शार्ङ्गधर संहिता (दीपिका टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)
Sharangadhara Samhita with Dipika Hindi Commentary
शार्ङ्गधराचार्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन · चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन (उद्गम)
पृष्ठ 197, कुल 356 में से
संदर्भ में पढ़ेंनवमोऽध्यायः] घृततैलकल्पना 161 देवदारु च कर्षांशं चूर्णं तैले विनिक्षिपेत्। वज्रतैलमिदं ख्यातमभ्यङ्गात् सर्वकुष्ठनुत्।। 186।। सेहुण्ड (थूहर) का दूध, आक (मदार) का दूध, धतूरे के पत्तों का रस, चीता के पत्तों का रस तथा भैंस के गोबर का रस (1-1 पाव लें) और सबके समान सरसों का तेल (1¼ सेर) मिलाकर पाक करें, तत्पश्चात् जब तेलमात्र शेष रह जाये तब उसमें चौगुना (5 सेर) गोमूत्र डालकर पाक करें। अन्त में गन्धक, चित्रक, मैनसिल, हरताल, वायविडंग, अतीस, विष (मीठा तेलिया), कड़वी तोरई, कूठ, वच, जटामांसी, सोंठ, पीपल, मरिच, दारुहल्दी, मुलेठी, सज्जीखार, सफेद जीरा तथा देवदारु प्रत्येक द्रव्य का चूर्ण 1¼-1¼ तोला उक्त तैल में डालकर रख दें। इस तैल का नाम 'वज्री तैल' है। इसकी मालिश करने से सभी प्रकार के कुष्ठ रोग नष्ट हो जाते हैं। वक्तव्य-उक्त तैल में डालने के पूर्व गन्धक आदि द्रव्यों का चूर्ण कपड़छन कर लेना चाहिये और इसे धूप में रख देना चाहिये। एक मास के पश्चात् दद्रु, पामा आदि पर लगाना चाहिये। उक्त तैल में 'प्रस्थ' का अर्थ 'सेर' और इसी के अनुसार 'कर्ष' का अर्थ 'सवा तोला' किया गया है। यह तैल-निर्माण का हमारा दृष्टिकोण है। करवीरादि तैल करवीरशिखादन्तीत्रिवृत्कोशातकीफलम् । रम्भाक्षारोदके तैलं प्रशस्तं लोमशातनम्।। 187।। कनेर के पत्ते, चीता की जड़, दन्ती, कड़वी तोरई के फल, इन द्रव्यों का कल्क (1 पाव) कदलीक्षार-मिश्रित जल 4 सेर और तेल 1 सेर-सबको मिलाकर विधिपूर्वक पाक करें। यह तैल उत्तम रोमशातन (बाल सफा करने वाला) है। चन्दनादि तैल (चन्दनाम्बुनखैर्याम्यं यष्टीशैलेयपद्मकम्। मञ्जिष्ठा सरलं दारु सेव्यैलं पूतिकेसरम्।। 188।। पत्रकैलं मुरा मांसी कङ्कोलं वनिताम्बुदम्। हरिद्रा सारिवा तिक्ता लवङ्गागुरुकुङ्कुमम्।। 189।। त्वग्रेणुनलिका चेति तैलं मस्तु चतुर्गुणम्। लाक्षारसमसं सिद्धं ग्रहघ्नं बलवर्धनम्।। 190।। अपस्मारज्वरोन्मादकृत्यालक्ष्मीविनाशनम् । आयुःपुष्टिकं चैव वशीकरणमुत्तमम्।। 191।। विशेषात् क्षयरोगघ्नं रक्तपित्तहरं परम्।) श्वेतचन्दन, नेत्रबाला, नाखूना, कूठ, मुलेठी, छड़ीला, पद्माकाठ, मजीठ, सरल (चीड़) का बुरादा, देवदारु, खस, बड़ी इलायची, पूति (गन्धमार्जार का अण्डकोष जिसे जुन्दवेदस्तर कहा जाता है), नागकेसर, तेजपत्ता, छोटी इलायची, मरोड़फली, जटामांसी, शीतलचीनी, फूलप्रियंगु, नागरमोथा, हल्दी, सारिवा, तिक्ता (कुटकी अथवा मुश्कदाना), लौंग, अगरु, केशर, दालचीनी, रेणु (मेवड़ी के बीज) तथा नालुका (दालचीनी का-सा गन्धद्रव्य), प्रत्येक द्रव्य 1-1 तोला लेकर कल्क बनायें। कल्क की अपेक्षा चौथाई तेल तथा तेल की अपेक्षा चौगुना दही का पानी और तेल के समान भाग लाक्षारस (लाही का क्वाथ) इन सबको एक साथ मिलाकर पाक करना चाहिये। यह तेल ग्रह (भूत-प्रेत बाधा) नाशक है, बलवर्द्धक है, मिरगी, ज्वर, उन्माद, कृत्या (मारण-मोहन आदि तान्त्रिक क्रिया) तथा अलक्ष्मी (अशोभा या बदसूरती) का विनाशक है, आयुर्वर्द्धक, पुष्टिकारक तथा उत्तम वशीकरण (सुगन्धित होने के कारण दूसरों को मोहित करने वाला) है। विशेषरूप से यह क्षयरोग को नष्ट करता है और रक्तपित्त को हरता है। वक्तव्य-उक्त तेल अत्यन्त सुगन्धित होता है, परन्तु पकाने से सुगन्धि कुछ घट जाती है। अतः द्रवद्रव्यों में पहले तेल को पकाकर तत्पश्चात् सम्पूर्ण सुगन्धित द्रव्यों का चूर्ण डालकर अत्यन्त धीमी आँच से केवल इतना गर्म करना चाहिये जिससे सुगन्धि तेल में विलीन हो सके और पाक समाप्त होने के बाद भी उक्त द्रव्यों को तैल में ही पड़े रहने देना चाहिये, जिससे उनका सार तैल में घुलता रहे। दूसरे सुगन्धित तैल इसके सामने तुच्छ हैं, क्योंकि वे तैल प्रायः मिट्टी के तेल में बनाये जाते हैं और उन्हें सेण्ट डालकर सुगन्धित किया जाता है। इस तैल का प्रयोग नपुंसकता पर भी बहुत लाभदायक प्रमाणित हुआ है। वचा तैल (वचां शठीं हरिद्रे द्वे देवदारुमहौषधी।। 192।। हरीतकीमतिविषामुस्तकेन्द्रयवान् समान्। एतान् दशपलान् भागांश्चतुर्द्रोणेऽम्भसः पचेत्।। 193।। चक्रमर्दरसैस्तैलं कटुकं मृदुनाऽग्निना। पादशेषे विनिक्षिप्य सिन्दूरमवतारयेत्।। 194।। एतत्तैलं निहन्त्याशु गण्डमालां सुदारुणाम्।) वचा, कचूर, हल्दी, दारुहल्दी, देवदारु, सोंठ, हरड़,