भारतकोश
संक्षिप्त योगवासिष्ठ

संक्षिप्त योगवासिष्ठ

Sankshipt Yoga Vasistha

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

DevanagariHindipublished750 पृष्ठ

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पृष्ठ 648

निर्वाण-प्रकरण उ०] * रुद्रदेवका ब्रह्माण्डखण्डको निगलकर निराकार चिदाकाशरूपसे स्थित होना * ६०३

है। उस समय प्रकृति चिति—निर्वाण-रूप परम पदको प्राप्त हो तद्रूप बन जाती है, जैसे नदी समुद्रमें मिलकर समुद्ररूप हो जाती है। रघुनन्दन ! वह चिति शक्ति तभीतक मोहवश इन व्याकुल सृष्टिपरम्पराओ और उनकी जन्म आदि दशाओमें भ्रमण करती रहती है, जबतक कि परब्रह्म परमात्माका दर्शन नहीं कर लेती। उनका दर्शन कर लेनेपर वह तत्काल उन्हींमें समा जाती है। (सर्ग ८५)


रुद्रदेवका ब्रह्माण्डखण्डको निगलकर निराकार चिदाकाशरूपसे स्थित होना तथा वसिष्ठजीका उस पाषाण-शिलाके अन्य भागमें भी नूतन जगत्‌को देखना और पृथ्वीकी धारणाके द्वारा पार्थिव जगत्‌का अनुभव करना

श्रीवसिष्ठजी कहते हैं—श्रीराम ! जब मै खडा-खड़ा वह सब देख रहा था, तब मुझे दिखायी दिया कि वे भगवान् रुद्र तथा ब्रह्माण्डके वे दोनो खण्ड या कपाल चित्र-लिखितके समान निश्चेष्ट हैं। तदनन्तर एक ही मुहूर्तमें आकाशके बीच रुद्रदेवने ब्रह्माण्डके उन दोनो खण्डोंको अपनी सूर्यरूपिणी दृष्टिसे उसी तरह देखा, जैसे द्युलोक और भूलोकको देख रहे हों। फिर पलक मारते-मारते उन दोनों ब्रह्माण्डखण्डोंको अपनी श्वास-वायुके द्वारा खींचकर उन्होने पाताल-गुफाके समान मुँहमें डाल लिया । इस प्रकार ब्रह्माण्डखण्डरूपी दुग्धसार तथा मिष्टान्नराशिको अपना ग्रास बनाकर वे भगवान् रुद्र उस समस्त आकाशमे चिदाकाशरूप होकर अकेले ही रह गये। तदनन्तर वे एक ही मुहूर्तमें बादलके समान हल्के और छोटे हो गये। फिर छड़ीके समान और उसके बाद बित्ते भरके हो गये। तत्पश्चात् जिन्हें वैसे विशाल रूपमें देखा गया था, वे रुद्र मुझे काँचके टुकड़ेकी एक कणिकाके समान दिखायी दिये। इसके बाद मैने आकाशसे दिव्यदृष्टिद्वारा देखा, वे परमाणुके बराबर हो गये थे। परमाणुरूप होनेके पश्चात् वे अदृश्य हो गये । इस तरह भरे-पूरे जगत्‌से लेकर रुद्र-शरीरतक वह सारा महान् आरम्भ मेरे देखते-देखते शरत्कालके मेघखण्ड-की भाँति विलीन हो गया। श्रीराम ! जैसे भूखा हिरन छोटे-से पत्तेको निगल जाता है, उसी प्रकार भगवान् रुद्रने जब इस प्रकार आवरणोंसहित समस्त ब्रह्माण्डको उदरस्थ कर लिया, तब दृश्यरूपी मलसे रहित केवल चेतनाकाश-रूप शान्त परमात्मा परब्रह्म ही शेष रह गया। उसका न कहीं आदि है न अन्त। चिन्मय आकाशमात्र ही उसका स्वरूप है। रघुनन्दन ! इस तरह मैने पाषाण-खण्डके कोटरमें दर्पणमें दीखनेवाले प्रतिबिम्बकी भाँति उस महान् विभ्रमरूप ब्रह्माण्ड एवं उसके महाप्रलयका दृश्य देखा था।

तदनन्तर उस विद्याधरोका, उस शिलाका तथा उस संसारभ्रमका स्मरण करके मै वैसे ही आश्चर्य-चकित हो गया, जैसे कोई गाँवका रहनेवाला गँवार पहले-पहल राजद्वारपर पहुँचकर विस्मयसे विमुग्ध हो जाता है। इसके बाद मैंने पुनः उस सुवर्णशिलाको ध्यानसे देखना आरम्भ किया। फिर तो मुझे कालीके शरीरमें स्थित हुए संसारकी भाँति उसमें सर्वत्र नूतन सर्ग दृष्टिगोचर होने लगे। वह घनीभूत मण्डलाकार सुवर्णमयी विस्तृत पाषाणशिला एकरूपमें ही स्थित थी और सन्ध्याकालके मेघकी भाँति परम सुन्दर दिखायी देती थी। इसके बाद मैंने आश्चर्यचकित हो उस शिलाके दूसरे भागके विषयमें भी उसी परादृष्टिसे विचार करना आरम्भ किया। विचार करते-करते देखता हूँ तो उस शिलाका दूसरा भाग भी उसी तरह जगत्‌के आरम्भसे ठसाठस भरा हुआ है। वहाँ पूर्ववत् एक छिद्र (आकाश) में नाना पदार्थोंसे सुन्दर संसार बसा हुआ था। उस शिलाके जिस-जिस प्रदेशको मैंने देखा, वहाँ-वहाँ दर्पणमें प्रतिबिम्बकी भाँति मुझे निर्मल जगत्‌का दर्शन हुआ।