भारतकोश
संक्षिप्त योगवासिष्ठ

संक्षिप्त योगवासिष्ठ

Sankshipt Yoga Vasistha

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

DevanagariHindipublished750 पृष्ठ

पृष्ठ 651, कुल 750 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 651

६०६ * अविच्छिन्नचिदात्मैकः पुमानस्तीह नेतरत् * [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ


धारणाद्वारा वायुरूपसे स्थित हुए वसिष्ठजीका अनुभव

श्रीवसिष्ठजी कहते हैं—रघुनन्दन ! तदनन्तर मैं जगत्‌को देखनेके कौतूहलसे धीर-चित्तवृत्तिके द्वारा वायुमयी विस्तृत धारणा करके वायुरूप हो गया और लतावल्लीरूपिणी ललनाओंको नचाने लगा। कमल, उत्पल और कुन्द आदि पुष्पसमूहोंकी सुगन्धका संचय करके उसकी रक्षा करने लगा। नन्दनवनमें मेरा आना-जाना अत्यन्त मधुर और उदार होता था; क्योंकि वहाँ बड़ी मधुर सुगन्ध सुलभ होती थी। चन्द्रमण्डलमें जो श्रेष्ठ अमृत है, उसका चिरकालतक उपभोग करके पूर्णरूपसे घिरे हुए मेघोंकी घटारूप शय्यापर सोकर तथा कमलवनोको कम्पित करके मैं प्राणियोंके श्रमका निवारण किया करता था। आकाशरूपी पुष्पका मैं ही सौरभ था। अतएव उसके गुणभूत सभी शब्दोंका मैं सहोदर भाई बन गया। प्राणियोंके अङ्गों और उपाङ्गोंमें प्रेरक बनकर उनकी नाड़ीरूप नालियोंमें जलसा हो गया था। मैं सुगन्धरूपी रत्नोंका लुटेरा, विमानरूपी नगरोंकी आधारभूमि, दाहरूपी अन्धकारका निवारण करनेके लिये चन्द्रमा तथा शीतरूपी चन्द्रमाकी उत्पत्तिके लिये क्षीरसागर था। एक ही क्षणमें मैं समस्त पर्वतोंको उखाड़कर फेंकनेमें समर्थ था। वायुरूप बनकर मैंने छः प्रकारकी क्रियाएँ करते-करते प्रलयपर्यन्त कभी भी विश्राम नहीं लिया। मेरे वे छः कर्म इस प्रकार थे। हिम और घी आदिको जमा देना—उसका पिण्ड बनाना, कीचड़ आदिको सुखाना, मेघ आदिको धारण करना, तृण आदिमें हलचल पैदा करना, सुगन्धको इधर-उधर ले जाना तथा ताप हर लेना।

श्रीराम ! इस प्रकार उस समय पृथ्वी आदि पाँच भूतोंका रूप धारण करके मैने उस त्रिलोकीरूप कमलके उदरमें भलीभाँति विहार किया। पृथ्वी, जल, वायु और तेजके समूहरूप वृक्षोंके शरीरोंमें निवास करते हुए मैंने मूल-जालके द्वारा पृथ्वीका रस पीया और उसके स्वादका अनुभव किया। अमृतसे पूर्ण घनीभूत अङ्गवाले तथा चन्दन-द्रवके समान शीतलता आदि गुणोंसे सुशोभित चन्द्रबिम्बोंपर जो बर्फकी बनी हुई शय्याओंके समान थे, मैंने अच्छी तरह लोट-पोट किया है। उपभोगके बाद बचा हुआ पुष्परस भ्रमरको देते हुए मैंने सभी दिशाओं और सभी ऋतुओंमें समस्त वनसमूहोंके भीतर नाना प्रकारकी सुगन्धोंसे परिपूर्ण पुष्पराशियोंका अच्छी तरह सेवन किया है। कुमुद, कह्लार और कमलोंसे पूर्ण नलिनी-वनमें मैंने मधुर बोली बोलनेवाली हंसियोंके साथ लीला-पूर्वक कोमल कलकल नाद किया है। रघुनन्दन ! मेरी कृपासे प्रसन्न हुए सूर्य आदि देवताओंने शरीरसे कृष्ण, रक्त, श्वेत, अश्वेत, पीत एव हरित वर्णोंसे हरे वृक्षोंकी भाँति मेरे शरीरमें स्थिति प्राप्त की थी। समुद्रोंसे घिरी हुई तथा सात द्वीपोंके कारण मानो सात रूप धरनेवाली इस भूमिको मैने अपनी कलाईमें कंगनकी भाँति धारण कर लिया था। श्रीराम ! समस्त ब्रह्माण्डरूप होनेके कारण यद्यपि सारे पाताल मेरे चरण बन गये थे, मैं भूतलको उदरके रूपमें धारण कर रहा था और आकाश मेरा मस्तक था, तथापि मैंने अपनी परम सूक्ष्म चिन्मात्रस्वरूपताका कभी त्याग नहीं किया था। इस प्रकार चिदाकाशरूपसे स्थित हुए मैंने भूमि, जल, अग्नि और वायुका स्वरूप धारण किया। जैसे प्रसिद्ध चिति शक्ति स्वयं ही स्वप्नमें नगर आदिका रूप धारण करती है, उसी प्रकार मेरेद्वारा भूमि आदिका स्वरूप-धारण माया शक्तिका विस्तार ही था। (सर्ग ९२)

संक्षिप्त योगवासिष्ठ · पृष्ठ 651, कुल 750 में से · BharatKosha