सत्यार्थ प्रकाश (महर्षि स्वामी दयानन्द सरस्वती विरचित)
Satyarth Prakash - Swami Dayananda Saraswati
महर्षि स्वामी दयानन्द सरस्वती द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसप्तमसमुल्लासः १५१
आता और कभी पापाचरण नहीं करता, जिस में क्लेश, दुःख, अज्ञान कभी नहीं होता, इत्यादि जिस-जिस राग, द्वेषादि गुणों से पृथक् मानकर परमेश्वर की स्तुति करना है वह निर्गुण स्तुति है। इस से फल यह है कि जैसे परमेश्वर के गुण हैं वैसे गुण, कर्म, स्वभाव अपने भी करना। जैसे वह न्यायकारी है तो आप भी न्यायकारी होवे। और जो केवल भांड के समान परमेश्वर के गुणकीर्त्तन करता जाता और अपने चरित्र नहीं सुधारता उसका स्तुति करना व्यर्थ है। प्रार्थना—
यां॒ मे॒धां दे॑वग॒णाः पि॒तर॑श्चो॒पास॑ते।
तया॒ माम॒द्य मे॒धयाग्ने॑ मे॒धावि॑नं कुरु॒ स्वाहा॑ ॥१॥
—यजु० अ० ३२। मं० १४॥
तेजो॑ऽसि॒ तेजो॒ मयि॑ धेहि। वी॒र्य॑मसि वी॒र्यं॒ मयि॑ धेहि।
बल॑मसि॒ बलं॒ मयि॑ धेहि। ओजो॑ऽस्योजो॒ मयि॑ धेहि।
म॒न्युर॑सि म॒न्युं मयि॑ धेहि। सहो॑ऽसि॒ सहो॒ मयि॑ धेहि ॥२॥
—यजुः अ० १९। मं० ९॥
यज्जाग्र॑तो दू॒रमुदैति॒ दैवं॒ तदु॑ सु॒प्तस्य॒ तथैवैति॑।
दू॒र॒ङ्गमं ज्योति॑षां॒ ज्योति॒रेकं॒ तन्मे॒ मनः॑ शि॒वस॑ङ्कल्पमस्तु ॥३॥
येन॒ कर्म्मा॑ण्य॒पसो॑ मनी॒षिणो॑ य॒ज्ञे कृ॒ण्वन्ति॑ वि॒दथे॑षु धीराः॑।
यद॑पू॒र्वं य॒क्षम॒न्तः प्र॒जानां॒ तन्मे॒ मनः॑ शि॒वस॑ङ्कल्पमस्तु ॥४॥
यत्प्र॒ज्ञान॑मु॒त चेतो॒ धृति॑श्च॒ यज्ज्योति॑र॒न्तर॒मृतं॑ प्र॒जासु॑।
यस्मा॑न्नऽऋ॒ते किञ्च॒न कर्म॑ क्रि॒यते॒ तन्मे॒ मनः॑ शि॒वस॑ङ्कल्पमस्तु ॥५॥
येने॒दं भू॒तं भुवनं॑ भवि॒ष्यत्परि॑गृहीतम॒मृते॑न॒ सर्व॑म्।
येन॑ य॒ज्ञस्ता॒यते॑ स॒प्त होता॒ तन्मे॒ मनः॑ शि॒वस॑ङ्कल्पमस्तु ॥६॥
यस्मि॒न्नृचः॒ साम॒ यजूँ॑षि॒ यस्मि॒न्प्रति॑ष्ठिता रथ॒नाभा॑वि॒वाराः॑।
यस्मिँ॑श्चि॒त्तꣳ सर्व॒मोतं॑ प्र॒जानां॒ तन्मे॒ मनः॑ शि॒वस॑ङ्कल्पमस्तु ॥७॥
सु॒षा॒र॒थिरश्वा॑नि॒व यन्म॑नु॒ष्यान्नेनी॑यते॒ऽभीशु॑भिर्वा॒जिन॑ऽइव।
हृ॒त्प्रति॑ष्ठं॒ यद॒जिरं॒ जवि॑ष्ठं॒ तन्मे॒ मनः॑ शि॒वस॑ङ्कल्पमस्तु ॥८॥
—यजु० अ० ३४। मं० १। २। ३। ४। ५। ६॥
हे अग्ने! अर्थात् प्रकाशस्वरूप परमेश्वर आप की कृपा से जिस बुद्धि की उपासना विद्वान्, ज्ञानी और योगी लोग करते हैं उसी बुद्धि से युक्त हम को इसी वर्त्तमान समय में आप बुद्धिमान् कीजिये ॥ १ ॥
आप प्रकाशस्वरूप हैं कृपा कर मुझ में भी प्रकाश स्थापन कीजिये। आप अनन्त पराक्रम युक्त हैं इसलिये मुझ में भी कृपाकटाक्ष से पूर्ण पराक्रम धरिये। आप अनन्त बलयुक्त हैं इसलिये मुझ में भी बल धारण कीजिये। आप अनन्त