संक्षिप्त योगवासिष्ठ
Sankshipt Yoga Vasistha
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
पृष्ठ 660, कुल 750 में से
संदर्भ में पढ़ेंनिर्वाण-प्रकरण उ० ] * श्रीवसिष्ठजी और सिद्धका आकाशमें अभीष्ट स्थानोंको जाना * ६१३
रुचि नहीं हो रही है। अहो ! यह संसार कितना मूढ़ है ? यह मानव-समुदाय स्वभावसे ही विषयोंके वशीभूत है । इसीलिये एक दूसरेकी स्त्री और धनका अपहरण करनेके लिये लोलुप हो रहा है। जब वह मुमुक्षु होकर शास्त्रोंके अर्थका विचार करता है, तब यथार्थ दृष्टि ( तत्त्व-साक्षात्कार ) प्राप्त करके सदाके लिये सुखी हो जाता है ।
श्रीवाल्मीकिजी कहते हैं—भरद्वाज ! जब वसिष्ठ मुनि इतना उपदेश दे चुके, तब वह दिन बीत गया। भगवान् सूर्य अस्ताचलको चले गये । इधर उस राज-सभाके लोग सायंकालिक कृत्यके हेतु स्नान करनेके लिये मुनिवर वसिष्ठको नमस्कार करके उठ गये तथा रात बीतनेपर सूर्यदेवकी किरणोंके उदयके साथ ही फिर उस सभामें लौट आये ।
श्रीवसिष्ठजी कहते हैं—कर्त्तव्यका ज्ञान रखनेवाले रघुनन्दन ! यह मैंने तुमसे पाषाणोपाख्यान कहा । इस आख्यायिकासे जो विज्ञानदृष्टि प्राप्त होती है, उससे यही समझना चाहिये कि सारी सृष्टियाँ चेतनाकाशमें ही स्थित हैं। यहाँ जो कुछ भी दीखता है, उसे चिन्मय ब्रह्म ही समझना चाहिये । जैसे स्वप्न-दर्शनके समय जो नगर प्रकट होता है, वह अपने चिन्मय स्वरूपसे कदापि भिन्न नहीं है। वस्तुतः यह सृष्टि नहीं है, एकमात्र चैतन्य-शक्ति ही विराज रही है। जैसे सोनेके आभूषणोंमें सोना ही सत्य है, अंगूठी आदिके नाम और आकार नहीं। जैसे स्वप्नमें निर्विकार चिति-शक्ति ही पर्वतके रूपमें प्रकाशित होती है, उसी तरह निराकार ब्रह्म ही सृष्टिके रूपमें भासित हो रहा है। ब्रह्मके सिवा दूसरी कोई वस्तु नहीं है। यह सारा दृश्य चिन्मय आकाशरूप, अनन्त, अजन्मा और अविनाशी ब्रह्म ही है। वस्तुतः सहस्रों महाकल्पोंमें भी न तो यह उत्पन्न होता है और न इसका नाश ही होता है। पुरुष चेतनाकाश-रूप ही है। यह जो आप पुरुषोत्तम बैठे हैं, चेतना-काशरूप ही हैं। मैं भी अजर-अमर चेतनाकाश ही हूँ
और ये तीनों लोक चेतनाकाश ही हैं । 'मैं अद्वितीय चिन्मात्र ब्रह्म ही हूँ । ये शरीर आदि मेरे नहीं हैं।' जब ऐसा बोध प्राप्त हो जाता है, तब जन्म-मरण आदि अनर्थ कहाँ रह सकते हैं ? मैं 'चिन्मात्र निर्मल ब्रह्म हूँ।' इस आत्मानुभवको जो स्वयं ही कुतर्कोंद्वारा खण्डित करते हैं वे आत्महत्यारे हैं। उन्हें विपत्तियोंके महासागरमें डूबना पड़ता है। 'मैं आकाशसे भी स्वच्छ, नित्य अनन्त एवं निर्विकार चेतन हूँ, ऐसी दशामें क्या मेरा जीना, क्या मरना अथवा क्या सुख-दुःख भोगना है ? मैं परमाकाशस्वरूप चेतन ब्रह्म हूँ। ये शरीर आदि मेरे कौन होते हैं !' इस तरह विद्वानोंके द्वारा अन्त:करणमें किये गये अनुभवका जो कुतर्कोंद्वारा अपलाप या खण्डन करता है, वह पुरुष आत्मघाती है। उसे बारंबार धिक्कार है। 'मैं स्वच्छ चेतनाकाश हूँ।' जिस पुरुषका यह स्पष्ट अनुभव नष्ट हो गया हो, उसे विद्वान् पुरुष जीवित शव समझते हैं अर्थात् वह जीता हुआ भी मुर्देके समान है। 'मैं ज्ञानस्वरूप परब्रह्म परमात्मा हूँ। देह और इन्द्रियाँ मेरी कौन होती हैं।' इस प्रकार अपरोक्षज्ञानके द्वारा जिसने आत्माको उपलब्ध कर लिया है, अविद्या आदि मलोंसे रहित उस विशुद्ध पुरुषको मृत्यु आदि आपदाएँ विमोहित नहीं कर पातीं। जो शुद्ध चिन्मय परमात्माका आश्रय लेकर सुस्थिर हो गया है, उस महापुरुषको मानसिक चिन्ताएँ उसी तरह मोहित नहीं कर पाती हैं, जैसे महान् पत्थरको तुच्छ बाण । जिन पुरुषोंने अपने चिन्मय स्वभावको भुलाकर नश्वर शरीरपर ही आस्था बाँध रखी है, उन्होंने वास्तवमें सुवर्णको त्यागकर भस्मको ही सोना मानकर ग्रहण किया है । 'मैं देहरूप ही हूँ' इस भावनासे पुरुषके बल, बुद्धि और तेजका नाश हो जाता है तथा 'मैं चेतन आत्मा हूँ' इस दृढ़ निश्चयसे उसके बल, बुद्धि और तेजकी उत्तरोत्तर वृद्धि होती है । 'मैं न तो छेदा जाता हूँ और न जलाया ही जाता हूँ; क्योंकि मैं वज्रके समान सुदृढ़ चिन्मय परमात्मा हूँ । मेरी