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शारदा तिलक तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)

Sharada Tilak Tantra with Hindi Commentary

by लक्ष्मण देशिकेन्द्र / चमन लाल गौतम

Source: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली · 1950 (origin)

DevanagariSanskritpublished511 pages
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एकविंश पटल ] [ ५०१ क्षीरद्रुमाणामाज्येन विषान्नंघृतान्वितैः । चतुश्चत्वारिंशदाढ्यं चतुःशतसमन्वितम् ॥४३ चतुःसहस्रं जुहुयादर्चिते हव्यवाहने । मण्डले सर्वतोभद्रे षट्कोणाङ्घ्रियकर्णिके ॥४४ विधिना वक्ष्यमाणेन पीठं देव्याः प्रपूजयेत् । जयाख्यं विजयां भद्रां भद्रकालीमन्तरम् ॥४५ सुमुखीं दुर्मुखीं संज्ञां पश्चाद्व्याघ्रमुखी पुनः । अथ सिंहमुखीं दुर्गा, नव शक्ताः प्रपूजयेत् ॥४६ आसनं सिंहमन्त्रेण दद्यादुक्तेन देशिकः । मूर्ति सङ्कल्प्य मूलेन तस्यामावाह्य पूजयेत् ॥४७ षडङ्गानि यथापूर्वं केसरेष्वर्चयेत्सुधीः । अग्न्यादिपादाष्टकोत्पन्ना मर्तयोऽर्च्य बहिः पुनः ॥४८ जातवेदाः सप्त जिह्वो हव्यवाहनसंज्ञकः । अश्वोदरजसंज्ञोऽन्यः पुनर्वैश्वानराह्वयः ।४६ कौमारतेजाः स्याद्विश्वमुखो देवमुखं स्मृतः । ततो भूसलिलाग्नीरानात्मनेऽन्तान्नमोन्वितान् ।५० जिन वृक्षों में टहनी तोड़नेसे दूध निकला करता है वे क्षीर-द्रुम कहे जाते हैं। इनकी ही समिधाओं से, घृत से, हवि से, और घृत से अन्वित अन्नों से चार हजार चार सौ चौआलीस आहुतियाँ समचित अग्नि में देनी चाहिये। सर्वतोभद्र मण्डल में छै कोणों से समन्वित कर्णिका के मध्य में आगे कही जाने वाली विधि से देवी के पीठ की पूजा करनी चाहिये। फिर नौ शक्तियों का अर्चन करे। उन शक्तियों के ये नाम हैं—जया, विजया, भद्रा, भद्रकाली, सुमुखी, दुर्मुखी, व्याघ्र- मुखी, सिंहमुखी और दुर्गा ये नौ हैं ।४३-४६। फिर आचार्य सिंह मन्त्र के द्वारा जो कहा जा चुका है आसन देवे। फिर मूल मन्त्र के द्वारा भली भाँति कल्पना करके उसी मूर्त्तिमें देवी का आह्वान करके उसका

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५०२ ] [ श्रीशारदा तिलक अर्चन करे ।४७। सुधी पुरुष छ अङ्गों का केसरों में जैसा कि पूर्व में बताया जा चुका है अर्चन करे। अग्नि आदि पादाष्टक से समुत्पन्न मूर्त्तियां फिर बारह पूजनी चाहिये ।४८। अब उन मूर्तियों को बताया जाता है-जातवेदा, सप्तजिह्वा हव्यवाहन, अश्वोदरज, वैश्वानर, कौमार तेजा, विश्वमुख, देवमुख ये उनके नाम कहे गये हैं। फिर भू सलिल अग्नि रानात्मा के लिये जो अन्त में नमः—इस पद से समन्वित होवें ।४६-५०। चतुर्दिक्षु समभ्यर्चेत्कोणेषु तत्कलाः पुनः । पूर्वादिदिक्षु सम्पूज्या जार्णाद्या वर्णशक्तयः ।५१ जाग्रता तपनी वेदगर्भा दहनरूपिणी । सेन्दुखण्डा शुम्भहन्त्री नभश्चारिण्यनन्तरम् ।५२ वागीश्वरी मद्वहा सोमरूपा मनोजवा । मरुद्वेगा रात्रिसंख्या तोन्नकोया यशोवती ५३ तोयात्मिका पुनर्गन्तव्या दयावत्यपि हारिणी । तिरस्क्रिया वेदमाता तत्परा मदनप्रिया ।५४ समाराध्या नन्दिनी च परा रिपुविमर्दिनी । षष्ठी च दण्डिनी तिग्मा दुर्गा गायत्र्यनन्तरम् ।५५ निरवद्या विशालाक्षी श्वापोद्वाहा वनादिनी । वंदना वह्निगर्भाख्या सिंहवाहाह्वया तथा ।५६ धुर्या दुर्विषहा पश्चाद्गिरिसा तापहारिणी । त्यक्तदोषा निस्सरन्ता चत्वारिंशच्चतुर्युता ।५७ फिर चारों दिशाओंमें समभ्यर्चन करे और फिर उनके कोणोंमें उनकी कलाओं का यजन करना चाहिये । पूर्वं आदि दिशाओंमें जार्णाद्य वर्ण शक्तियों का पूजन करे ।५१। ये संख्या में चौवालीस हैं—उनके नामों को अब बताया जाता है—जाग्रता, तपनी, वेदगर्भा, दहन रूपिणी, सेन्दुखण्डा, शुम्भहन्त्री, नभच्चारिणी, वागीश्वरी, मद्वहा, सोम

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एकविंश पटल ] { ५०३ रूपा, मनोजवा, मरुद्वेगा, रात्रिसंख्या, तीव्रकोपा, यशोवती ।५२-५३। तोयात्मिका, नित्या, दयावती, हारिणी, तिरस्कृता, वेदमाता, तत्परा, मदनप्रिया, समाराध्या, नन्दिनी, परा, रिपुविमर्दिनी, षष्ठी, दण्डिनी, तिग्मा, दुर्गा, गायत्री ।५४-५५। निरवद्या, विशालाक्षी, श्वासोद्ग्राहा, वनादिनी, वेदना, वह्निगर्भा, सिंहवाहा, धुर्या, दुर्विपहा, अङ्गिरसा, तापहारिणी, त्यक्तदोषा, निस्सपत्ना ये चोआलीस नाम वाली हूँ ।५६-५७। लोकपालांस्ततोऽभ्यर्चेद्वज्रराद्यायुधसंयुतान्। इत्थं जपादिभिः सिद्धे मन्त्रेऽस्मिन्साधकोत्तमः ।५८ आग्नेयास्त्राधिकारी स्यात्तद्विधानमुदीर्यते । आग्नेयास्त्रमिति प्रोक्त विलोमपठितो मनुः ।५६ पूर्वोक्ता एवमुत्पाद्या मन्त्रस्यास्य प्रकीर्तिताः । प्रतिलोमक्रम। दस्य षडङ्गानि प्रकल्पयेत् ।६० वर्णन्यासपदन्यासौ विदध्यात्प्रतिलोमतः । ध्यानभेदान्विजानीयाद् गूर्वादेशान्नचान्यथा ।६१ पूर्ववज्जपक्लृप्तिः स्याज्जहुयात्पूसंख्यया । पञ्चगव्यसुपक्वेन चरुणा तस्य सिद्धये ।६२ इसके अनन्तर वज्रादि आयुधों के सहित लोक पालों का अर्चन करना चाहिये । इस प्रकार से जप-अर्चन-हवन और न्यास आदि के द्वारा इस मन्त्र के सिद्ध हो जाने पर साधना करने वालों में परम श्रेष्ठ पुरुष आग्नेय अस्त्र का अधिकारी हो जाया करता है । अब उसका विधान भी कहा जाता है। विलोम से पढ़ा हुआ मन्त्र ही आग्नेयास्त्र है—यह कहा गया है ।५८-५९। पूर्वमें कहे हुये ही इस प्रकारसे उत्पादन करने के योग्य हैं जो इस मन्त्र के विषयमें कहे गये हैं। इसके प्रतिलोम के क्रम से ही अङ्गों की कल्पना कर लेनी चाहिये ।३०। प्रतिलोम से ही वर्णों का न्यास और पदोंका न्यास करे । ध्यानके भेदों को गुरुदेव आदि

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५०४ ] [ श्रीशारदा तिलक के आदेश से ही जानना चाहिये अन्य किसी भी प्रकार से न करे।६१। पूर्व की ही भाँति जप की कल्पना करे और पूर्व की ही भाँति होम की भी संख्या की कल्पना कर लेवे । पञ्चगव्य से सुन्दर रीति से पकाये हुये चरु से ही उसकी सिद्धि के लिये होम करें ।६२। ओदाय सारमखिलं निखिलागमेभ्यः । श्रीशारदातिलकनाम चकार तन्त्रम् । प्राज्ञः स एव पटलैरिहतावसंख्यैः प्रीतिप्रदानविधये विदुषां चिराय ।६३ अनाद्यन्ता सम्भोर्वपुषि कलिताद्धेन वपुषा । जगद्रूपं शश्वत्सृजति महनीयामपि गिरम् ।६४ सदर्था शब्दार्थस्तमटनता शङ्करवधू- र्भवद्भूयाद्भवजनितदुःखौघशमनी ।६५ समस्त आगमों से सार वस्तु का ग्रहण करके ही इस शारदा तिलक नामक तन्त्र ग्रन्थ की रचना की गई है। यह तत्व संख्यक पटलों से युक्त विद्वान् पुरुष ने समस्त विद्वानों की प्रीति के विधान के लिये ही चिर काल तक जो रहेगी, इसकी रचना की है। ६३। भगवान् शम्भु के शरीर में अपने अर्ध वपु से कलित और आदि तथा अन्त से रहित निर- न्तर इस जगत् के रूप का तथा महा महनीय वाणी का सृजन किया करती है, वही शंकर-प्रिया भगवती सबका कल्याण और दुःखों का शमन करें । ६४।

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अ. भा. ओंकार परिवार की स्थापना ✦✦★✦✦ ॐ परमात्मा का सर्वश्रेष्ठ व स्वाभाविक नाम है। इसे मन्त्र शिरोमणि, मन्त्र सम्राट, मन्त्र राज, बीजमन्त्र और मन्त्रों का सेतु आदि उपाधियों से विभूषित किया जाता है। इसे श्रेष्ठतम् महानतम् और पवित्रतम् मन्त्र की संज्ञा भी दी जाती है। सारे विश्व में इसकी तुलना का कोई मन्त्र नहीं है। ॐ सभी मन्त्रों को अपनी शक्ति से भावित करता हैं। सभी मन्त्रों की शक्ति ओंकार की ही शक्ति है। यह शक्ति और सिद्धिदाता है। भौतिक व आत्मिक उत्थान के लिये कोई भी दूसरी श्रेष्ठ व सरल साधना नहीं है। सभी ऋषिमुनि ॐ की शक्ति और साधना से ही अपना आत्मिक उत्थान करते रहे हैं। परन्तु आज आश्चर्य है कि ॐ का अन्य मन्त्रों की तरह व्यापक प्रचार नहीं है। इस कमी का अनुभव करते हुए अ० भा० ओंकार परिवार की स्थापना की गई है। आप भी अपने यहाँ इसका एक प्रचार केन्द्र स्थापित करें। शाखा स्थापना का सारा साहित्य निःशुल्क रूप से प्रधान कार्यालय, बरेली से मँगवा लें, आपको केवल इतना करना है कि स्वयं ओंकारोपासना आरम्भ करके ४ अन्य मित्रों व सम्बन्धियों को प्रेरित करें और सभी सङ्कल्प पत्र व शाखा स्थापना का प्रार्थना पत्र प्रधान कार्यालय को भिजवा दें। इस वर्ष २७००० साधकों द्वारा ६०० करोड़ मन्त्रों के जप का महापुरश्चरण पूर्ण किया जाना है। आशा है ओंकार को जन-जन का मन्त्र बनाने के इस श्रेष्ठतम् आध्यात्मिक महायज्ञ में सम्मिलित होकर महान् पुण्य के भागी बनेंगे। विनीत :— संस्कृति संस्थान चमनलाल गौतम ख्वाजाकुतुब, वेदनगर, बरेली-२४३००३ (.उ प्र.)

प्रकाशन और व्यापक साहित्य प्रचार का कार्य देश विदेश में करता रहा है ।

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एक मौन व्यक्तित्व का मौन समर्पण ❖✦✦❖ डा० चमनलाल गौतम-एक व्यक्ति का नहीं वरन् ऐसे विशाल धार्मिक सस्थान का नाम है जो सतत् २४ वर्षों से ऋषि प्रणीत आर्ष साहित्य के शोध, प्रकाशन और व्यापक साहित्य प्रचार का कार्य देश विदेश में करता रहा है । यह उनकी तप साधना का ही परिणाम है कि किसी भी आर्थिक सहयोग के बिना वेद, उपनिषद्, दर्शन, स्मृतियां, पुराण व मन्त्र-तन्त्र आदि साधनात्मक साहित्य की ३०० से अधिक पुस्तकों को प्रकाशित करके घर-घर में पहुँचाने की पवित्रतम साधना कर रहे हैं । मन्त्र-तन्त्र, योग, वेदान्त व अन्य धार्मिक विषयों पर १५० खोज पूर्ण ग्रन्थों का लेखन, सम्पादन एक ऐसा अविस्मरणीय व असाधारण कार्य है जिस पर उनके अथक श्रम, गम्भीर अध्ययन, तप, प्रतिभा और मौलिक सूझ-बूझ की स्पष्ट छाप दिखाई देती है । स्वस्थ साहित्य की रचना और प्रचार का उनकी जीवन योजना का यह पहला चरण पूरा हुआ । पिछले २४ वर्षों से लगातार चल रही अध्यात्मिक साधना के महापुरश्चरण का दूसरा चरण भी समाप्त हो रहा है । तीसरे चरण- आध्यात्मिक साधनाओं और अनुभूतियों के विश्वव्यापी विस्तार का शुभारम्भ अ० भा० ओंकार परिवार की स्थापना के साथ बसन्तपञ्चमी की परम पवित्र बेला के साथ हो गया है । अतः उनका शेष जीवन तीसरे चरण की सफलता, ओंकार परिवार की शाखाओं के व्यापक विस्तार के माध्यम से करोड़ों व्यक्तियों को ओंकार साधना में प्रविष्ट करके उच्च आध्यात्मिक भूमिका में प्रशस्त करना, ओंकार अथवा उच्च आध्यात्मिक साहित्य की रचना व प्रचार-प्रसार को समर्पित है । स्वामी सत्य भक्त

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प्रकाशक :-संस्कृति संस्थान, ख्वाजा कुतुब वेदनगर,

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भारतीय संस्कृति के श्रेष्ठतम धर्म-ग्रन्थ १—ऋग्वेद ४ खण्ड ... ३८) २—अथर्व वेद २ खण्ड ... १६) ३—यजुर्वेद ... ६)५० ४—सामवेद ... ८)५० ५—वेद महाविज्ञान ... १२) ६—शतपथ ब्राह्मण ... १२) ७—१०८ उपनिषद् ३ खण्ड ... ३३) ८—उपनिषद् रहस्य ... ६)५० ९—बृहदारण्यकोपनिषद् ... ४)५० १०—छान्दोग्योपनिषद् ... ४)५० ११—वैशेषिक दर्शन ... ६)२५ १२—न्याय दर्शन ... ६)७५ १३—सांख्य दर्शन ... ६)२५ १४—योग दर्शन ... ६)७५ १५—वेदान्त दर्शन ... ७)५० १६—मीमांसा दर्शन ... ६) १७—२० स्मृतियां २ खण्ड ... २२) १८—मनुस्मृति ... ११) १९—योग वासिष्ठ २ खण्ड ... २७) २०—ब्रह्म सूत्र ... १२)५० २१—पञ्चदशी ... १४) २२—विचार सागर ... १४) २३—विचार चन्द्रोदय ... ३) २४—पञ्चीकरण ... ४) २५—उपदेश साहस्त्री ... ८)२५ २६—वृत्ति प्रभाकर ... १०) २७—सौन्दर्य लहरी ... ७) प्रकाशक :-संस्कृति संस्थान, ख्वाजा कुतुब वेदनगर, बरेली-२४३००३ (उ०प्र०)