भारतकोश
शार्ङ्गधर संहिता (दीपिका टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)

शार्ङ्गधर संहिता (दीपिका टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)

Sharangadhara Samhita with Dipika Hindi Commentary

शार्ङ्गधराचार्य द्वारा

स्रोत: चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन · चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished356 पृष्ठ

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(vi) अपना परिचय दिया है, तदनुसार वे दामोदरसूनु तो अवश्य हैं, परन्तु वे आयुर्वेदज्ञ नहीं हैं, अपितु वे 'कविकरीन्द्रकदम्बमृगाधिपः' हैं। पद्धति के रचयिता शार्ङ्गधर का परिचय इस प्रकार है-शाकम्भरी देश में चौहान-वंशीय हमीर-नरेश के राजगुरु राघवदेव थे। इनके पुत्र दामोदर और उनके पुत्र शार्ङ्गधर थे। हिन्दी में सुप्रसिद्ध एक काव्य 'हम्मीररासो' है। इसके रचयिता भी 'शार्ङ्गधर' हैं। सम्भवतः ये दोनों एक ही रहे हों। रणथंभौर के राणा 'हमीरदेव' पर अलाउद्दीन खिलजी ने 1299 ई० में आक्रमण किया था और 1301 ई० में उसे जीतकर उसके राज्य पर अधिकार कर लिया था। इस प्रकार हमीरनरेश के गुरु राघवदेव के पौत्र, पद्धतिकार शार्ङ्गधर का समय 14वीं शती सिद्ध होता है। प्रस्तुत संहिताकार का समय निश्चय ही पद्धतिकार से प्राचीन प्रतीत होता है। क्योंकि शार्ङ्गधरसंहिता पर सर्वप्रथम 13वीं शती के अन्त में तथा 14वीं शती के आरम्भ में स्थित श्रीबोपदेव ने टीका लिखी थी तथा 13-14वीं शती में स्थित हेमाद्रि ने इस प्रसंग को उद्धृत किया है। इस दृष्टि से संहिताकार शार्ङ्गधर को तेरहवीं शती के पूर्वार्ध का स्वीकार करना ही उचित प्रतीत होता है। 'शार्ङ्गधरसंहिता' की रचनाशैली प्रायः सोढल (12वीं शती) कृत 'गदनिग्रह' ग्रन्थ से मिलती-जुलती है। इससे यह प्रतीत होता है कि प्रस्तुत शार्ङ्गधरसंहिता का काल 13वीं शती का पूर्वार्ध ही रहा होगा। तेरहवीं शती में सोढल के पुत्र शार्ङ्गदेव हुए थे। ये उच्चकोटि के कवि, संगीतज्ञ तथा आयुर्वेदविद् थे। इन्होंने संगीतरत्नाकर, अध्यात्मविवेक आदि अनेक ग्रन्थों की रचना की। अध्यात्मविवेक ग्रन्थ में इन्होंने शरीरशास्त्र का विस्तृत विवेचन प्रस्तुत किया है। काल की इस समानता को देखकर शार्ङ्गदेव तथा शार्ङ्गधर को एक मानने का ऐतिहासिकों ने जो प्रयास किया है, उनके उक्त निर्णय में ये बाधक तत्त्व हैं-शार्ङ्गधर का दामोदरसूनु होना और शार्ङ्गदेव का सोढल-पुत्र होना। इतना होने पर भी कृतियों के आधार पर हमने इनका जो काल-निर्णय ऊपर बतलाया है, वह सुतरां विश्वसनीय है। शार्ङ्गधरसंहिता का मूलरूप-प्रस्तुत संहिता 2600 श्लोकों, 32 अध्यायों तथा तीन खण्डों (पूर्वखंड, मध्यमखंड, तथा उत्तरखंड) में विभक्त थी। इस तथ्य की सूचना ग्रन्थकार ने इसके पूर्वखंड में इस प्रकार दी है- द्वात्रिंशत् सम्मिताध्यायैर्युक्तेयं संहिता स्मृता। षड्विंशतिशतान्यत्र श्लोकानां गणितानि च।। 1.13 किन्तु खेद है, कि आज उपलब्ध होने वाले शार्ङ्गधरसंहिता के किसी भी संस्करण में 2600 श्लोकों के दर्शन नहीं होते। ये श्लोक कब और कैसे लुप्त हुए, यह एक विचारणीय विषय है। सोलहवीं शताब्दी के पूर्वार्ध में प्रस्तुत संहिता पर टीका लिखते समय श्रीआढमल्ल तथा काशीरामजी वैद्य ने इसके केवल 2325 श्लोकों पर ही टीका लिखी थी। इस बात पर न किसी का ध्यान गया अथवा न किसी ने ध्यान ही देना चाहा। यदि किसी का ध्यान गया भी हो, तो उसका इसके पहले तक कोई परिणाम नहीं दिखलायी दिया। संस्कृत-टीकाकार-1. शार्ङ्गधरसंहिता पर विद्वानों ने अनेक टीकाएं लिखी हैं। उनमें सर्वप्रथम 'दीपिका' नामक संस्कृत टीका श्रीभावसिंह के पुत्र 'आढमल्ल' ने लिखी; इनका काल 12वीं शती है। ये हमीरपुर के निवासी थे। इनके पितामह चक्रपाणि तथा पिता भावसिंह थे। ये दोनों ही वैद्य थे। श्रीआढमल्ल चम्बल (चर्मण्वती) नदी के तीरवर्ती हस्तिकान्तपुरी के राजा श्रीजैत्रसिंह की सभा के मान्य सभासद थे। 2. बोपदेव कृत 'गूढार्थदीपिका' टीका (देखें-वेडर्स कैटलाग ऑफ बर्लिन, 1853 जुलाई), 3. शार्ङ्गधर-शारीर टीका। 4. पं० काशीरामजी कृत शार्ङ्गधरसंहिता की 'गूढार्थ- दीपिका' टीका। ये भारद्वाजगोत्रीय सारस्वत ब्राह्मण थे। आपने विक्रम संवत् 1605 के आस-पास शाहसलीम के राज्य में रहकर उक्त टीका का निर्माण किया। 5. श्रीरुद्रट भट्ट कृत 'आयुर्वेददीपिका' टीका। इनके पिता का नाम श्रीकोनेरी भट्ट था। ये अब्दुलरहीम खानखाना (1557-1630 ई०) के राजवैद्य थे। हिन्दी टीकाकार-1. श्रीबैजनाथ सारस्वत कृत 'शार्ङ्गधर-सुधाकर' नामक पद्यबद्ध अनुवाद। 2. कविराज प्रियमोहन सेन गुप्त द्वारा कृत टीका का बंगला संस्करण। 3. पं० परशुराम शास्त्री द्वारा सम्पादित प्रथम संस्करण, निर्णयसागर प्रेस, बम्बई द्वारा प्रकाशित। 4. पं० दत्तराम चौबे, मथुरा। 5. पं० रामप्रसाद वैद्यरत्न, पटियाला। 6. बेरी निवासी बस्तीराम जी, रोहतक। 7. पं० हरदयालु जी वाचस्पति, लाहौर। 8. पं० रामेश्वर भट्ट, वाराणसी। 9. आयुर्वेदाचार्य पं० प्रयागदत्त शर्मा कृत 'सुबोधिनी' टीका