शार्ङ्गधर संहिता (दीपिका टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)
Sharangadhara Samhita with Dipika Hindi Commentary
शार्ङ्गधराचार्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन · चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन (उद्गम)
पृष्ठ 179, कुल 356 में से
संदर्भ में पढ़ेंअष्टमोऽध्यायः] अवलेहकल्पना 143
त्रिंशत्पलं गुडस्यात्र दत्त्वा च विपचेत् पुनः। सान्द्रत्वमागतं ज्ञात्वा चूर्णानीमानि दापयेत्।।39।। रसाञ्जनं मोचरसं त्रिकटु त्रिफलां तथा। लज्जालुं चित्रकं पाठां बिल्वमिन्द्रयवं वचाम्।।40।। भल्लातकं प्रतिविषां विडङ्गानि च बालकम्। प्रत्येकं पलसम्मानं घृतस्य कुडवं तथा।।41।। सिद्धशीते ततो दद्यान्मधुनः कुडवं तथा। जयेदेषोऽवलेहस्तु सर्वार्ण्यर्शांसि वेगतः।।42।। दुर्नामप्रभवान् रोगानतीसारमरोचकम्। ग्रहणीं पाण्डुरोगं च रक्तपित्तं च कामलाम्।।43।। अम्लपित्तं तथा शोषं कार्श्य चैव प्रवाहिकाम्। अनुपाने प्रयोक्तव्यमाजं तक्रं पयोदधि।।44।। घृतं जलं वा जीर्णे च पथ्यभोजी भवेन्नरः। कुरैया की छाल (जौकुट की हुई) एक तुला (5 सेर) लेकर एक द्रोण (12 सेर, 3 पाव, 4 तोला) जल में डालकर क्वाथ बनायें, चतुर्थांश शेष रहने पर कपड़े से काढ़ा छान लें, फिर इस काढ़े में तीस पल (डेढ़ सेर) गुड़ डालकर पकायें, जब वह गाढ़ा हो जाये तो निम्नलिखित द्रव्यों के कपड़छन चूर्ण डालकर मिला दें। रसवत्, मोचरस, सोंठ, मिरच, पीपल, हरड़, बहेड़ा, आँवला, लज्जवन्ती, चीता की जड़, पाठा, बेलगिरी, इन्द्रजौ, कुरैया की छाल, शुद्ध भिलावा, अतीस, वायविडंग एवं नेत्रबाला प्रत्येक एक-एक पल तथा घी एक कुडव (16 तोला) डालकर मिला दें। तत्पश्चात् सर्वथा शीत हो जाने पर उसमें मधु एक कुडव (16 तोला) डाल दें। यह अवलेह सभी प्रकार के अर्श (बवासीर) को तथा उसके उपद्रवों को शीघ्र ही जीत लेता है। अतिसार, अरुचि, ग्रहणीरोग, पाण्डुरोग, रक्तपित्त, कामला (पीलिया), अम्लपित्त, शोथ (सूजन), कृशता एवं प्रवाहिका (पेचिश) को जीतता है। इसके अनुपान में बकरी का दूध, उसके दूध की दही, उसके
दूध का मट्ठा, उससे तैयार घी अथवा जल का प्रयोग करना चाहिये। अवलेह के पच जाने पर पथ्य (चिकित्सक के बतलाये हुये खान-पान) का सेवन करता रहे। वक्तव्य-शुद्ध भिलावा को कल्क करके और रसवत् को घोलकर डालना चाहिये। इस योग का नाम 'कुटजावलेह' है। यह अर्श की परमोत्तम औषधि है। कुटजाष्टकावलेह कुटजत्वक्तुलामाद्रां द्रोणनीरे विपाचयेत्।।45।। पादशेषं शृतं नीत्वा चूर्णान्येतानि दापयेत्। लज्जालुर्धातकी बिल्वं पाठा मोचरसस्तथा।।46।। मुस्तं प्रतिविषा चैव प्रत्येकं स्यात् पलं पलम्। ततस्तु विपचेद् भूयो यावद् दर्वीप्रलेपनम्।।47।। जलेन छागदुग्धेन पीतो मण्डेन वा जयेत्। सर्वातिसारान् घोरांस्तु नानावर्णान् सवेदनानू ।।48।। असृग्दरं समस्तं च सर्वार्शांसि प्रवाहिकाम्। इति श्रीदामोदरसूनुना शार्ङ्गधरेण विरचितायां शार्ङ्गधरसंहितायां मध्यमखण्डेऽवलेहकल्पना नामाष्टमोऽध्यायः।।8।। कुरैया की आर्द्र (हरी) छाल एक तुला (5 सेर) लेकर एक द्रोण (12 सेर, 3 पाव, 4 तोला) जल में डालकर पकायें। चौथाई जल शेष रहने पर छानकर क्वाथ ले लें, फिर इस क्वाथ में निम्नलिखित द्रव्यों का कपड़छन चूर्ण डालकर पकायें-लज्जावन्ती, धाय का फूल, बेलगिरी, पाठा, मोचरस, नागरमोथा तथा अतीस प्रत्येक एक-एक पल (4-4 तोला)। इसे तब तक पकायें जब तक करछुल में लिपटने न लगे, तत्पश्चात् उतारकर शीतल होने पर पात्र में भरकर रख दें। यह अवलेह जल, बकरी के दूध अथवा माँड के साथ पीने से सब प्रकार के घोर, अनेक रंग के तथा पीड़ायुक्त अतिसारों को, प्रदरों को, अर्शविकारों को तथा प्रवाहिका को जीतता है।
इस प्रकार वैद्यरत्न पण्डित तारादत्त त्रिपाठी के पुत्र डॉ० ब्रह्मानन्द त्रिपाठी विरचित दीपिका-व्याख्या, विशेष वक्तव्य आदि से संवलित शार्ङ्गधरसंहिता मध्यमखण्ड का आठवाँ अध्याय समाप्त ।।8।।
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