संक्षिप्त योगवासिष्ठ
Sankshipt Yoga Vasistha
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंनिर्वाण-प्रकरण पू० ] * प्राण-अपानकी गतिको तत्त्वतः जाननेसे मुक्ति * ३८७
धारण करनेमें समर्थ शेषनाग होना यानी पातालका अधिपति होना भी श्रेष्ठ नहीं; क्योंकि ये सब क्षणभङ्गुर—नाशवान् हैं। जहाँ विवेकी पुरुषोंका मन पूर्णकाम होकर सुख-शान्ति पाता है, वैसी वास्तविक सुख-शान्ति वहाँ लेशमात्र भी नहीं है। आधि-व्याधियोंसे प्रचुर चिरजीविता भी श्रेष्ठ नहीं, समस्त व्याधियोंका विनाशरूप मरण भी अखिल दुःखोंकी निदान दृढ़ अज्ञतारूप होनेसे श्रेष्ठ नहीं है, नरक तथा स्वर्ग भी श्रेष्ठ नहीं; क्योंकि जहाँ विवेकी पुरुषोंका मन पूर्णकाम होता है, वैसा वहाँ कुछ भी नहीं है। उस प्रकारके सम्पूर्ण विविध सृष्टियोंके क्रम अज्ञानी मनुष्यकी बुद्धिकी मूढ़ताके कारण ही रमणीय प्रतीत होते हैं। इसलिये जो महान् संत हैं, वे अनित्य, क्षणभङ्गुर, नाशवान् मायिक पदार्थोंमें चिरविश्राम कैसे कर सकते हैं? क्योंकि उनमें वास्तविक सुख-शान्ति और विश्रामका अत्यन्त अभाव है। इसलिये विवेकी पुरुषोंको उनमें अत्यन्त वैराग्य करके उनसे उपरत हो जाना चाहिये। (सर्ग २३)
प्राण-अपानकी गतिको तत्त्वतः जाननेसे मुक्ति
भुशुण्डने कहा— महाराज! कभी नष्ट न होनेवाली, संशयोंसे रहित एक परमात्मदृष्टि ही समस्त ज्ञानोंमें सबसे उन्नत और सबसे श्रेष्ठ है। ब्रह्मन्! परमात्मविषयक विचार समस्त दुःखोंका अन्त कर देनेवाला तथा अनादि-कालसे चले आते हुए अज्ञानसे परिपूर्ण, दुःस्वप्न-तुल्य संसाररूपी भ्रमका विनाश करनेवाला है। भगवन्! समस्त संकल्पोंसे रहित परमात्मविषयक भावनासे अज्ञानरूपी अन्धकारका, उसके कार्योंके साथ, भली प्रकार विनाश हो जाता है। किंतु सामान्य बुद्धिवाले प्राणी समस्त कल्पनाओंसे अतीत इस परमपदको कैसे प्राप्त कर सकते हैं? अर्थात् साधारण पुरुषोंके लिये वह पद प्राप्त होना कठिन है। इस परमात्मविषयक भावनाके अनेक भेद हैं। उनमेंसे सम्पूर्ण दुःखोंका विनाश करनेवाली प्राणभावनाका मैंने आश्रय लिया है, वही यहाँ मेरे जीवनका आधार है।
श्रीवसिष्ठजी बोले— श्रीराम! जब मननशील भुशुण्ड इस प्रकार कह रहे थे, तब जानते हुए भी मैंने शान्त भावसे उनसे फिर कौतुकवश पूछा—'समस्त संदेहोंको काटनेवाले अत्यन्त दीर्घजीवी सज्जनस्वभाव भुशुण्ड! तुम मुझसे ठीक-ठीक कहो कि प्राणकी भावना किसे कहते हैं?'
भुशुण्डने कहा— मुने! आप समस्त वेदान्तके ज्ञाता हैं, समस्त संशयोंका विनाश करनेवाले हैं, तथापि केवल विनोदके लिये ही मुझ-जैसे कौएसे इस विषयका प्रश्न कर रहे हैं—ऐसा मैं मानता हूँ। महाराज! भुशुण्डको जिसने चिरजीवी बनाया है तथा जिसने भुशुण्डको आत्मस्वरूपकी प्राप्ति करायी है, उस प्राण-समाधिका निरूपण मैं कहता हूँ, सुनिये। मुनिराज! इड़ा और पिङ्गला नामकी दो अत्यन्त सूक्ष्म नाड़ियों इस देहरूपी घरके बीच दाहिने और बायें भागमें स्थित कोष्ठमें यानी कुक्षिमें रहती हैं। उनका किसीको भान नहीं होता, वे केवल नासापुटमें प्राणसंचारद्वारा प्रतीत होती हैं। उक्त देहमें यन्त्रके सदृश तीन कमलके जोड़े हैं। वे अस्थि-मांसमय एवं अत्यन्त मृदु हैं। उनमें ऊपर और नीचे दोनों ओरसे नालदण्ड लगे हुए हैं और वे सम्पुटित होकर एक दूसरेसे मिले हुए कोमल सुन्दर दलोंसे सुशोभित हैं। उन तीन हृदय-कमलयन्त्रोंमें प्राणकी समस्त शक्तियाँ ऊपर और नीचेकी ओर उसी प्रकार फैली हुई हैं, जिस प्रकार चन्द्र-बिम्बसे किरणें फैलती हैं। इन प्राणशक्तियोंसे ही शीघ्रगति, आगति, चिरनिर्णय, हरण, विहरण, उत्पतन एवं निपतनकी क्रियाएँ निष्पन्न होती हैं। मुने! हृदय-कमलमें स्थित यही वायु पण्डितों-द्वारा प्राणके नामसे कही जाती है। इसीकी कोई एक शक्ति नेत्रोंको स्पन्दित करती है यानी नेत्रोंमें निमेष-
सं० यो० व० अं० १४—