भारतकोश
शार्ङ्गधर संहिता (दीपिका टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)

शार्ङ्गधर संहिता (दीपिका टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)

Sharangadhara Samhita with Dipika Hindi Commentary

शार्ङ्गधराचार्य द्वारा

स्रोत: चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन · चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished356 पृष्ठ

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पृष्ठ 155

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षष्ठोऽध्यायः] चूर्णकल्पना 119 चतुर्लवण (सेंधा, सोंचर, विड तथा समुद्र नमक) और पञ्चलवण (सेंधा, सोंचर, विड, समुद्र तथा साँभर नमक) कहे जाते हैं। इन सभी में सेंधा नमक प्रधान माना जाता है। अतः जहाँ पर केवल 'लवण' शब्द का प्रयोग हो वहाँ सेंधा नमक का प्रयोग करना चाहिये। सैन्धव से रोमक या साँभर नमक पर्यन्त लवणों का नाम 'लवणपञ्चक' है। उक्त लवण मधुर (स्वादिष्ट या रुचिकर) होते हैं, मल तथा मूत्र को निकालने वाला स्निग्ध और सूक्ष्म है, बलनाशक है, उष्ण (गर्म) है, दीपन है, तीक्ष्ण है तथा कफ और पित्त को बढ़ाता है। वक्तव्य-सैन्धव लवण खान से, सोंचर नमक मण्डी नामक पहाड़ से, समुद्र लवण समुद्र के जल से, गडनमक (साँभर) राजपूताना की साम्भर झील से निकाला जाता है और विड नमक गंधप्रसारणी नामक लता का क्षार है। भारत में लवण मूलतः चार स्रोतों से प्राप्त होता है-1. सैन्धव (Rock Salt), 2. सामुद्र (Sea water), 3. ताड़ाग (Brine) तथा 4. भौम (Saline efflorescence)। इनमें सामुद्र लवण का ही अधिक उपयोग होता है। लवण भोजन का एक उपयोगी पदार्थ है, किन्तु इसका अधिक प्रयोग हानिकर होता है। देखें-च० वि० अ० 1।

क्षारद्वय चूर्ण स्वर्जिका यावशूकश्च क्षारयुग्ममुदाहृतम् । ज्ञेयौ वह्निसमौ क्षारौ स्वर्जिकायावशूकजौ ॥ 25 ॥ क्षाराश्चान्येऽपि गुल्मार्शोग्रहणीरुक्छिद्ः सराः । पाचनाः कृमिपुंस्त्वघ्नाः शर्कराश्मरिनाशनाः ॥ 26 ॥ सज्जीखार तथा जौखार इन दोनों को 'क्षारयुग्म' या 'क्षारद्वय' कहा जाता है। उक्त दोनों क्षार अग्नि के समान (दाहक तथा पाचक) होते हैं और दूसरे क्षार (पलाशक्षार तथा अर्कक्षार आदि) भी वायुगोला, बवासीर, ग्रहणी रोग, शर्करा तथा अश्मरी (पथरी) को नष्ट करते हैं। वक्तव्य-मोरवा, पलाश, मदार एवं सेहुण्ड (थूहर) आदि को जलाकर भस्म बना ली जाती है और भस्म को पानी में घोलकर रख लिया जाता है। जब पानी नितर जाता है, तो उसे (पानी को) धीरे-धीरे दूसरे पात्र में नितार दिया जाता है। इस जल को वाष्पीकरण द्वारा उड़ा देने पर क्षार प्राप्त होता है। विशेष जानकारी के लिए देखें-सु० सू० अ० 11.11।


सुदर्शन चूर्ण त्रिफला रजनीयुग्मं कण्टकारीयुगं शठी। त्रिकटु ग्रन्थिकं मूर्वा गुडूची धन्वयासकः ॥ 27 ॥ कटुका पर्पटो मुस्तं त्रायमाणा च बालकम्। निम्बः पुष्करमूलं च मधूयष्टी च वत्सकम् ॥ 28 ॥ यवानीन्द्रयवो भार्गी शिग्रुबीजं सुराष्ट्रजा। वचा त्वक्पद्मकोशीरचन्दनातिविषाबलाः ॥ 29 ॥ शालिपर्णी पृश्निपर्णी विडङ्गं तगरं तथा। चित्रको देवकाष्ठं च चव्यं पत्रं पटोलजम् ॥ 30 ॥ जीवकर्षभकौ चैव लवङ्गं वंशलोचना। पुण्डरीकं च काकोली पत्रकं जातिपत्रकम् ॥ 31 ॥ तालीसपत्रं च तथा समभागानि चूर्णयेत्। सर्वचूर्णस्य चार्थार्शं कैरातं निक्षिपेत् सुधीः ॥ 32 ॥ एतत् सुदर्शनं नाम चूर्णं दोषत्रयापहम्। ज्वरांश्च निखिलान्हन्यान्नात्र कार्या विचारणा ॥ 33 ॥ पृथग्द्वन्द्वागन्तुजांश्च धातुस्थान्विषमज्वरान्। सन्निपातोद्भवांश्चापि मानसानपि नाशयेत् ॥ 34 ॥ शीतज्वरैकाहिकादीन् मोहं तन्द्रां भ्रमं तृषाम्। श्वासं कासं च पाण्डुं च हृद्रोगं हन्ति कामलाम् ॥ 35 ॥ त्रिकपृष्ठकटीजानुपार्श्वशूलनिवारणम् । शीताम्बुना पिबेद्धीमान् सर्वज्वरनिवृत्तये ॥ 36 ॥ सुदर्शनं यथा चक्रं दानवानां विनाशनम्। तद्वज्ज्वराणां सर्वेषामिदं चूर्णं प्रणाशनम् ॥ 37 ॥ त्रिफला, हल्दी, दारुहल्दी, बनभण्टा, कण्टकारी, कचूर, त्रिकटु, पीपलामूल, गिलोय, धमासा, कुटकी, पित्तपापड़ा, नागरमोथा, त्रायमाणा, नेत्रबाला, नीम की छाल, पोहकरमूल, मुलेठी, कुरैया की छाल, अजवायन, इन्द्रजौ, भारंगी, सहिजन के बीज, फुलाई हुई फिटकिरी, वच, दालचीनी, पद्मकाठ, खस, श्वेतचन्दन, अतीस, बरियारा, शालपर्णी, पिठवन, वायविडंग, तगर, चीता की जड़, देवदारु, चव्य (चाव), परवल की पत्ती, जीवक तथा ऋषभक (या विदारीकन्द दो भाग), लौंग, वंशलोचन, कमल, काकोली (अभाव में असगन्ध), तेजपत्ता, जावित्री अथवा चमेली के पत्ते तथा तालीस के पत्ते-इन सब द्रव्यों को समान भाग में लेकर चूर्ण बनायें। इस चूर्ण में उक्त द्रव्यों का आधा भाग चिरायता का चूर्ण मिला दें। इस चूर्ण का नाम 'सुदर्शन चूर्ण' है। यह वात आदि तीनों दोषों को शान्त करता है और सभी प्रकार के ज्वरों को नष्ट करता है, इसमें कोई भी सन्देह नहीं है। पृथक्-पृथक्