भारतकोश
शार्ङ्गधर संहिता (दीपिका टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)

शार्ङ्गधर संहिता (दीपिका टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)

Sharangadhara Samhita with Dipika Hindi Commentary

शार्ङ्गधराचार्य द्वारा

स्रोत: चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन · चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished356 पृष्ठ

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94 शार्ङ्गधरसंहिता [ मध्यमखण्डे किरातादि क्वाथ कैरातकटुकीमुस्ताधान्येन्द्रयवनागरैः । दशमूलमहादारुगजपिप्पलिकायुतैः ॥ ४१ ॥ कृतः कषायः पार्श्वार्त्तिसन्निपातज्वरं जयेत्। कासश्वासवमीहिक्कातन्द्राहृद्ग्रहनाशनः ॥ ४२ ॥ चिरायता, कुटकी, नागरमोथा, धनियाँ, इन्द्रजौ, सोंठ, दशमूल (प्रसिद्ध दस द्रव्य), देवदारु तथा गजपीपल, इनका काढ़ा पसली की पीड़ा प्रधान सन्निपात (निमोनिया) ज्वर को जीतता है। कास, श्वास, कै, हिचकी, तन्द्रा और हृद्ग्रह (हृदय की गति के रुकावट) को नष्ट करता है। वक्तव्य-उक्त क्वाथ में अठारह द्रव्य हैं, अतः इसका नाम 'अष्टादशाङ्ग क्वाथ' भी है। कट्फलादि क्वाथ कट्फलाम्बुदभार्ङ्गीभिर्धान्यरोहिषपर्पटैः । वचाहरीतकीशृङ्गीदेवदारुमहौषधैः ॥ ४३ ॥ हिक्कां कासं ज्वरं हन्ति श्वासश्लेष्मगलग्रहान्। कायफल का छिलका, नागरमोथा, भारंगी, धनियाँ, रोहिषतृण, पित्तपापड़ा, वच, बड़ी हरड़, काकड़ासिंगी, देवदारु तथा सोंठ का काढ़ा, हिचकी, कास, ज्वर, श्वास, कफ एवं गलग्रह (गले की रुकावट) को नष्ट करता है। गुडूची क्वाथ क्वाथो जीर्णज्वरं हन्ति गुडूच्याः पिप्पलीयुतः ।। ४४ ।। तथा पर्पटजः क्वाथः पित्तज्वरहरः परः । किं पुनर्यदि युज्येत चन्दनोदीच्यनागरैः ।। ४५ ।। गिलोय का काढ़ा पीपल के चूर्ण से युक्त पीने से जीर्ण (पुराने अथवा इक्कीस दिन के बाद भी रहने वाले) को नष्ट करता है। उसी प्रकार पित्तपापड़े का क्वाथ भी पित्तज्वरनाशक क्वाथों में उत्तम है। यदि उसमें सफेद चन्दन, नेत्रबाला और सोंठ मिला दी जाये तो यह और भी उत्तम हो जाता है। निदिग्धिकादि क्वाथ निदिग्धिकामृताशुण्ठीकषायं पाययेद् भिषक् । पिप्पलीचूर्णसंयुक्तं श्वासकासार्दितापहम् ।। ४६ ।। पीनसारुचिवैस्वर्यशूलाजीर्णज्वरच्छिदम् । कण्टकारी, गिलोय और सोंठ का काढ़ा पीपल का चूर्ण मिलाकर पीने से श्वास, कास और अर्दित (लकवा) को नष्ट करता है। पीनस (जुकाम) अरुचि, स्वरभेद, शूल, अजीर्ण (अनपच) तथा ज्वर को नष्ट करता है। देवदार्वादि क्वाथ (देवदारु वचा कुष्ठं पिप्पली विश्वभेषजम् ।। ४७ ।। कट्फलं मुस्तभूनिम्बतिक्तधान्य हरीतकी । गजकृष्णा च दुःस्पर्शा गोक्षुरूर्ध्वव्यासकम् ।। ४८ ।। बृहत्यतिविषा छिन्ना कर्कटं कृष्णजीरकम् । क्वाथमष्टावशेषं तु प्रसूतां पाययेत् स्त्रियम् ।। ४९ ।। शूलकासज्वरश्वासमूर्च्छाकम्पशिरोर्तिजित् ।) देवदारु, वच, कूट, पीपल, सोंठ, कायफल, नागरमोथा, चिरायता, कुटकी, धनियाँ, बड़ी हरड़, गजपीपल, जवासा, गोखरू, धमासा, बनभण्टा, अतीस, गिलोय, काकड़ासिंगी तथा कालाजीरा का आठवाँ भाग शेष रहा हुआ क्वाथ प्रसूता स्त्री को पिलाना चाहिये। यह काढ़ा उसके शूल, कास, ज्वर, श्वास, मूर्च्छा, कम्प तथा सिर की पीड़ा को शान्त करता है। वक्तव्य-यह क्वाथ हिस्टीरिया में भी बहुत लाभप्रद प्रमाणित हुआ है। क्षुद्रादि क्वाथ क्षुद्राधान्यकशुण्ठीभिर्गुडूचीमुस्तपद्मकैः ।। ५० ।। रक्तचन्दनभूनिम्बपटोलवृषपौष्करैः । कटुकेन्द्रयवाऽरिष्टभार्ङ्गीपर्पटकैः समैः ।। ५१ ।। क्वाथं प्रातर्निषेवेत सर्वशीतज्वरच्छिदम् । कण्टकारी, धनियाँ, सोंठ, गिलोय, नागरमोथा, पद्माकाठ, लालचन्दन, परवल की पत्ती, अडूसा की पत्ती, पोहकरमूल, कुटकी, इन्द्रजौ, नीम की छाल, भारंगी तथा पित्तपापड़ा को समान भाग में लेकर काढ़ा बनाकर प्रातःकाल पीये। यह सभी शीतज्वरों (जड़ैया ज्वर या शीतपूर्वक विषम ज्वर) को नष्ट करता है। मुस्तादि क्वाथ मुस्तक्षुद्रामृताशुण्ठीधात्रीक्वाथः समाक्षिकः ।। ५२ ।। पिप्पलीचूर्णसंयुक्तो विषमज्वरनाशनः । नागरमोथा, भटकटैया, गिलोय, सोंठ और आँवला का काढ़ा शहद और पीपल का चूर्ण मिलाकर पीने से विषमज्वर को नष्ट करता है। पतोलादि क्वाथ पटोलेन्द्रयवादारुत्रिफलामुस्तगोस्तनैः ।। ५३ ।। मधुकामृतवासानां क्वाथं क्षौद्रयुतं पिबेत् । सन्तते सतते चैव द्वितीयकतृतीयके ।। ५४ ।। ऐकाहिके वा विषमे दाहपूर्वे नवज्वरे ।