संक्षिप्त योगवासिष्ठ
Sankshipt Yoga Vasistha
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंवैराग्य-प्रकरण ] * तीर्थ-यात्रासे लौटे हुए श्रीरामकी दिनचर्या एवं पिताके घरमें निवास * २७
वचनोंमें ज्यों ही यह बात कही, उसकी उस बातको सुनते ही मन्त्री और सामन्तोंसहित वे राजशिरोमणि दशरथ तत्काल सोनेके सिंहासनसे उठकर खड़े हो गये।
राजाओंके समुदायसे घिरे तथा सामन्तोंसे प्रशंसित होते हुए वे नरेश वसिष्ठ और वामदेवजीके साथ सहसा पैदल ही उस स्थानकी ओर चल दिये, जहाँ महामुनि विश्वामित्र खड़े थे। राजाने ड्योढ़ीपर खड़े हुए उन मुनिश्रेष्ठको देखा। वे ब्राह्मणोचित तेज तथा महान् क्षात्र-बलसे भी सम्पन्न थे। वृद्धावस्थाके कारण अधिक पकी हुई और तपस्यामें ही लगे रहनेसे रूखी जटावल्लरीके द्वारा उनके कंधे ढके हुए थे। उन्होंने शान्त (सौम्य), कान्तिमान्, उद्दीप्त, प्रतिवातरहित, विनयशील, हृष्ट-पुष्ट अवयवोंसे युक्त तथा तेजस्वी शरीर धारण कर रखा था। उनका तेज सुन्दर होनेके साथ ही अत्यन्त भयंकर था, प्रसादगुणसे युक्त तथा दूरतक फैला हुआ था, गम्भीर एवं अतिशय पूर्णताको प्राप्त था। उस तेजसे ऋषिकी अङ्ग-कान्ति अनुरञ्जित थी। उन्होंने अपने हाथमें एक कुण्डी (कमण्डलु) ले रक्खी थी, जो चिकनी, निर्दोष एवं उत्तम थी। वह उनके कल्पान्तस्थायी जीवनकालकी सभी अवस्थाओंमें सहचरीकी भाँति उनका साथ देती थी। मुनिका अन्तःकरण अत्यन्त निर्मल था। उनके चित्तमें करुणा भरी थी, इसलिये उनकी वाणी बड़ी मधुर एवं प्रसन्नतासूचक होती थी। वे अपनी स्नेहपूर्ण दृष्टिसे इस प्रकार देखते थे, मानो सामने खड़ी हुई जनताको अमृतसे सींच रहे हों। उनके अङ्गमें सुन्दर यज्ञोपवीत शोभा पा रहा था। वे दर्शकोंके मनमें अत्यन्त आश्चर्यका संचार-सा कर रहे थे। उन महर्षिको दूरसे ही देखकर राजाका शरीर विनयसे झुक गया और उन्होंने मुकुटमण्डित मस्तकसे उनके चरणोंमें प्रणाम किया। मुनिने भी, जैसे सूर्यदेव इन्द्रका प्रत्यभिवादन करते हैं, उसी प्रकार मधुर एवं उदारतापूर्ण वचनोंद्वारा आशीर्वाद देकर पृथ्वीनाथ दशरथका प्रत्यभिवादन किया। तत्पश्चात् वसिष्ठ आदि सभी ब्राह्मणोंने स्वागत आदिके क्रमसे विश्वामित्रजीका सत्कार किया।
दशरथने कहा—महात्मन् ! जैसे भगवान् सूर्य अपने तेजस्वी स्वरूपका दर्शन देकर कमलोंसे भरे हुए सरोवरों-पर अनुग्रह करते हैं, उसी प्रकार आज आपका जो यह असम्भावित तेजोमय दर्शन प्राप्त हुआ है, इससे हम सब लोग अत्यन्त अनुगृहीत हैं।
मुनिके प्रति ऐसी ही बातें कहते हुए अन्य राजा तथा महर्षि, सब लोग राजसभामें आकर यथायोग्य आसनोंपर बैठ गये। राजा दशरथने स्वयं ही मुनिको अर्घ्य निवेदन किया।
राजाके अर्घ्यको स्वीकार करके महर्षिने शास्त्रोक्त विधिसे प्रदक्षिणा करते हुए नरेशकी भूरि-भूरि प्रशंसा की। राजा दशरथद्वारा पूजित हो विश्वामित्र बडे प्रसन्न हुए। उनका मुखारविन्द खिल उठा। उन्होंने राजासे उनकी कुशल पूछी। तदनन्तर मुनिवर विश्वामित्र हँसकर वसिष्ठजीसे मिले और यथायोग्य सत्कार करके उनके आरोग्यका समाचार पूछने लगे। क्षणभरमें एक दूसरेसे