शार्ङ्गधर संहिता (दीपिका टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)
Sharangadhara Samhita with Dipika Hindi Commentary
शार्ङ्गधराचार्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन · चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन (उद्गम)
पृष्ठ 217, कुल 356 में से
संदर्भ में पढ़ेंएकादशोऽध्यायः] धातुशोधनमारणकल्पना 181 देनी चाहिये और इसी प्रकार बरगद की जटा की छाल के क्वाथ में पीसकर भली-भाँति तीन पुटें दें। इस विधि से निःसन्देह अभ्रक की भस्म हो जाती है। इसे सभी योगों में प्रयुक्त करना चाहिये। अथवा-अभ्रकभस्म को समान भाग घी में मिलाकर और लोहपात्र (कड़ाही) में डालकर पकाये, जब घी सर्वथा जीर्ण हो जाये अर्थात् जल जाये तब इस अभ्रक को सब कार्यों में प्रयुक्त करें। मरा हुआ (भस्मीभूत) अभ्रक मृत्यु (अकालमृत्यु) को हरता है, जरा (अकाल- वार्द्धक्य) तथा पलित (अकाल में बालों का पकना) को नष्ट करता है और उपयुक्त अनुपानों के साथ सेवन करने से सभी रोगों को हरता है। वक्तव्य-अभ्रक को धान्याभ्रक बनाने की विधि इस प्रकार है-'चूर्णाभ्रं शालिसंयुक्तं बध्वा कम्ब poseके तथा। त्रिरात्रं काञ्जिके स्थाप्यं तत् क्लिन्नं मर्दयेद् दृढम्।। कम्बलाद् गालितं श्लक्ष्णं मारणादौ प्रशस्यते'। अर्थात् अभ्रक को चूर्ण बनाकर तथा समान भाग चावल में मिलाकर कम्बल में बाँध दें (इसे ढीला बाँधना चाहिये) फिर इस पोटली को तीन दिन तक काञ्जी में रख दें। जब अभ्रकचूर्ण गीला या मृदु हो जाये तो जल से पूर्ण परात में रखकर मर्दन करे। इस क्रिया से अभ्रक का चूर्ण सूक्ष्म होकर कम्बल में से छनकर परात के जल में आ जाता है। जल को नितार कर उसे निकाल लिया जाता है और अभ्रकभस्म को बनाने के लिए उसका प्रयोग किया जाता है। उक्त विधि से यदि दस पुटों में अभ्रक भस्म निश्चन्द्र (चमकरहित) न हो तो और भी पुटें देनी चाहिये। भस्म-निर्माणार्थ जहाँ तक हो सके 'वज्राभ्रक' का संग्रह करना चाहिये और सोरा या कलमी सोरा तथा मूली के रस के योग से श्वेताभ्रक की भी भस्म बनायी जाती है। अभ्रक मारण-विधि शुद्धं धान्याभ्रकं मुस्तं शुण्ठीषड्भागयोजितम्।।66।। मर्दयेत् काञ्जिकेनैव दिनं चित्रकजै रसैः। ततो गजपुटं दद्यात् तस्मादुद्धृत्य मर्दयेत्।।67।। त्रिफलावारिणा तद्वत् पुटेदेवं पुटैस्त्रिभिः। बलागोमूत्रमुसलीतुलसीसूरणद्रवैः ।।68।। मर्दितं पुटितं वह्नौ त्रित्रिवेलं व्रजेन्मृतिम्। उक्त विधि से अभ्रक को शुद्ध करके और धान्याभ्रक बनाकर षष्ठांश (छठा भाग) नागरमोथा तथा सोंठ का चूर्ण मिलाकर काञ्जी के साथ एक दिन तक पीसना चाहिये और एक दिन चीता के रस से पीसकर टिकिया बना लें तत्पश्चात् उन्हें सुखाकर गजपुट से पुट दें। सर्वाङ्गशीतल हो जाने पर पुट में से निकाल कर त्रिफला के क्वाथ से मर्दन करे और उक्त विधि से पुट दें। इस प्रकार त्रिफला की तीन पुटें दें। इसके बाद वरियारा, गोमूत्र, सफेद मुसली, तुलसी तथा सूरण के रस में मर्दन कर प्रत्येक द्रव्य की तीन-तीन पुटें दें। इस प्रकार अभ्रक की भस्म हो जाती है। अभ्रक सत्त्व प्रकार धान्याभ्रकस्य भागैकं द्वौ भागौ टङ्कणस्य च।।69।। पिष्ट्वा तदन्धमूषायां रुद्ध्वा तीव्राग्निना पचेत्। स्वभावशीतलं चूर्णं सर्वयोगेषु योजयेत्।।70।। धान्याभ्रक एक भाग (4 तोला) और टंकण (सुहागा) दो भाग (8 तोला) दोनों को पीसकर तथा अन्धमूषा में बन्द करके तीक्ष्ण अग्नि में पकायें। सर्वांग शीतल होने पर पीसकर सभी योगों में इसका प्रयोग करें। वक्तव्य-उक्त विधि से निर्मित अभ्रकभस्म की बीस, पचास अथवा सौ पुटें उपयुक्त औषधियों के रस तथा क्वाथ की देनी चाहिये। यह स्मरण रखना चाहिये कि अभ्रक को जितनी ही अधिक पुटें दी जायेंगी, वह उतना ही गुणवान् हो जायेगा। सहस्रपुटी अभ्रक भस्म भी बनायी जाती है। पुट देने वाले द्रव्यों का चुनाव आप अपनी आवश्यकता के अनुसार करें। नीलाञ्जन-शुद्धि नीलाञ्जनं चूर्णयित्वा जम्बीरद्रवभावितम्। दिनैकमातपे शुद्धं भवेत् कार्येषु योजयेत्।।71।। एवं गैरिककासीसटङ्कणानि वराटिका। तौरी शङ्खं च कङ्कुष्ठं शुद्धिमायाति निश्चितम्।।72।। नीलाञ्जन (काला सुरमा) को अत्यन्त सूक्ष्म पीसकर जम्भीरी नींबू के रस की भावना देकर एक दिन धूप में सुखा लेना चाहिये। इस प्रकार वह शुद्ध हो जाता है और उसको सब कार्यों में प्रयोग किया जा सकता है। इस तरह गैरिक (गेरू), कसीस (हीराकसीस), टंकण (सोहागा), वराटिका (कौड़ी), तौरी (तुवरी या फिटकिरी), शंख तथा कंकुष्ठ को भी शुद्ध किया जाता है यह निश्चय है। वक्तव्य-अञ्जन या सुरमा दो प्रकार का होता है-1. काला सुरमा और 2. सफेद सुरमा। दोनों ही परम चक्षुष्य हैं। इनके अनेक प्रयोग आयुर्वेदिक ग्रन्थों में दिये गये हैं-1.