भारतकोश
संक्षिप्त योगवासिष्ठ

संक्षिप्त योगवासिष्ठ

Sankshipt Yoga Vasistha

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

DevanagariHindipublished750 पृष्ठ

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६१४ * अविच्छिन्नचिदात्मैकः पुमानस्तीह नेतरत् * [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ ।

अपने चिन्मय स्वरूपमें ही नित्य स्थिति है। मैं देहाभिमानी नहीं हूँ।' जिस पुरुषको ऐसा निश्चय हो गया है, उसके लिये यमराज भी तृणके समान तुच्छ है। चेतनपुरुष इस जगत्में जिस-जिस वस्तुको जिस रूपसे देखता या समझता है, उस वस्तुका उसी रूपसे अनुभव करने लग जाता है। यह अनुभवसिद्ध बात है। इसलिये ये सब पदार्थ विषामृत (विषको अमृत-) दृष्टिसे देखे गयेके समान स्थित हैं। अतः कोई भी वस्तु चेतन आत्मासे भिन्न नहीं है, यह बात पूर्णतः सिद्ध हो चुकी है।

(सर्ग ९४—९६)


परमपदके विषयमें विभिन्न मतवादियोंके कथनकी सत्यताका प्रतिपादन

श्रीवसिष्ठजी कहते हैं—रघुनन्दन ! 'यह जगत् परमात्माका स्वप्न है, इसलिये चिन्मय है, ब्रह्माकाशरूप है, अतः सब कुछ ब्रह्म ही है।' इस दृष्टिसे सबको सत्य जगत्का ही अनुभव होता है, असत्यका नहीं। 'पुरुष चिन्मय एवं अकर्ता है। अव्यक्त प्रकृतिसे महत्तत्त्व आदि-के क्रमसे इस जगत्की उत्पत्ति होती है।' ऐसी दृष्टि रखनेवाले आचार्य महानुभावोंके मतको भी सत्य ही समझना चाहिये; क्योंकि इस भावका चिन्तन करनेसे ऐसा ही अनुभव होता है। 'यह सारा दृश्य ब्रह्मका विवर्त है—ब्रह्म ही इस दृश्यजगत्के रूपमें भासित हो रहा है' ऐसी बातें कहनेवाले महापुरुषोंका मत भी सत्य ही है; क्योंकि इस तरह आलोचना करनेपर इसी रूपमें समस्त पदार्थोंका अनुभव होता है। इसी प्रकार जो लोग 'सम्पूर्ण जगत्को परमाणुओंका समूहरूप' ही मानते हैं, उनका वह मत भी सत्य ही है; क्योंकि उन्हें जिस-जिस पदार्थके विषयमें जैसा-जैसा अनुभव हुआ, उस-उस अनुभवके अनुसार की गयी उनकी कल्पना भी ठीक ही है। 'इस लोक या परलोकमें जो कुछ जैसा देखा गया है, वह वैसा ही है। उसे न सत् कह सकते हैं, न असत्। वास्तविक तत्त्व इन दोनोंसे विलक्षण एवं अनिर्वचनीय है।' इस तरहका जो प्रौढ आध्यात्मिक मत है, वह भी सत्य ही है; क्योंकि वे वैसा ही अनुभव करते हैं। कुछ लोगोंका कहना है कि 'बाह्य—पृथ्वी आदि चार भूतोंका समुदाय ही जगत् है। इससे भिन्न अन्तर्यामी आत्माकी सत्ता नहीं है।' ऐसा कहनेवाले जो नास्तिक हैं परंतु वे भी अपनी दृष्टिसे ठीक ही कहते हैं; क्योंकि वे इन्द्रियातीत आत्माको अपने स्थूल देहमें ही ढूँढ़ते हैं, परंतु उसे पाते नहीं हैं। क्षणिक विज्ञानवादी जो 'प्रत्येक पदार्थको क्षणभङ्गुर' बताते हैं, उनका वह मत भी युक्ति-संगत ही है; क्योंकि सभी पदार्थोंका निरन्तर परिवर्तन एवं उलट-फेर देखनेमें आता है।

परमपद सम्पूर्ण शक्तियोंसे युक्त है। इसलिये उसके विषयमें जो जैसा कहता है, वह सभी सम्भव है। 'जैसे घड़ेके भीतर बंद हुआ गौरैया घड़ेका मुँह खोल देनेपर उड़कर बाहर चला जाता है, वैसे ही देहके भीतर बंद और देहके बराबर आकारवाला जीव कर्मक्षय हो जानेपर उड़कर परलोकमें चला जाता है।' इस मतको माननेवाले लोगोंकी कल्पना भी उनके मतानुसार ठीक है। इसी तरह म्लेच्छोंका यह मत है कि 'जीव देहके बराबर ही बड़ा है। उसे ईश्वरने उत्पन्न किया है। जहाँ शरीर गाड़ा जाता है, वह वहीं रहता है। ईश्वर कालान्तरमें उसके विषयमें विचार करते हैं। तब उन्हीं-की इच्छासे उसकी मुक्ति होती है अथवा वह स्वर्ग या नरकमें डाला जाता है।' आत्मसिद्धिके लिये की हुई म्लेच्छोंकी यह कल्पना उनके भावके अनुसार ठीक कही जा सकती है और उनके देशोंमें वह दूषित नहीं मानी जाती है। जो संत महात्मा हैं, वे 'ब्राह्मण, अग्नि, विष, अमृत, मरण और जन्म आदिमें भी समभाव' रखते हैं। यह भी ठीक ही है; क्योंकि विभिन्न विचारधाराके विद्वानोंका जो मत है, वह सब सर्वात्मा ब्रह्मसे भिन्न नहीं है।