शार्ङ्गधर संहिता (दीपिका टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)
Sharangadhara Samhita with Dipika Hindi Commentary
शार्ङ्गधराचार्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन · चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन (उद्गम)
पृष्ठ 185, कुल 356 में से
संदर्भ में पढ़ेंनवमोऽध्यायः] घृततैलकल्पना 149
घृत को वातरक्त में अवश्य पिलाना चाहिये। यह घृत कुष्ठ, रक्तपित्त, रक्तार्श (खूनी बवासीर), पाण्डुरोग, हृद्रोग, गुल्म, विसर्प, प्रदर, गण्डमाला, क्षुद्ररोग (शीतला आदि रोगों) तथा ज्वरों (जीर्णज्वरों) को जीतता है। इसका नाम 'महापञ्चतिक्त घृत' है। वक्तव्य-उक्त योग का वर्णन चरक चि० अ० 7 में है। वहाँ 'आमलकी रसः' के स्थान में 'अमृतबलानाम्' पाठ दिया है।
कासीसादि घृत कासीसं द्वे निशे मुस्तं हरितालं मनःशिलाम्। कम्पिल्लकं गन्धकं च विडङ्गं गुगुलुं तथा।।51।। सिक्थकं मरिचं कुष्ठं तुत्थकं गौरसर्षपान्। रसाञ्जनं च सिन्दूरं श्रीवासं रक्तचन्दनम्।।52।। इरिमेदं निम्बपत्रं करञ्जं सारिवां वचाम्। मञ्जिष्ठां मधुकं मांसीं शिरीषं लोध्रपद्मकम्।।53।। हरीतकीं प्रपुन्नाटं चूर्णयेत् कार्षिकान् पृथक्। ततस्तच्चूर्णमालोड्य त्रिंशत्पलमिते घृते।।54।। स्थापयेत् ताम्रपात्रे च घर्मे सप्तदिनावधि। अस्याभ्यङ्गेन कुष्ठानि दद्रूपामाविचर्चिकाः।।55।। शूकदोषा विसर्पाश्च विस्फोटा वातरक्तजाः। शिरःस्फोटोपदंशाश्च नाडीदुष्टव्रणानि च।।56।। शोथो भगन्दरश्चैव लूताः शाम्यन्ति देहिनाम्। शोधनं रोपणं चैव सवर्णकरणं घृतम्।।57।। हीरा, कासीस, हल्दी, दारुहल्दी, नागरमोथा, हरिताल, मैनसिल, कवीला, गन्धक, वायविडंग, मोम, मरिच, कडुवा कूट, तूतिया, सफेद सरसों, रसवत, सिन्दूर, राल, लालचन्दन, खैरसार, (कत्था), नीम के पत्ते (सूखे), करञ्ज के पत्ते या बीज, सारिवा, वच, मजीठ, लोध्र, पद्माकाठ, हरड़ तथा चक्रमर्द (चकवड़ या बनाड़) के बीज प्रत्येक द्रव्य का चूर्ण (1½ सेर) घृत में मिलाकर और ताम्रपात्र में डालकर सात दिनों तक धूप में रखना चाहिये। इसके अभ्यंग (मालिश) से कुष्ठ, दाद, पामा खुजली, विचर्चिका, शूकदोष, विसर्प, वातरक्त- जनित विस्फोट (फफोले या फुन्सियाँ), शिर के फोड़े, उपदंश, नाड़ीव्रण, दुष्टव्रण, शोथ (फोड़ों के आसपास का), भगन्दर तथा लूता (मकड़ी) के विकार शान्त हो जाते हैं। यह घृत शोधन (व्रण को शुद्ध करने वाला), रोपण (घाव को भरने वाला) तथा त्वचा के दागों को मिटाने वाला है।
वक्तव्य-यह 'कासीसादि घृत' एक उत्तम मलहम है। उक्त द्रव्यों का अत्यन्त बारीक चूर्ण कर लेना चाहिये। कासीस, हरताल, मैनसिल, गन्धक, तथा तूतिया को पृथक्-पृथक् भली-भाँति पीसना चाहिये। रसवत तथा गूगल को जल में विलीन करके काष्ठ औषधियों के चूर्ण में मिला या मसलकर धूप में सुखा लेना चाहिये। मोम को पोटली में बाँधकर घी में पिघला लिया जाता है। फिर सब द्रव्यों के चूर्ण को मिलाकर धूप में रख देना चाहिये। व्रणों के शोधन में तो इसी प्रकार लगाना ही चाहिये, किन्तु व्रण-रोपण के समय इसमें समान भाग घृत और मिलाकर थोड़ा कपूर मिलाकर लगाना चाहिये। यह वस्तुतः लेखन या शोधन मलहम है, अतएव लगता भी है। कभी-कभी तो इतना लगता है कि रोगी सहन भी नहीं कर सकता। इसलिये इसमें और घी तथा कपूर मिला लेना चाहिये। इसमें मिलाने के लिए करञ्ज के बीजों को भूनकर उनका चूर्ण बनाना चाहिये। इस घृत का केवल बाहरी प्रयोग ही किया जाता है।
जात्यादि घृत जातीनिम्बपटोलं च द्वे निशे कटुरोहिणी। मञ्जिष्ठा मधुकं सिक्थं करञ्जोशीरसारिवाः।।58।। तुत्थं च विपचेत् सम्यक्कल्कैरेभिर्घृतं बुधः। अस्य लेपात् प्ररोहन्ति सूक्ष्मनाडीव्रणा अपि।।59।। मर्माश्रिताः क्लेदिनश्च गम्भीराः सरुजो व्रणाः। चमेली, नीम एवं परवल के पत्ते, दारुहल्दी, हल्दी, कुटकी, मजीठ, मुलेठी, मोम, करञ्ज के पत्ते अथवा बीज, खस, सारिवा, एवं तूतिया-इन सब द्रव्यों का मोम को छोड़कर कल्क बनाकर तथा कल्क से चौगुने घृत में डालकर, घृत से चौगुना जल डालकर पाक करे। जब पाक सिद्ध हो जाये तो इसमें मोम डाल दें। मोम के पिघल जाने पर उसे गरम-गरम छान लें। इस घृत के लेप से सूक्ष्म नासूर भी भर जाते हैं और मर्मस्थानों में आश्रित, सड़े हुये, गहरे एवं पीड़ायुक्त व्रण (घाव) भी शान्त हो जाते हैं। वक्तव्य-इस मलहम में भिगोई हुई बत्ती नासूर के घाव में चढ़ायी जाती है। अन्य व्रणों में यह कपड़े पर चुपड़ कर लगा दी जाती है।
षड्बिन्दु घृत चित्रकः शङ्खिनी पथ्या कम्पिल्लस्त्रिवृतायुगम्।।60।। वृद्धदारुश्च शम्पाको दन्ती दन्तीफलं तथा।