और सर्वव्यापक चैतन्यशक्तिका जो रूप है, उससे स्फूर्ति प्राप्त करनेवाले जगत्का भी वही रूप है। (चैतन्यकी ही जो भिन्न-भिन्न आकारमें स्फुरणाएँ होती हैं, वे ही जगत् कही गयी हैं; अतः यह जगत् उस चैतन्यशक्ति या चेतन आत्मासे भिन्न नहीं है।) श्रीराम ! चेतन आत्माका जो चैतन्य है, उसीको जगत् समझो। वह चैतन्य जगत्से पृथक् नहीं है। यदि चैतन्यको जगद्भावसे रहित या भिन्न माना जाय तो चित् चित् नहीं रह जायगा—चेतनको चेतन नहीं कहा जा सकेगा। (क्योंकि अपने धर्म या स्वरूपभूत जगत्को चेतित—प्रकाशित करनेके कारण ही उसको 'चित्' या 'चेतन' कहते हैं।) अतः चेतनसे जगत्का प्रतीतिमात्रसे ही भेद है, वास्तवमें भेद नहीं है। ऐसी परिस्थितिमें जगत्की पृथक् सत्ता कैसे सिद्ध हो सकती है।

चैतन्यप्रधान अहंकार कर्ता है और स्पन्दप्रधान (हिलना-चलना आदि चेष्टामय) प्राण कर्म (क्रिया) है। इन दोनोंमें कोई भेद नहीं है; क्योंकि कर्ताका अपनी क्रियासे भेद नहीं देखा जाता। चित्‌का स्पन्दनमात्र ही क्रिया (प्राण) है, उससे संयुक्त पुरुष ही 'जीव' कहा गया