भारतकोश
शार्ङ्गधर संहिता (दीपिका टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)

शार्ङ्गधर संहिता (दीपिका टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)

Sharangadhara Samhita with Dipika Hindi Commentary

शार्ङ्गधराचार्य द्वारा

स्रोत: चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन · चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished356 पृष्ठ

पृष्ठ 156, कुल 356 में से

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पृष्ठ 156

120 शार्ङ्गधरसंहिता [मध्यमखण्डे दोषों से तथा दो-दो दोषों से तथा आगन्तुज कारणों से उत्पन्न हुये ज्वरों को, रसादि धातुओं में पहुँचे हुये ज्वरों को तथा विषमज्वरों (मौसमी बुखार या मलेरिया, तिजारी, चौथिया आदि) को और सन्निपात से उत्पन्न हुये तथा मानसिक ज्वरों को, शीतपूर्वक ज्वर तथा एकाहिक आदि (रोजाना होने वाले) ज्वरों, तन्द्रा, भ्रम, प्यास, श्वास, कास, पाण्डुरोग, हृद्रोग तथा कामला (पीलिया) को नष्ट करता है। त्रिकस्थान, पीठ, कमर, घुटने तथा पसली के शूल (दर्द) को दूर करता है। सभी ज्वरों को दूर करने के लिए इस चूर्ण का शीतल जल के साथ सेवन करना चाहिये। जैसे भगवान् सुदर्शनचक्र से दानवों (दुष्टों) का विनाश करते हैं, ठीक उसी प्रकार यह चूर्ण सभी ज्वरों का विनाश करता है। वक्तव्य—सचमुच यह चूर्ण आयुर्वेद का एक उत्तम रत्न है। अन्यान्य रोगों के अतिरिक्त भूतावेश में भी इसके अद्भुत प्रभाव को देखकर आश्चर्यचकित हो जाना पड़ता है। त्रिफलापिप्पली चूर्ण कासश्वासज्वरहरा त्रिफला पिप्पलीयुता। चूर्णिता मधुना लीढा भेदिनी चाग्निबोधिनी।।३८।। त्रिफला तथा पीपल का चूर्ण शहद के साथ मिलाकर चाटने से कास, श्वास तथा ज्वर को हरता है। यह दस्तावर है तथा पाचक अग्नि को भी बढ़ाता है। कट्फलादि चूर्ण कट्फलं मुस्तकं तिक्ता शठी शृङ्गी च पौष्करम्। चूर्णमेषां च मधुना शृङ्गबेररसेन वा।।३९।। लिहेज्ज्वरहरं कण्ठ्यं कासश्वासारुचिर्जयेत्। वायुं छर्दिं तथा शूलं क्षयञ्चैव व्यपोहति।।४०।। कायफल, नागरमोथा, कुटकी, कचूर, काकड़ासिंगी तथा पोहकरमूल का चूर्ण शहद एवं अदरख के रस के साथ मिलाकर चाटना चाहिये। यह 'कट्फलादि चूर्ण' ज्वर को हरता है, कण्ठ के विकारों को दूर करता है तथा कास, श्वास एवं अरुचि को जीत लेता है। वायु के शूल, कै तथा क्षय (यक्ष्मा) रोग को नष्ट करता है। बृहत्कट्फलादि चूर्ण कट्फलं पौष्करं शृङ्गी मुस्ता त्रिकटुकं शठी। समस्तान्येकशो वापि सूक्ष्मचूर्णानि कारयेत्।।४१।। आर्द्रकस्वरसक्षौद्रैर्लिह्यात् कफविनाशनम्। शूलानिलारुचिच्छर्दिकॉसश्वासक्षयापहम् ।।४२।। कायफल, पोहकरमूल, काकड़ासिंगी, नागरमोथा, त्रिकटु (सोंठ, मरिच, और पीपल) तथा कचूर-इन सब द्रव्यों का अथवा एक-एक द्रव्य का सूक्ष्म (कपड़छन) चूर्ण बना लें। इसे अदरक के रस तथा मधु के साथ चाटने से यह कफजनित विकारों को नष्ट करता है और शूल, वात-विकार, अरुचि, कै, कास, श्वास तथा क्षय को नष्ट करता है। वक्तव्य—उक्त चूर्ण ऊर्ध्वजत्रु (गर्दन के ऊपरी अंगों) के विकारों में बहुत लाभदायक हैं और शिरोरोग की उत्तम औषध है। तृतीय कट्फलादि लेह कट्फलं पौष्करं कृष्णा शृङ्गी च मधुना सह। श्वासकासज्वरहरः श्रेष्ठो लेहः कफान्तकृत्।।४३।। कायफल, पोहकरमूल, पीपल तथा काकड़ासिंगी का चूर्ण मधु के साथ मिलाकर चाटने से श्वास, कास तथा ज्वर को हरता है और इसका अवलेह (मधु में मिलाकर चाटने योग्य बनाया हुआ) कफ को शान्त करने के लिए उत्तम औषध माना गया है। शृंग्यादि चूर्ण शृङ्गीं प्रतिविषां कृष्णां चूर्णितां मधुना लिहेत्। शिशोः कासज्वरच्छर्दिशान्त्यै वा केवलां विषाम्।।४४।। काकड़ासिंगी, अतीस तथा पीपल का चूर्ण बनाकर तथा मधु मिलाकर चटनी जैसा बना लें। इसे बच्चों के कास, ज्वर तथा कै (वमन) की शान्ति के लिए प्रयोग करें, अथवा केवल अतीस का चूर्ण मधु के साथ उक्त रोगों में प्रयुक्त करे। यवक्षारादि चूर्ण (यवक्षारविषाशृङ्गीमागधीपौष्करोद्भवम् । चूर्णं क्षौद्रयुतं लीढं पञ्च कासाञ्जयेच्छिशोः ।।४५।।) जौखार, अतीस, काकड़ासिंगी, पीपल तथा पोहकरमूल का चूर्ण मधु के साथ चाटने से बच्चों के पाँच प्रकार के कासों (खाँसी) को जीत लेता है। शुण्ठ्यादि चूर्ण शुण्ठीप्रतिविषाहिङ्गुमुस्ताकुटजचित्रकैः । चूर्णमुष्णाम्बुना पीतमामातीसारनाशनम् ।।४६।। सोंठ, अतीस, घी में भुनी हुई हींग, नागरमोथा, कुरैया की छाल तथा चीता की जड़ का चूर्ण गुनगुने जल के साथ पीने से आमातिसार या पेचिस को नष्ट करता है।

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